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रविवार, 17 अप्रैल 2016

दिल से जो मांगोगे दे देगी यमुना



नाव के बीचो- बीच बैठी जिस छोटी सी बच्ची की तस्वीर आप देख रहे हैं वो सिर्फ तीन बरस की है. 

नाम है सुरभि. 

उसकी सूरत जितनी प्यारी है, वो बातें भी उतनी ही अच्छी करती है. 

पढना सीख ही रही है. एबीसीडी... अ आ इ ई, 1,2,3,4 

उसने हाथ में जो तख्ती थाम रखी है, उस पर क्या लिखा है, पढ़ना उसके लिए मुश्किल है. 

लेकिन, उसने दूसरे बच्चों से पूछ लिया था कि तख्ती पर लिखा क्या है, और उसने बहुत सोच-समझकर इस तख्ती को थामा है. 

चैत्र महीने की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को यमुना षष्ठी के तौर पर मनाया जाता है. 

मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्य की पुत्री यमुना का जन्म हुआ था. 


जी हां, भारतीय तहजीब की प्रतीक नदी यमुना. हिंदुओं के लिए ये नदी श्रीकृष्ण की पटरानी होने के कारण पूज्य है. यमराज की बहन होने की वजह से इसका रुतबा थोड़ा और बढ़ जाता है. 

मुसलमानों को भी यमुना प्यारी है. 

जिस गंगा-जमुनी तहजीब की बात होती है, उसमें शायद यमुना को मुसलमानों के खाते में ही रखा जाता है. 

सुरभि को यमुना किनारे जाना, नाव से नदी पार करना बहुत पसंद है.

लेकिन, इसका मौका बेहद कम मिलता है. 

यमुना जब से मैली हुई, ब्रज क्षेत्र के स्थानीय लोगों में से कई ने नित्य स्नान और आचमन का क्रम छोड़ दिया. 

अब यमुना दर्शन तीज-त्यौहारों पर ही होते हैं. 

ऐसे में कृष्ण की कहानियों के साथ यमुना की लहरों पर तैरते-उतरते आज की पीढ़ी के बच्चे तरसे-तरसे रह जाते हैं. 

यमुना छठ के मौके पर सामाजिक संगठन 'युगांधर' ने फ़ैसला लिया कि वो बच्चों को यमुना दर्शन भी कराएगा और उनके जरिए यमुना सफाई की कसम उठाने वालों को उनके वादे याद कराएगा. 

मकसद दो थे. 

पहला ये कि छोटे बच्चे समाज में नदी की उपयोगिता को समझें और ये भी जानें कि अगर नदियां ऐसे ही गंदी होती रहीं तो आने वाली पीढ़ियों को विरासत में नदियां सिर्फ कहानियों में ही मिलेंगी. 

दूसरा ये कि तख्तियां थामे दूसरों को संदेश देने वाले बच्चों के दिमाग की स्लेट पर अगर ये बातें लिख गईं तो वो यमुना की सफाई में कोई सक्रिय योगदान दें या नहीं, लेकिन शायद अपने स्तर पर इसे और अधिक गंदा करने से बचेंगे. 

1970 और 80 के दशक में पैदा हुए बच्चों ने यमुना की कहीं बेहतर तस्वीर देखी थी. 

मथुरा में ही हर दिन छोटे-छोटे बच्चे सुबह- सुबह यमुना स्नान करने या फिर तैरने जाते थे. 

शाम को कछुओं के लिए आटे की गोलियां लिए घाटों पर जाते थे. 

लौटते वक्त यमुना जल भर लाते थे. 

इस पीढ़ी के जवान होते-होते यमुना इतनी बदल गई कि स्नान और पीना तो दूर लोग आचमन से भी बचने लगे. गंदगी ने यमुना को नई पीढ़ी से दूर कर दिया. 


आज यमुना के नाम पर शंख फूंकने वाले तो कई हैं लेकिन उसके दामन पर बढ़ते जा रहे गंदगी के पैबंदों के खिलाफ महाभारत करने वाला कोई नहीं. 

