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शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

बिहार की प्रयोगशाला

राजनीति का शीर्षासन 


राजनीति में दो और दो हमेशा चार नहीं होते. 

बाइस हो सकते हैं. ज़ीरो हो सकते हैं. एक भी हो सकते हैं. 

जैसे अब बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद हो गए हैं. 

ये राजनीति का शीर्षासन है. इसे ऐसी परिक्रमा भी कह सकते हैं, जिसमें चलने वाला जहां से शुरु करता है, फिर वहीं पहुंच जाता है. संतुष्टि का भाव भी रहता है.  


पहले लालू- नीतीश भाई-भाई थे. जोड़ी सुपरहिट थी.  फिर राह अलग हो गई. जुदाई के बाद भी बिहार की राजनीति इन दोनों के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही. 

नीतीश लालू को कोसते रहे और सत्ता सुख भोगते रहे. लालू ने भी नीतीश की ईंट से ईंट बजाने की कोशिश कम नहीं की. राबड़ी देवी जी तो गाली देने में हर हद पार कर गईं. 

उन दिनों नदी के दो पाट की तरह दिखने वाले लालू और नीतीश आगे जाकर मिल जाएंगे, किसने सोचा था?

तभी तो मैंने कहा कि राजनीति में गणित के फॉर्मूले नहीं चलते. 

कई बार पारखी भी चक्कर खा जाते हैं. 

इसी साल दिल्ली में हुए चुनाव के नतीजे इसका सुबूत हैं. साल 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की हार भी खुद को राजनीति का पंडित कहने वालों के मुंह पर तमाचा थी. 

लेकिन, वो बिराहमन ही क्या, जो खुद को ज्ञाता न माने. 


बिहार की राजनीति के बेहद रपटीले अखाड़े में पैर जमाने की कोशिश कर रहे पहलवानों को लेकर पंडित फिर भविष्यवाणी कर रहे हैं. 

बिना ये परवाह किए कि राजनीति में कैलकुलेटर की बताई संख्या सटीक हो, ये जरुरी नहीं. 

अगर फॉर्मूला चल जाए तो स्थिति साफ है. चुनाव के दौरान जातियों के पाले खींच लेने वाले बिहार में ये साफ है कि किस गठबंधन के साथ कौन सी जाति है. 

लेकिन दिक्कत ये है कि बिहारियों की गिनती उन 'ज़िंदा कौमों' में होती है जो राजनीति के सारे समीकरणों को गड्ड-मड्ड कर देती है. 

जब स्थिति इस कदर कन्फ्यूज करने वाली हो तो जीत के लिए जोखिम लेने पड़ते हैं. प्रयोग करने पड़ते हैं. तो एनडीए और महागठबंधन ने पूरे बिहार को प्रयोगशाला बना दिया है. 

प्रयोगशाला अगर नामी हो तो हर वैज्ञानिक वहीं जाकर शोध करना पसंद करता है. ऐसे में ओवैसी भी आ गए हैं बिहार. 

ओवैसी ने एक खास इलाके को चुना है. वो पिछड़ेपन को मुद्दा बना रहे हैं. 

उद्धारक की छवि पेश करते हुए उस इलाके को चमन बनाने का सपना दिखा रहे हैं. लेकिन, कहने वाले ये बताने से नहीं चूक रहे कि वो अपनी ताकत विकास के दावे के बजाए अपनी जाति के वोटों को मान रहे हैं. 


प्रयोग एनडीए भी भरपूर कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बात विकास से शुरु की. 

फिर बिहार को लुभावना पैकेज दिया. बिहार के पिछड़ेपन की बात की और दावा किया कि उनकी सरकार बनी तो फिर... समझ लीजिए कि बिहार जाने क्या हो जाएगा. 

बीजेपी की अगुवाई में एनडीए के प्रयोगों के बीच आरएसएस ने भी एक्सपेरिमेंट शुरु कर दिए. भागवत जी ने आरक्षण को लेकर एक बयान दे दिया. 

प्रयोगों के इस दौर में हवा उम्मीद के मुताबिक नहीं बनी. मोदी ने पैकेज जिस अंदाज में दिया, उसे नीतीश- लालू की जोड़ी ने बिहार की बोली लगाना बता दिया. 

भागवत के बयान को आरक्षण खत्म करने की साजिश कह दिया. 

इस बीच कहानी में ट्विस्ट आया. दादरी हो गया. नोएडा और पटना की दूरी एक हज़ार किलोमीटर है लेकिन बीफ यानी गोमांस का मुद्दा पलक झपकते ही नोएडा से पटना पहुंच गया. 

ये बात अलग है कि अब एक प्रयोगशाला ने साफ कर दिया है कि दादरी में मारे गए अखलाक अहमद के फ्रीज में रखा मांस बीफ नहीं बल्कि मटन था लेकिन बिहार की प्रयोगशाला में बीफ के सहारे कामयाबी की रेसेपी तैयार करने की कोशिश शुरु हो गई. 


इस बीच बड़बोले लालू गोमांस पर ऐसा कुछ बोल गए जो उनके ही खिलाफ जाने लगा. कम से कम भ्रम तो ऐसा ही बनाया गया. लालू कहते रहे कि मैंने ऐसा नहीं कहा. बीजेपी के नेताओं ने उनके खंडन पर ध्यान ही नहीं दिया और वो बताते गए कि देखो, देखो लालू क्या कह रहे हैं. छी. छी. छी. 

लालू ने जो सफाई दी उसकी भी इस सफाई से धुलाई हुई कि उनकी सांसे उखड़ने लगीं. लालू पिछले दो चुनाव नीतीश कुमा्र से हारे जरुर हैं लेकिन वो ऐसे हांफे कभी नहीं थे. अपनी ही प्रयोगशाला में लालू पहली बार ऐसे 'लुल्ल' दिखे. हालांकि वो चतुर सुजान हैं. उन्हें इस स्थिति का अंदाजा रहा होगा. तभी उन्होंने जहर का घूंट पीते हुए नीतीश कुमार से हाथ मिलाया था.