दुनिया बदलने की शुरुआत खुद को बदलने से की जाए तो अच्छा. 

बच्चों को यमुना छठ के मौके पर घाट और यमुना की गोद तक लाने का मकसद यही था. 

'युगांधर' ने नारे लिखने और तख्तियां तैयार करने का काम भी बच्चों के जिम्मे सौंपा. 

यकीन मानिए हर बच्चा बहुत उत्साह में था. 

लिखते वक्त बच्चे नारे जोर-जोर से बोलते रहे. 

कंप्यूटर से प्रिंट निकाला 

कागज के बराबर साइज का गत्ता काटा 

गोंद लेकर उसे चिपकाया और अपने-अपने हिस्से की तख्तियां सब बच्चों ने थाम लीं. 

जिस वक्त तख्तियों का बंटवारा हो रहा था. सुरभि ने डिमांड की, उसे "श्री यमुना की सफाई तक नहीं थमेंगे,नहीं झुकेंगे, नहीं रुकेंगे" लिखी तख्ती चाहिए. 

हर प्यारे बच्चे की तरह सुरभि भी थोड़ी जिद्दी है. 

नहीं थमेंगे, नहीं झुकेंगे वाला जज्बा जो ऐसे बच्चों में अक्सर दिखता है, उसमें भी है. शायद यही वजह रही होगी कि उसने ये तख्ती चुनी. 
सुरभि के सलेक्शन ने गांधीवादी चिंतक और पर्यावरणविद अनुपम मिश्र जी की कही बात याद दिला दी. 

कुछ बरस पहले 'युगांधर' सदस्य अनुपम जी से मिलने दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंचे. 

पानी पर युगांतकारी काम का अनुभव रखने वाले अनुपम जी ने बहुत सी बातें बताईं. 

आखिर में कहा, 'यमुना से जिसने जो मांगा, उसे मिला. पैसा मांगा, मिला. नाम मांगा, मिला. दिल से उसकी सफाई मांगोगे वो भी मिलेगा'. 

'मांग के तो देखो'. 

अब तक सफाई के नाम पर 'ढपोरशंखों' को देखते रहने के बाद भी सुरभि के तेवर देखकर लगता है कि उसकी पीढ़ी यमुना से सफाई मांग लेगी. 

अनुपम जी की बातें याद करते हुए कहूं तो ये जरुरी भी है. 

अनुपम जी ने ये भी कहा था, 'ये मत भूलो यमुना यमराज की बहन है. अभी शिकायत भाई तक नहीं पहुंची है. सोचो अगर उसने कभी फरियाद कर दी तो बहन के लिए यमराज क्या कुछ नहीं कर सकते?' 

डरिए मत, सुरभि जैसे बच्चों पर भरोसा रखिए. (राकेश शर्मा, युगांधर के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. उनसे युगांधर के फेसबुक और ट्विटर अकाउंट पर संपर्क किया जा सकता है.)

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

उनकी समझ पे हंसिए और समझिए ...

रेस में क्यों हार रही है कांग्रेस?





 यकीन कीजिए, आनंद शर्मा को देखकर पहले कभी हंसी तो क्या मुस्कराहट तक नहीं आई थी. 

भले ही उन्हें राजनीति में ज्यादा गंभीरता से न लिया जाता हो लेकिन वो 'दिग्गी राजा' की तरह दुनिया को हंसाने का हुनर भी नहीं जानते. 

लेकिन, कल मुस्कराहट भी आई और हंसी भी. वजह बना आनंद शर्मा का एक बयान. 

वो कह रहे थे, 'मैं कहूंगा एक दुख की भी बात है. परिहास भी है. एक क्रूर मज़ाक कि जो जवाहर लाल नेहरू के आलोचक और विरोधी हों उनको जवाहर लाल नेहरू के नाम से जुड़ी संस्थाओं में लगा दो. जो इंदिरा जी के आलोचक और विरोधी हों उनको इंदिरा से जुड़े संस्थानों में लगा दो'. 

आनंद शर्मा ने ये बयान 'इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र' यानी 'इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स' में हुए बदलाव को लेकर दिया. 