नीतीश भी लपके हुए लालू की तरफ आए तो उसकी वजह यही थी कि दो दशक बाद बिहार की राजनीति सिर्फ लालू और नीतीश के चेहरों तक नहीं सिमटी रही. एक ऐसा तीसरा चेहरा आ गया जो बिहार की जमीन पर नहीं उगा लेकिन इसी जमीन पर लालू और नीतीश दोनों को पटक मार गया. लोकसभा चुनाव में.  

बहरहाल, बिहार की प्रयोगशाला में हो रहे प्रयोगों को लेकर राजनीति के वैज्ञानिक चाहे जिस नतीजे की उम्मीद लगाएं, लेकिन असल निष्कर्ष क्या निकलेगा, इसे लेकर कोई दावे से कुछ कहने की स्थिति नहीं है. 

मजा ये है कि खबरी लोग तब भी बिहार के मूड की भविष्यवाणी करने से नहीं चूक रहे हैं. नेता एक दूसरे की पोल खोल रहे हैं तो चैनल ओपिनयन पोल दिखा रहे हैं. ज्यादातर मोदी सेना को आगे बता रहे हैं. कुछ ने लालू-नीतीश की जोड़ी को भी आगे बताया है. 


बिहार में चुनाव की तारीखें भी शोध के बाद तय की गईं लगती हैं. बिहारी भाई चुनाव के लिए पहला चरण 12 अक्टूबर यानी जेपी की जयंती के एक दिन बाद बढ़ाएंगे. 

हमेशा की तरह इस बार भी लड़ाई जेपी के चेलों के बीच है. एक तरफ हैं लालू-नीतीश दूसरी तरफ हैं सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद. 

चालीस साल पहले जेपी ने इन चेलों को जाति से ऊपर उठने के लिए जनेऊ तोड़ो का नारे सिखाया था. लेकिन चेले चालीस साल बाद भी जातियों के पाले में बैठे हुए हैं.  

उन्हें जेपी का दूसरा नारा याद है. 'संपूर्ण क्रांति अब नारा है. भावी इतिहास हमारा है'. सवाल करने वाले ये भी पूछ सकते हैं कि भावी है तो इतिहास कैसे हो सकता है और इतिहास है तो भावी कैसे हो पाएगा. 

खैर, मेरा सवाल उस प्रयोग के नतीजे के लेकर है, जो बिहार की राजनीतिक प्रयोगशाला में हो रहा है. नेता चाहे जो भी मानें मेरी सोच साफ है. बिहारी बुड़बक नहीं होते. दुनिया ने उनकी छवि चाहे जैसी भी बना दी हो, लेकिन राजनीति की समझ उनमें बहुत साफ है. और इस बार बिहार इसे पूरी साफगोई से बताने जा रहा है. 

चलते-चलते बिहारी साथियों की ओर से मिला एक हंसगुल्ला 

बिहार की दशा सुधारने के लिए एक मीटिंग बुलाई गई. 

सवाल था क्या किया जाए. 

एक चिरकुट ने कहा, चलो जी अमेरिका पर हमला बोल देते हैं. 

बाकी बोले, ऊ से का होगा. 

जवाब मिला. अमेरिका से जीतेंगे तो नहीं. अमेरिका जीत के अपना झंडा लगा देगा. फिर हम भी अमेरिका होंगे. 

बिकास खुद्दे हो जाएगा. 

किनारे बैठे चच्चा चुप थे. 

सबने पूछा, ऐ चच्चा, चुप काहे हो. 

चच्चा सिर खुजलाते हुए बोले. 

साला सोच रहे हैं कि हम जीत गए तो अमेरिका का क्या होगा?

'जय बिहार'






गुरुवार, 13 अगस्त 2015

रिमोट, सिनेमा और संसद

...पर्दे में रहने दो 

बड़ी उम्दा चीज है रिमोट. जबरदस्त एंटरटेनर. 

एक वक्त जिस टीवी को बुद्धू बक्सा कहा जाता था, रिमोट ने उस बक्से में मनोरंजन का खजाना भर दिया है.

रिमोट का बटन दबाओ और मुस्कुराते जाओ. 

मसलन, कुछ मिनट पहले की बात है. हाथ में रिमोट लिए टीवी पर टकटकी लगाए बैठा था 

यश चोपड़ा की फिल्म 'दीवार' का मशहूर सीन चल रहा था. 

तीन किरदार. अमिताभ बच्चन, शशि कपूर और निरुपमा रॉय. 

डॉयलॉग अमिताभ और शशि कपूर के बीच थे. 

अमिताभ कहते हैं,

'हां मैं साइन करुंगा'

'लेकिन, मैं अकेले नहीं करुंगा और सबसे पहले साइन नहीं करुंगा' 

'जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे बाप का साइन लिया था.' 

'पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरी मां को गाली देकर नौकरी से निकाल दिया था' 

'जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे हाथ पे ये लिख दिया था'. 

'उसके बाद मेरे भाई तुम जिस कागज पर कहोगे मैं साइन कर दूंगा' 

अमिताभ चुप हुए तो शशि कपूर ने अलसाए अंदाज में बोलना शुरु किया 

'दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं हो जाते'... 

डॉयलॉग आधा ही खत्म हुआ था कि उंगली में हरकत हो गई. एक न्यूज़ चैनल लग गया. 

संसद की खबर थी. संसद में हंगामा बरपा हुआ था. जबरदस्त शोर. 

एक महिला मंत्री बोल रही थीं. बोल क्या रहीं थीं. खुद पर लगे आरोपों के जवाब में वो आरोप गिना रहीं थीं जो कभी कांग्रेस पर लगे थे. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अतीत याद दिला रही थीं. 

'सारे काले कारनामे जो उस इतिहास में दर्ज हैं उनको पढ़ें' 

'लौट के पूछे मम्मा 15 हजार के हत्यारे एंडरसन को डैडी ने क्यों छुड़ाया था.' 

यहां भी मां. वहां भी मां. यहां भी बाप. वहां भी बाप. यहां भी सवाल. वहां सवाल. 

यहां भी खुद को बेकसूर साबित करने की कोशिश. वहां भी खुद को बेकसूर बताने का इरादा. 

यहां भी सुनने वाले की आंख में सौ सवाल. वहां भी सुनने वाले की आंख में सौ सवाल. 

कमाल का इत्तेफ़ाक.

उगंली बटन पर दबी. म्यूजिक चैनल लग गया. पंद्रह अगस्त करीब है. गाना उसी मूड का था. 

'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की'...

आधा गाना सुना कि तमन्ना फिर रिमोट का बटन दबाने की हो गई. 

न्यूज़ चैनल पर इस बार राहुल गांधी बोल रहे थे. 

'गांधी जी के तीन बंदर हुआ करते थे' 

'एक बंदर कहता था बुरा मत देखो'

'दूसरा बंदर कहता था बुरा मत सुनो' 

'तीसरा बंदर कहता था बुरा मत बोलो' 

'मोदी जी ने इसे मोदीफाई कर दिया है' 

'मोदी जी का कहना है' 

'सच को मत देखो, सच को मत सुनो, सच को मत बोलो'  

रिमोट दबा... टीवी दोबारा म्यूजिक चैनल पर सेट हो गया 

इस बार गाना था 'तुझे सब है पता मेरी मां'.. 

रिमोट हाथ में था तो दोबारा न्यूज़ चैनल पर लौटने का दिल हुआ 

राहुल अभी बोले जा रहे थे. 

राहुल कह रहे थे, 'कल यहां सुषमा जी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, बेटा... बेटा तुम मुझसे गुस्सा क्यों हो मैंने तुम्हारा क्या किया' 

'मैंने सुषमा जी से कहा, सुषमा जी मैं आपसे गुस्सा नहीं हूं आपकी मैं आदर करता हूं' 

'और मैंने आपकी आंखों में देखा.. जैसे मैं अब देख रहा हूं मैंने आपसे कहा सुषमा जी मैं सच बोल रहा हूं और 
आपकी आंखें ऐसे गईं... आपकी आंखें ऐसे नीचे गईं' 

रिमोट ने फिर हरकत की. म्यूजिक चैनल पर टीवी सेट हुआ...

इस बार गाना था... 'पर्दे में रहने दो'... 

सोमवार, 10 अगस्त 2015

मेरा बच्चा (नेता) होनहार

... तो बजाओ ताली

आप तो जानते हैं. अंग्रेजी में उसे 'एब्रीविएशन' कहते हैं. आम बोलचाल में शॉर्टफॉर्म भी कह देते हैं. छोटे- छोटे बच्चों के मां-बाप की खुशी भी आपको याद होगी. उस वक्त जब किसी गेस्ट के सामने उनका बच्चा शॉर्टफॉर्म की फुलफॉर्म करता है. 

मां कहती है, 'बेटा, आईएएस की फुलफॉर्म बताओ'. 

बच्चा जवाब देता है, 'इंडियन एडमिनस्ट्रेटिव सर्विस.' 

मां के चेहरे पर मुस्कान. दूसरा सवाल आता है. 

'बेटा, अब सीबीआई बताओ.' 

बच्चा कहता है, 'सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन.' 

मां का चेहरा खुशी से लाल. अब सबसे मुश्किल सवाल. 

'अच्छा, बीसीसीआई की फुलफॉर्म क्या है'?

बच्चा छत की तरफ देखता है. आंखे मिचमिचाता है. इस बार मुस्कुराने की बारी गेस्ट की होती है. मां के चेहरे पर हवाई सी उड़ रह है. 

डैडी बोल पड़ते हैं, 'अरे छोड़ो भी. तुमने तो घर पर ही स्कूल खोल दिया.'

खतरा बच्चे के नहीं डैडी के फेल होने का है. 

मां अब भी हिम्मत नहीं हारती. 

'क्या राहुल, मेरा अच्छा बेटा, भूल गया. थोड़ी देर पहले ही तो सुना रहा था.' 

डैडी फिर कहते हैं, 'तुम भी... कमाल करती हो.' 

इतने में बच्चे का मुंह खुलता है. सौ की स्पीड से बोलने वाला बच्चा राहुल दस की स्पीड से शुरुआत करता है. 

'बोर्ड... बोर्ड ऑफ कंट्रोल... बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट...' 

आखिरी दो शब्दों में रफ्तार बढ़ जाती है. 

'.. इन इंडिया. बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर... क्रिकेट इन इंडिया...' 

मां कुर्सी छोड़कर खड़ी हो जाती है. ताली बजाने लगती है. घर आए अतिथि महोदय भी शर्मा- शर्मी में एक- दो बार दोनों हाथों की हथेली मिला देते हैं. फुसफुसाते हुए कहते हैं, 'शाबास'. 

मां उनके रिएक्शन को नहीं देखती. उसे देखने की फुर्सत भी नहीं. वो अपनी धुन में रहती है. अपनी सुनाए जाती है. 

'बताइये भाई साहब. सिर्फ चार साल का है. कोई और बच्चा बता देगा. आप बताइये.' 

गेस्ट कुछ कहते उसके पहले ही मां का जोश बढ़ जाता है. 

'ये तो कुछ नहीं. आप कुछ भी पूछिए. यूएसए पूछिए. यूएसएसआर पूछिए. पूछिए. पूछकर देखिए. ये सब बता देगा.'

पहले बच्चा बालों में उंगलिया डाले सिर खुजला रहा था. अब यही काम गेस्ट महोदय करते हैं. 

सोचते हैं. 'पूछूं.. क्या पूछूं... अरे क्यों पूछूं...'

मन ही मन सोचते हैं... 'पहले बच्चे को रट्टू तोता बनाते हो, फिर हमारे सामने रौब जमाते हो. कहां फंस गए.' 

कुछ देर सोच विचार के कहते हैं, 'जी ... जी... बड़ा होनहार बच्चा है... आईएएस ही बनेगा...' 

अपनी इस भविष्यवाणी पर मन ही मन बड़ा सा क्वैश्चनमार्क भी लगा लेते हैं. 

ये सीन 1980 के दशक का है. तब यूएसएसआर के टुकड़े नहीं हुए थे. बच्चों के पास प्लेस्टेशन नहीं थे और दूसरों पर रौब गांठने के लिए ऐसा ही कुछ किया जाता था. बच्चा गेस्ट के सामने ऐसा इम्तिहान देता था जिसका रिजल्ट उसे नहीं बल्कि उसके मां-बाप को मिलता था. 