केंद्र का अध्यक्ष वरिष्ठ और बेहद सम्मानित पत्रकार श्री रामबहादुर राय को बनाया गया है. 

पत्रकारिता में ओजस्वी करियर के पहले राय साहब जेपी आंदोलन के अगुवा नेताओं में थे. 

आनंद शर्मा इसी पृष्ठभूमि की ओर संकेत कर रहे थे. 

मुझे हंसी इसी वजह से आई. 

उम्मीद की जाती है कांग्रेस का नेता अपनी पार्टी का इतिहास जाने. 


 पार्टी का पूरा इतिहास न पता हो तो कम से कम 'गांधी परिवार' खासकर इंदिरा जी के बारे में जानकारी होने की तो उम्मीद की ही जाती है. 

सवाल ये है कि क्या आनंद शर्मा जानते हैं कि इंदिरा सरकार के खिलाफ 'संपूर्ण क्रांति' का नारा देने वाले लोकनायक जय प्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी के बीच क्या रिश्ता था? 

आप निश्चित ही जानते होंगे. 

ये बेहद करीबी रिश्ता था. चाचा और भतीजी का रिश्ता. 

और ये उस दौर का रिश्ता था जब संबंध स्वार्थ की डोर से नहीं बंधे होते थे. उनमें अपनेपन की गर्माहट होती थी. 

लेकिन ये वो समाज है, जहां देशहित के सामने रिश्ते का मोह नहीं ठहरता. 

रामायण, महाभारत से लेकर जेपी तक की गाथा यही बताती है. 

देश और समाज के प्रति कर्तव्य के इसी बोध की वजह से भारतीय लोकतंत्र की जड़ें गहरी भी हैं और मजबूत भी. 

लोकतंत्र में विरोध व्यक्ति नहीं विचारों का होता है. 



 जेपी ने अपनी भतीजी के खिलाफ संघर्ष का बिगुल लोकतंत्र की इसी आदर्श आचार संहिता की वजह से बजाया.

इंदिरा कुर्सी से हटीं तो रिश्ते फिर बदले.

जेपी को भतीजी की चिंता भी हुई.

उन्होंने एक दिन इंदिरा जी से पूछा, 'अब तुम प्रधानमंत्री नहीं हो तो तुम्हारा खर्चा कैसे चलेगा?'

ये लोकनायक नहीं चिंतित चाचा का सवाल था.

इन्हीं जेपी ने राय साहब को अपने आंदोलन की अगुवा रही 11 लोगों की कमेटी में जगह दी थी. निश्चित ही उनके आदर्शवाद से प्रभावित होकर.

उस आंदोलन में नारे भर दोहराने वाले भारतीय राजनीति में कहां से कहां तक पहुंच गए बताने की जरुरत नहीं.

लेकिन, ये सवाल जरुर पूछा जाना चाहिए कि राय साहब ने क्या फायदा लिया? 

जवाब है कुछ नहीं. 

लोकतंत्र की मजबूती के लिए हुए 'संपूर्ण क्रांति' के यज्ञ से निकले 'सत्ता के अमृत कलश' को हाथ तक न लगाने वाले संभवत राय साहब इकलौते 'बैरागी' हैं. 

उनका अनुकरणीय पत्रकारिता करियर भी आदर्शवाद की मिसाल है. 

यही वजह है कि उनकी नियुक्ति की हर तरफ दिल खोलकर सराहना हुई. 

नरेंद्र मोदी सरकार के ये उन चंद फैसलों में हैं जिसे सरकार के वैचारिक विरोधियों ने भी सराहा. 

लोगों ने यहां तक कहा, 'कुर्सियां कुछ लोगों का मान बढ़ाती हैं और कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनसे कुर्सियों का मान बढ़ता है. राय साहब के बैठने से कुर्सियां ही गौरवान्वित होती हैं.' 

आनंद शर्मा को ये भी समझना चाहिए कि राजनीति में विपक्ष का काम सिर्फ विरोध करना नहीं होता. 

विपक्ष में अच्छे और रचनात्मक फैसलों की सराहना करने की समझ भी होनी चाहिए.