गेस्ट भी मन से या बेमन आशीर्वाद देता था .. 'आईएएस बनेगा'.

अब आईएएस तो गिनती के बनते हैं साल में. कितने बनते. पता नहीं किसी गेस्ट ने सोचा क्यों नहीं. बच्चा नेता भी बन सकता है. 1980 के दशक के उन बच्चों के मां-बाप की सोच और सवाल शायद अब तक नहीं बदले हैं. उन बच्चों के मां-बाप के हमउम्र नेता इन दिनों जिस अंदाज में लोगों से सवाल पूछते हैं, उससे यही लगता है. 

एक नेताजी पूछते हैं, 'जेडीयू मतलब'?  जवाब भी खुद देते हैं, 'जनता का दमन उत्पीड़न.' 'आरजेडी का फुलफॉर्म'? 'रोज जंगल राज का डर'. 

दूसरे नेताजी भी पीछे नहीं. वो पूछते हैं, 'बीजेपी मतलब'... फिर जवाब देते हैं, 'बड़का झुट्ठा पार्टी'. 

तो बजाइये ताली. कहिए शाबास. अगर आप खुद को 1980 के उस दशक से जोड़ पाते हैं तो मुस्कुराइए. इस दौर का जमकर मजा लीजिए. इस बार 'तमाशा' आप नहीं. तमाशा बुजुर्गों की फौज कर रही है और आपका जिम्मा ताली बजाकर मजा लेने का है. हां, आपके पास एक ऑप्शन भी है. बोर हो जाएं तो चैनल बदल सकते हैं. मुझे यकीन है कि ये तमाशा देखने आप किसी रैली में तो नहीं ही जाएंगे.    

बुधवार, 15 अप्रैल 2015

लापता, गुमशुदा, Missing!

जनाब, किसे खोज रहे हैं आप?



ग़ाजियाबाद जाइये या फिर गांधीनगर. कानपुर या फिर पटना. मन हो तो बुंदेलखंड का चक्कर भी लगा लीजिए. दीवारें पटी हुई हैं. जगह-जगह पोस्टर लग गए हैं. जिनका सबको पता है, वो 'लापता' बताए जा रहे हैं. 
भला कौन मानेगा कि जनरल (रिटा.) वीके सिंह गुम हो गए हैं. ट्विटर ट्रेंड से लेकर प्राइम टाइम की बहस तक वो हर जगह छाए हुए हैं. 



लेकिन,ग़ाजियाबाद में दाखिल होते ही आपका भरम टूट सकता है. यहां बाकायदा पोस्टर लगाकर सिंह साहब की तलाश की जा रही है. 'भारतीय कौटिल्य सेना' नाम के संगठन ने उनकी तलाश पर पांच सौ रुपये के इनाम का भी एलान किया है. 



किस्सा सिर्फ़ यूपी के जिला ग़ाजियाबाद  का नहीं. गुजरात के गांधीनगर में भी पोस्टर लगाकर तलाश की जा रही है. यहां बीजेपी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी को 'गुमशुदा' बताया गया है. अब आप कहेंगे, भला आडवाणी जी कैसे लापता हो सकते हैं. उनकी तो 'चुप्पी' भी हाल-हाल तक ख़बर रही है. 

                                   

आडवाणी की ही तरह बीजेपी के 'मार्गदर्शक' मुरली मनोहर जोशी भी 'लापता' हो गए हैं. उनकी तलाश में कानपुर में पोस्टर लगे हैं. 



पटना में लगे एक पोस्टर में बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा को 'गुमशुदा बताया गया है'. दूसरों को 'खामोश' कर देने वाले शॉटगन की 'चुप्पी' पर सवाल उठाया गया है. पोस्टर में पुरस्कार देने की बात भी कही गई है, लेकिन, कौन किसे देगा, ये साफ़ नहीं है. 



पोस्टर लगाकर तलाश राहुल गांधी की भी हो रही है. हालांकि, अब बताया जा रहा है कि वो दिल्ली आ गए हैं या बस आने ही वाले हैं. वैसे, कांग्रेस कई बार साफ़ कर चुकी है कि राहुल गांधी 'गायब' नहीं बल्कि 'छुट्टी' पर हैं, लेकिन, विरोधियों की नज़र में वो 'गुमशुदा' ही हैं 



दिलचस्प ये है कि बुंदेलखंड क्षेत्र में राहुल गांधी के साथ बीजेपी नेता उमा भारती की भी तलाश हो रही है. वो भी पोस्टर चिपका के. एक तरफ़ उमा दीदी. दूसरी तरफ़ राहुल भैया. 

कुछ महीने पहले ऐसा ही 'तलाश' अभियान नई दिल्ली क्षेत्र में भी चला था. पोस्टर छपे थे. दीवार पर लगे थे. यहां अरविंद केजरीवाल को गुमशुदा बताया गया था. दिल्ली चुनाव ने केजरीवाल को तलाश कर नई दिल्ली पहुंचा दिया और लोगों ने इनाम भी दिया, लेकिन, किसे ? जाहिर है, केजरीवाल को. 

                                   

तो बलिहारी है, ऐसे तलाशी अभियान की. जिनका पता है आप उन्हें ही लापता बताकर तलाश रहे हो और जब वो आपकी परिभाषा के मुताबिक मिल जाते हैं तो उन्हें ही इनाम थमा देते हो. ये ऐसा मज़ाक है, जिस पर अब हंसी भी नहीं आती. सब जानते हैं कि ऐसे पोस्टर छपवाने वाले पब्लिसिटी के लिए चर्चित चेहरों को खोज रहे हैं. कई बार शिकायतें जायज भी होती हैं. चुनावी मौसम में वादों के बीज बोने वालों से फ़सल का हिसाब मांगना वोटर अपना हक़ मानते हैं और जब ये हक़ हाथ से जाता दिखता है तो वो पोस्टर चिपकाने के सिवा कर भी क्या सकते हैं ? शायद इसीलिए 'राइट टू रिकॉल' की मांग उठी थी. लेकिन, पोेस्टरों के जरिए तलाशी अभियान चलाने वाले सीरियस कभी नहीं दिखते. अगर होते तो कथित 'गुमशदा' खुद प्रकट होने के लिए मजबूर हो जाएं. 