इसी समझ की वजह से अटल बिहारी वाजपेयी ने 1971 की जंग में इंदिरा जी की तारीफ की थी. और उसके काफी पहले नेहरु जी अटल जी की तारीफ करते थे. 

इंदिरा जी होतीं तो उन्हें ये गुर जरुर सिखातीं. 

इस समझ के अभाव में ही बटवृक्ष रही कांग्रेस  छुईमुई का पौधा होती जा रही है.

कांग्रेस को ये भी समझना चाहिए कि इंदिरा जी के नाम पर बनाए गए तमाम संस्थानों की कुर्सियां रेवड़ियों की तरह बांटने की वजह से ही  इन संस्थानों की चमक खोती चली गई. 

ऐसे संस्थान इंदिरा जी के ख्यातिनाम का पूरक बने इसके लिए इन संस्थानों की कमान वास्तविकता में कर्तव्य की मर्यादा से बंधे लोगों के हाथ होनी चाहिए. 

आनंद शर्मा समझें ना समझें, हम आप जानते हैं कि हमारे समाज में मर्यादा की स्थापना ही 'राम' नाम के महापुरुषों ने की है. 

आपको रामनवमी की शुभकामनाएं. 


सोमवार, 11 अप्रैल 2016

मां ने कहा था....

'आग से मत खेलना' 



हे मां!

खुशी के वक्त आप जिसे चाहे याद करें.

दुख, दर्द, तकलीफ, मुश्किल, परेशानी और बुरे वक्त में तो मां ही याद आती है.

क्यूं ?

दिमाग और दिल भरोसे की उस मजबूत बुनियाद पर यकीन करते हैं, जिसे उन्होंने बचपन से परखा होता है.

भूख लगे तो मां खाना खिलाती है.

चोट लगे तो मां जख्म सहलाती है. आंसूं पोछती है. आंचल की छांव में छुपाकर सारा दर्द छीन लेती है.

मुश्किल वक्त हो तो उम्मीद भरी बातों से हौसले के टिमटिमाते चिराग को सूरज की तरह रौशन कर देती है और चुनौतियों का अंधेरा खुद ही दूर हो जाता है.

फेल होने पर ताना नहीं देती.

कहती है, 'चल फिर ट्राई कर, तू तो टॉप करेगा'. 


देवी मंदिरों में जाने वाले भक्त भी 'मां' पर इसी भरोसे की वजह से कतार लगाते हैं.

फिर क्या वजह है कि मां के आंगन में, उसकी आंख के सामने ही उसके सौ से ज्यादा बच्चे भस्म हो गए.

साढे तीन सौ से ज्यादा झुलस गए.

वो मां के आंगन में खुशी खोजने आए थे. उनके हिस्से मातम को लिख गया.

प्रधानमंत्री और मुख्यमत्री की विजिट के बीच सक्रिय हुए प्रशासन ने जांच का आदेश दे दिया है.

लेकिन, जांच इस एंगल से नहीं होगी, इसका यकीन है.

किसी का 'ताव' भी नहीं कि ऐसे सवालों का जवाब दे सके


ग़म में पूरा देश शरीक है.

जिनके पास संवेदनाएं हैं, उन्हें हर तरह का हादसा हिला देता है.

चोट भले ही दूसरे को लगे. खून भले ही किसी और का बहे. आंखें उनकी नम हो जाती हैं.

मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानता हूं जो बेवजह अस्पतालों का रुख नहीं करते

वो खुद का दर्द तो बर्दाश्त कर जाते हैं लेकिन दूसरों को कराहते देख नहीं पाते.

हालांकि, जब मानवता पुकारती है तो ऐसे लोग कलेजा पत्थर करके मदद के लिए सबसे आगे दिखते हैं.

केरल में भी ऐसे लोग जरुर आगे आए होंगे.    


हादसों में 'बर्न केस' सबसे ज्यादा तकलीफदेह होते हैं.

चोट का दर्द सह लिया जाता है. लेकिन जलन असहनीय होती है.