सच कहा जाए तो सीरियस होकर खोज़ने की जरुरत इन बड़े नाम वाले लापता लोगों को नहीं. इससे किसी का भला होता हो, ये लगता नहीं. तलाशी अभियान की जरुरत उन लापता बच्चों को है, जो वक्त के किस अंधेरे में गुम हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता. इन बच्चों का पता ना उनके घरवाले लगा पाते हैं और ना ही शुभचिंतक. पुलिस तो खैर सीरियस होती ही नहीं. नेशनल क्राइम ब्यूरो का आंकड़ा मुझे बताया गया है, जिसके मुताबिक हर आठ मिनट में एक मासूम 'गायब' हो जाता है. यानी हर घंटे करीब आठ बच्चे लापता हो जाते हैं. इनमें लड़कियों की तादात आधे से ज्यादा होती है. गुमशुदा बच्चों में से चालीस फ़ीसदी कभी लौट कर घर नहीं आते. पिछले साल अकेले दिल्ली में 7 हज़ार से ज्यादा बच्चे गायब हुए थे. मासूम बच्चों के इस तरह गुम होने पर सुप्रीम कोर्ट तक चिंता जाहिर कर चुका है.
तो पोस्टर छाप कर बड़े- बड़े लोगों को तलाशने वाले भाइयो (अगर बहनें भी इस अभियान में शामिल हैं तो मेरा संबोधन उन्हें भी है) कृपया अपना धन और समय इन स्वनामधन्य लोगों पर व्यर्थ ना करें. ये वक्त पड़ने पर खुद प्रकट हो जाएंगे. इन्हें जो 'इनाम' देना है, सामने आने पर दें. पोस्टर छापें, चिपकाएं और तलाशी अभियान चलाएं तो किसी ऐसे मासूम के लिए जिसके लौटने पर एक परिवार की खुशियां लौटेंगी. आपको दुआएं और ताउम्र के लिए सुकून मिलेगा. आइये मिलकर खोजते हैं उन मासूमों को जो ना जाने किन अंधेरों में गुम हो जाते हैं. 

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

100 साल बाद महात्मा गांधी की तलाश

मथुरा की सड़कों पर बापू के पद​चिन्ह तलाशते 'युगांधर'

ट्रेन वक्त से कुछ पहले पहुंच गई. मैं मथुरा जंक्शन के प्लेटफॉर्म नम्बर दो पर खड़ा था. अपने स्टेशन पर असमंजस ज्यादा होता है. सारे रास्ते पहचाने से होते हैं. तय करना मुश्किल होता है कि दाएं से जाएं या बाएं से. अब मथुरा में दो फुटओवर ब्रिज हैं. मैने नए पुल पर चढने का फैसला किया.

प्लेटफॉर्म नम्बर एक पर उतरकर कुछ कदम ही बढ़ा था कि बैनर नजर आया, '100 साल बाद महात्मा गांधी की तलाश में युगांधर'. बैनर के साथ बीस एक लोग थे, साथ में महात्मा गांधी की तस्वीर भी थी, लोगों से कुछ पूछताछ करते चल रहे थे


उत्सुकता बढ़ी तो मैं रुका. सामने पुराने मित्र राकेश शर्मा दिखे. किसी वक्त वो एक बड़े नाम वाली पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. तब से अपने साथियों के बीच वो 'विधायक जी' के नाम से मशहूर हैं. बैनर पर 'युगांधर' नाम के जिस संगठन का जिक्र था, विधायक जी उसके अध्यक्ष हैं
मेरी उत्सुकता शांत करने के लिए विधायक जी ने बताया, 'आज से ठीक सौ साल पहले महात्मा गांधी मथुरा आए थे. 14 अप्रैल को उन्होंने मथुरा जंक्शन से मद्रास जाने के लिए ट्रेन पकडी थी. मद्रास जनता एक्सप्रेस'


विधायकजी और उनकी टीम इ​तिहास के झरोखे में झांककर मथुरा की गलियों में बापू के कदमों के निशान तलाशने निकली थी. जाहिर है, उस दौर का कोई शख्स महात्मा गांधी के दौरे की गवाही देने के लिए मौजूद नहीं है.


उम्मीद थी कि रेलवे को इस बारे में कोई जानकारी होगी. वजह ये है कि 1915 में द​क्षिण अ्फ्रीका से महात्मा गांधी की वापसी को केंद्र सरकार ने प्रवासी दिवस के मौके पर जोरशोर से याद किया. मथुरा जंक्शन पर
इन दिनों रेल सप्ताह भी मनाया जा रहा है. स्टेशन पर प्रदर्शनी लगाई गई है. उसमें रेलवे के लिए अहम तारीखों का जिक्र करते हुए एक बैनर लगा हुआ है. इस बैनर में भी बापू के मथुरा आने की कोई जानकारी नहीं है.






स्टेशन प्रबंधक केएल मीणा भी बापू के मथुरा आने और मथुरा जंक्शन से ट्रेन पकड़ने को लेकर अनिभिज्ञ थे. 
युगांधर कार्यकर्ताओं ने जब जानकारी दी तो उन्होंने बापू को नमन करने की रस्म जरूर अदा की.




मुझे युगांधर के महासचिव पुण्डरीक रत्न ने बताया कि मथुरा के विधायक प्रदीप माथुर, जो कांग्रेस पार्टी के प्रबुद्ध नेता हैं, को भी बापू के मथुरा आने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. बापू के पदचिन्ह तलाशते कार्यकर्ताओं ने जब माथुर से इस बारे में पूछा तो उन्होंने चौंककर कहा, 'अरे ऐसा है क्या?'

                        

ऐसे में मैने युगांधर के अध्यक्ष से पूछा कि आखिर उन्होंने इतिहास की इस अहम तारीख को कैसे याद रखा.
अध्यक्ष राकेश शर्मा ने कहा, 'हमारे यानी युगांधर परिवार के वैचारिक गुरु मधुकर उपाध्याय जी ने यह अहम जानकारी हमें दी. श्री उपाध्याय वरिष्ठ प़त्रकार और प्रखर गांधी वादी चिंतक है. महात्मा गांधी की वापसी पर उनकी 100 एपीसोड की सीरीज, खामोशी की दास्तां आकाशवाणी पर प्रसारित हो रही है.'
राकेश शर्मा उर्फ विधायकजी ने कहा कि जिस दिन सर ने हमें ये अहम जानकारी दी उसी दिन हमने तय किया कि मथुरा की ग​लियों मे घूमकर पड़ताल करेंगे और पता करेंगे कि क्या किसी को याद हैं कि महात्मा गांधी कभी मथुरा भी आए थे.


महात्मा गांधी की याद को तलाशने निकली विधायक जी के युगांधरों की टीम एक गाड़ी पर बैनर लगाकर पूरे दिन मथुरा, गोकुल और वृंदावन की गलियों में घूमी, लेकिन, उसे कहीं कोई ऐसा शख्स नहीं मिला जिसे मथुरा और बापू के मेल की याद हो.
बापू मथुरा आए थे तो यहां की गंदगी देखकर बहुत दुखी हुए थे. मथुरा आज भी साफ नहीं. स्टेशन बेहतर हो गया है. शहर की सूरत बदल गई है. गांधी के नाम पर पार्क है. विकास बाजार में उनकी बड़ी मूर्ति लगी है. शहर के व्यस्त चौराहे होलीगेट के पास गांधी आश्रम है. लेकिन, उन्हें याद करने वाले और उनके बताए रास्ते पर चलने वाले कम ही हैं. 


कम से कम सफाई को लेकर बापू के आग्रह को मथुरा ने पूरी तरह नजरअंदाज किया हुआ है. विधायक जी ने बताया कि उनका संगठन यमुना और मथुरा की सफाई के लिए जागरूकता अभियान चलाता है. संगठन ने कई बार घाटों की सफाई भी की है. 14 अप्रैल को, जिस दिन बापू ने मथुरा जंक्शन से मद्रास की टेन पकडी थी, युगांधर के कार्यकर्ता ​फिर से स्टेशन पर जुटेंगे. सफाई करेंगे और अपने बीच बापू के कदमों के निशान तलाशने की कोशिश करेंगे.

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

...राजगद्दी के पहले वनवास

                                                   एक 'युवराज' की अजब-गजब कहानी 





ये कहानी कलियुग की है. त्रेतायुग की उस मशहूर कहानी से इस का साम्य तलाशना पूरी तरह बेमानी होगा. राहुल गांधी और राम में समानता सिर्फ़ इतनी है कि दोनों का नाम 'रा' से शुरु होता है. 'भक्त' ये भी कह सकते हैं कि राम भी 'गद्दी' संभालने के पहले वन चले गए थे. लेकिन, राम का वनगमन मर्यादा से बंधा था. पिता के वचन की मर्यादा. इसका मान रखते हुए वो वन में ही 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हो गए. राम वन न जाते तो रामायण की कथा भी न होती. वनवास ने उन्हें पुरुष से महापुरुष और फ़िर भगवान बना दिया. 

                                         

राम की इस कहानी के उलट राहुल गांधी ने ख़ुद वनवास चुना. वो भी उस समय जब कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनकी ताज़पोशी की ख़बरें ज़ोरों पर थीं. राम माता कैकयी की नाराज़गी की वजह से वन गए थे तो राहुल गांधी ख़ुद नाराज़ बताए जाते हैं. ये जरुर है कि उन्हें भी जाने की इजाज़त मां ने ही दी. वो कहां हैं और कब लौटेंगे, इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है. हालांकि, सार्वजनिक तौर पर चुप रहने वाले कांग्रेस के नेता बिना पूछे ही बता देते हैं कि राहुल म्यामांर में हैं और 19 अप्रैल को कांग्रेस की किसान रैली के पहले दिल्ली लौट आएंगे. 



राम वन गए थे तो राजकाज से जुड़ी उनकी जिम्मेदारियां भरत ने संभाली थीं. राहुल की गैरमौजूदगी में कांग्रेस को संजीवनी देने का काम उनकी मां सोनिया गांधी को संभालना पड़ा. सोनिया बेटे की गैरमौजूदगी में इस कदर सक्रिय हुईं कि कई कांग्रेसियों ने दबे सुर में कहना शुरु कर दिया कि राहुल का वनवास जितना लंबा खिंचे पार्टी के लिए उतना ही अच्छा है. राम के राज संभालने का इंतज़ार हर किसी को था, लेकिन, राहुल के पक्ष में ऐसा कोई माहौल नहीं दिखता. कांग्रेस के जो नेता राहुल गांधी के वनवास की टाइमिंग पर सवाल उठा रहे थे, वो सोनिया की सक्रियता देखने के बाद कहने लगे कि अभी अध्यक्ष बदलने का सही समय नहीं. इनमें गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले संदीप दीक्षित जैसे नेता शामिल हैं. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी इशारों में राहुल पर निशाना साध चुके हैं. 


राहुल के नेतृत्व को लेकर कांग्रेस के नेताओं ऐसा रुख पहली बार नहीं दिखा. 2004 में सक्रिय राजनीति में आए राहुल गांधी के पांव जब कभी सियासी अखाड़े में उखड़ते दिखे कांग्रेस में एक ऐसी जमात सक्रिय हो गई, जो राहुल को पीछे करने और प्रियंका गांधी को आगे लाने की वकालत में जुट गई. पति रॉबर्ट वाड्रा पर लगे तमाम आरोपों के बाद भी राजनीतिक विश्लेषकों, मीडिया और वोटरों के बीच प्रियंका के लिए खास आकर्षण दिखता है. इंदिरा गांधी से उनकी तुलना होती है. राजनीति की कसौटी पर प्रियंका अब तक कसी नहीं गईं, लेकिन, 2014 के आम चुनाव में जब पूरी कांग्रेस बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के हमलों के आगे हांफ रही थी, तब अकेले प्रियंका थीं, जिन्होंने मोदी पर जमकर पलटवार किया. यूपी की रायबरेली और अमेठी सीट पर सोनिया और राहुल गांधी की जीत को भी प्रियंका का ही करिश्मा माना गया. लेकिन, सोनिया गांधी ने कभी राहुल को पीछे कर प्रियंका को आगे लाने की कोशिश नहीं की. इसके पीछे एक अजब थ्योरी बताई जाती है. भारत की तरह इटली में भी पितृसत्तात्मक समाज है. यानी उत्तराधिकारी बेटे को ही बनाया जाता है. प्रियंका भी अब तक राहुल के लिए चुनौती बनती नहीं दिखीं.

राहुूल को युवराज कहने वाले भी दलील देते हैं कि कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी की तरह काम नहीं करती. ये राजवंश की परिपाटी पर आगे बढती है, जहां सबसे अहम कुर्सी गांधी परिवार के लिए सुरक्षित है. कांग्रेस को सत्ता मिलती तो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहली दावेदारी राहुल गांधी की ही होती. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए जाने कितनी बार कहा था कि वो राहुल गांधी के लिए कुर्सी छोड़ सकते हैं. लेकिन, राहुल किसी और मिट्टी के बने हैं. उनके आगे जो कुर्सियां लगाई जाती हैं, उनमें वो कभी दिलचस्पी नहीं दिखाते. राहुल गांधी को जब कांग्रेस ने अपना उपाध्यक्ष चुना तो उन्होंने बड़े भावुक अंदाज में राज़ खोला कि उनकी मां ने बताया है,'हकीकत में सत्ता ज़हर है'.2014 के आम चुनाव में पूरी कांग्रेस चाहती थी कि राहुल ये ज़हर पी लें और नीलकंठ हो जाएं, लेकिन, नरेंद्र मोदी ने ये साध पूरी नहीं होने दी. 


कांग्रेस ने राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले प्रोजेक्ट तो नहीं किया, लेकिन, बीजेपी नेता ने  अपने पत्ते कुछ इस अंदाज में चले कि लड़ाई राहुल बनाम मोदी की हो गई. राहुल ये लड़ाई क्यों हारे, इसके कारणों की पड़ताल होती रहेगी, लेकिन, ये बताना जरुरी है कि ये राहुल की पहली हार नहीं थी. आम चुनाव के पहले राहुल ने यूपी के विधानसभा चुनाव में जान लगाई थी, लेकिन, वहां अखिलेश यादव ने उन्हें पटखनी दे दी, जो करिश्मे और अनुभव में मोदी के आगे कहीं नहीं ठहरते. दिल्ली के सियासी अखाड़े में राहुल को अरविंद केजरीवाल ने पीटा. हार के इस सिलसिले ने राहुल के राजनीतिक कौशल पर इतना बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया कि कांग्रेस उनके वनवास पर खुश होने लगी. कांग्रेस के अंदर से आती खबरें बताती हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस को बदलना चाहते हैं. वो नए प्रयोग और नए चेहरों को आजमाना चाहते हैं. पुराने कांग्रेसी ऐसा होने नहीं देना चाहते. इसी वजह से राहुल नाराज़ हैं.इतना तय है कि नाराजगी दूर होते ही राहुल गांधी लौटेंगे. देर सवेर उन्हें कांग्रेस की सबसे अहम कुर्सी भी मिल जाएगी, लेकिन, ये एक नेता के तौर पर उनके भविष्य बदलने की गारंटी नहीं. राहुल को अगर कांग्रेस का उद्धारक बनना है तो उन्हें रणछोड़ की छवि से पीछा छुड़ाना होगा. उन्हें पहले कांग्रेस को भरोसा दिलाना होगा कि वो पार्टी की तकदीर बदल सकते हैं. इसके बाद वोटरों का भरोसा जीतने की बारी आएगी. जब तक राहुल चुनौतियां के आगे अड़कर खड़ा होना नहीं सीखेंगे उन्हें गुस्सा आता रहेगा और कोई ना कोई वन उन्हें अपनी ओर खींचता रहेगा. इतना तय है कि इस वनवास से राहुल न राम बनेंगे और न ही गौतम बुद्ध. 

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

...कोई तो ये लिफ्ट चला दे

                  क्या आपने की है कभी ये गुजारिश?

बरसों पहले पाकिस्तानी सिंगर अदनान सामी का गाना अक्सर सुनाई दे जाता था. 'थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे.' शायद ही कोई होगा, जो इस गाने को सुनने के बाद मौला को उसकी ऊंची शान का वास्ता देकर लिफ्ट कराने की मांग न कर लेता हो. 

 लेकिन, लिफ्ट सिर्फ ऊपरी मंज़िल पर ही नहीं पहुंचाती. कई बार बीच में अटका भी देती है. यकीन मानिए जब लिफ्ट अटकती है, तो हलक़ में सांस भी अटक जाती है.
मैं ख़ुद भी इसका अनुभव कर चुका हूं. हां, अपना लिफ्ट में अटकना ख़बर नहीं बना. तमाम लोगों का लिफ्ट में क़ैद होना ख़बर नहीं होता. वजह साफ़ है, लिफ्ट जब जेल बनती है तो ख़बर सिर्फ तभी होती है, जब अटकने ख़ास हो या फिर लिफ्ट इतनी देर तक फंस जाए कि खुद ही ख़बर हो जाए.

                     

      दिल्ली के वसंतकुंज में गुरुवार को एक लिफ्ट अटकी. सिर्फ़ पांच मिनट के लिए. लेकिन, मज़ा देखिए उसका शोर सारी दुनिया में हो गया. इस लिफ्ट में भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह सवार थे. ये लिफ्ट ऐसी अटकी कि तमाम कोशिश के बाद भी आगे नहीं खिसकी. सीआरपीएफ के शौर्य दिवस के कार्यक्रम में शिरकत करने आए राजनाथ को लिफ्ट ने शौर्य प्रदर्शन के लिए मजबूर कर दिया. दरवाजा नहीं खुला तो राजनाथ को बाहर लाने के लिए लिफ्ट की छत खोली गई. 'धोतीधारी तिरेसठ साल के जवान' राजनाथ सिंह स्टूल पर चढ़ कर स्टंट करते हुए बाहर निकले.

                          

     इसके बाद जो ख़बरें चलीं उनमें राजनाथ के शौर्य की कहानियां थीं. लिफ्ट और मेट्रो में अटकने के तमाम अनुभवों के जरिए मैं यकीन से कह सकता हूं कि ऐसी स्थिति में सामान्य बने रहना वाकई शौर्य है. अमेरिका के नार्थ कैरोलिना की एक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर ली ग्रे बरसों अपने अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष दे चुके हैं कि लिफ्ट में सवार होने के बाद ज्यादातर लोग अटपटा महसूस करने लगते हैं.

                    


अगर लिफ्ट अटक जाए तो ये अटपटापन दीवानगी की हद पार कर देता है. जिन देशों में बहुमंजिली इमारतें बहुतायत में हैं, वहां लिफ्ट में लोगों के अटकने की घटनाएं आम हैं. अमेरिका के न्यूयॉर्क में एक लिफ्ट 40 घंटे से भी ज्यादा देर तक फंस चुकी है.
 हालांकि, कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो चाहते हैं कि अगर वो खास कंपनी में हों तो अच्छा हो कि लिफ्ट अटक जाए. एक मशहूर संपादक का गोवा का लिफ्ट का किस्सा तो जाने कितनी बार चटकारे लेकर सुनाया गया है. वो थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे गा रहे थे, लेकिन इस गुज़ारिश ने उन्हें धरातल पर ला दिया. अपना तो ये ही कहना है कि अब आप अगली बार अदनान का गाना सुनें तो इन तमाम किस्सों को याद करें, तभी मौला से गुज़ारिश करें... थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे.      


गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

अब शाहरुख बोले 'ज़्यादा बच्चे पैदा करो'

 

बॉलीवुड के किंग का 'साक्षी' अवतार

                                                 

शाहरुख़ खान कभी बीजेपी सांसद साक्षी महाराज से मिले हैं या नहीं कहना मुश्किल है. वो साक्षी महाराज की ख्याति से और सोच से कितने वाकिफ़ हैं, इसका भी अंदाज़ा नहीं. लेकिन, कोलकाता के ईडेन गार्डन्स मैदान पर मजाकिया अंदाज में दिए एक बयान से वो साक्षी महाराज की याद जरुर दिला गए. 

                               

                                  
       
मौका था, आईपीएल के ओपनिंग मैच का. शाहरुख की टीम कोलकाता नाइट राइडर्स ने मुंबई को 7 विकेट से हराकर ये मुक़ाबला जीता. शाहरुख ख़ान जीत की खुशी में मैदान पर उतर आए. जाने पहचाने अंदाज में उन्होंने मैदान के चारों ओर चक्कर लगाया. मैच देखने आए फैन्स का शुक्रिया अदा किया. शाहरुख के साथ उनका दो साल का बेटा अबराम और परिवार के दूसरे लोग भी थे. 

                               

थोड़ी देर बाद मैच ब्रॉडकॉस्ट कर रही कंपनी की कमेंट्री टीम ने शाहरुख को बातचीत के लिए पकड़ लिया. सवाल-जवाब शुरु हुए. अपनी जुमलेबाज़ी के दम पर टीवी के सबसे बोलनबीस गिने जाने वाले पूर्व क्रिकेटर और पूर्व सांसद नवजोत सिंह सिद्धू अर्से बाद किसी को खुद से ज्यादा तव्वजो देते दिखे. शाहरुख के सामने बिछे-बिछे से होने को बेताब सिद्धू ने एक ऐसा सवाल उछाला, मानो वो बॉलीवुड के किंग का दिल तारीफ़ों के जरिए ही जीत लेना चाहते हों. 

सिद्धू ने पूछा, '' खान साहब, उम्र बढ़ती जा रही है, लेकिन, जवानी को कैसे पकड़ रखा है. ''
शायद सिद्धू ने ये सवाल लाजवाब होने के लिए ही पूछा था. शाहरुख ने उन्हें निराश नहीं किया. वो बोले,'' बच्चे पैदा करो जवान बने रहो. ''  जवाब खत्म हुआ और ठहाका गूंज उठा. हो सकता है कि बात आई गई हो जाए. मजाक उसी पल का मेहमान रहकर खत्म हो जाए. अगर ऐसा हुआ तो ये इसलिए होगा कि शाहरुख राजनीति में नहीं हैं. उनका ताल्लुक हिंदूवादी पार्टी से नहीं है. उनके तीसरे बच्चे अबराम का जन्म सेरोगेट मदर के जरिए हुआ. 

                                   

ऐसा ना होता तो पहले उन्हें राजनीति की पगड़डियों के छिद्रान्वेषी दौड़ाते, फिर महिला संगठन घेरते और अगर इतने पर भी ज़ुबान का ज़ोर बचा रहता तो पीआईएल के महारथी रगड़ लेते. हालांकि, रगड़ा शाहरुख को भी कम नहीं गया है. साल 2012 में आईपीएल के दौरान शाहरुख खान की मुंबई के वानखेडे स्टेडियम के गार्ड्स से बहस हो गई थी. विवाद ने इस कदर तूल पकड़ा कि मैदान पर उनकी एंट्री बैन कर दी गई. ये टीस अब भी उन्हें परेशान करती है. इसका सबूत ईडेन गार्ड्न्स पर भी मिला, जिस वक्त शाहरुख ब्रॉडकॉस्टिंग टीम से बात कर रहे थे, उस वक्त उनका छोटा बेटा उछल-कूद मचाए था. 

                                     
शाहरुख की नज़र गई तो वो बोले, '' पकड़ो, कहीं उसे बैन ना कर दें ''. खै़र पकड़ने वाली बात ये है कि शाहरुख खान सज़ा को भी मजाक के तौर पर ले सकते हैं और बच्चे दर बच्चे पैदा करने को जवान बने रहने का नुस्खा बता सकते हैं, क्योंकि वो राजनीति में नहीं. वो क्रिकेट को तमाशा बनाने वाली ऐसी लीग से एक टीम के को-ओनर के तौर पर जुड़े हैं, जिसका रुख सिर्फ तमाशा देखने के लिए ही किया जाता है. और जब तमाशा कोई 'शाह' करे तो फिर कहना ही क्या ?