बारुद से घायल होने वालों को हफ्तों और महीनों तक चैन नहीं मिलता.

सरकारों ने मुआवजों का एलान कर दिया है. मुख्यमंत्री ने कहा, 'मरने वालों को दस लाख'. प्रधानमंत्री ने कहा, 'दो लाख'.

मुआवजे का मरहम तकलीफ कम कर पाएगा, कहना मुश्किल है.

मुश्किल तो वो सवाल भी है, जो शुरु में पूछा था.

कोल्लम के मंदिर में बैठी जो 'मां' सौ साल से अपने बच्चों की मन्नत पूरी कर रही थी.

वो इस हादसे को क्यों नहीं रोक पाई?

देवी ने कोई चमत्कार क्यों नहीं किया?

सौ बार जब ये सवाल सुने तो मां की सुनाई दो कहावतें याद आ गईं

'आग और पानी खेलने की चीज नहीं'

हर मां अपने बच्चों को बार-बार ये याद दिलाती है. हिदायत देती है. कभी मनुहार करती है, कभी डांटकर बताती है.

शायद वो ऐसे ही डर की तरफ इशारा करती है.

और फिर यहां तो आतिशबाजी, पटाखों और बारूद का पूरा ढेर था.

देखने वालों और सुनने वालों ने बताया है कि धमाके की गूंज एक किलोमीटर दूर तक सुनाई दी


दूसरी कहावत है, 'जानकर जड़ करें और देव को दोष दें'.

यानी आप गलतियां खुद करें और दोष देवताओं पर लगा दें.

कहने का मतलब ये कतई नहीं कि पीड़ितों ने गलती की. लेकिन कोल्लम में गलतियां हुईं. एक नहीं कई.

आस्था के ऐसे मेलों में जहां हज़ारों हज़ार लोग जुटते हैं आग का खेल कितना घातक हो सकता है, इस बात का अंदाजा नहीं लगाने वाले क्या देवी मां के आंगन में खड़े होने के हकदार हैं?

गौर कीजिएगा. अगर कहीं दीपक जलता हो और बच्चा उसके पास जाए तो मां दौड़कर उसे खींच लाती है

दीपक को ऐसी जगह रख देती है जहां तक बच्चे की पहुंच न हो.

मां ने इशारा यहां भी दिया होगा लेकिन अंधी होड़ में देखने समझने की जहमत किसने उठाई

प्रशासन कहता है, 'हमने अनुमति नहीं दी'.

ठीक है अनुमति नहीं दी होगी लेकिन जहां आतिशबाजी का ऐसा बड़ा तमाशा हुआ हो, हज़ारों की भीड़ जुट रही हो तो क्या सिर्फ एक एप्लीकेशन लौटाने भर से प्रशासन का काम पूरा होता है


अपना इरादा शासन, प्रशासन, सरकार और आयोजकों को कोसने का नहीं.

हम तो उस 'बरहामन' को कोस रहे हैं जिसने वर्ष प्रतिपदा के दिन ग़ालिब की ग़ज़ल सुनाते हुए कहा था, 'ये साल अच्छा है'.

कोल्लम की तकलीफ में हम सब शामिल हैं

लेकिन क्या हम इस हादसे से सबक लेंगे?  

रविवार, 10 अप्रैल 2016

सलाम कि तुम 'पप्पू' हो



                                                   
'पप्पू'

भाई लोग कहते हैं ये नाम उस पर सूट करता है.

जावेद अख्तर ने जब गाना लिखा, 'पप्पू कान्ट डान्स साला' , उसका नाम उसके काफी पहले रखा गया था.

एक चर्चित राजनीतिक शख्सियत के लिए सोशल मीडिया पर 'पप्पू' उपनाम पॉपुलर होने से बहुत- बहुत पहले.

अस्सी के दशक में मां-बाप बच्चों के ऐसे ही नाम रख लेते थे.

घर के पुकारू नाम.

पप्पू, गुड्डा, मुन्ना, कालू, ...

मैंने तो एक बार पूछ भी लिया था.

'यार, आजकल पप्पू का मतलब तो निपट चू ि ् माना जाता है. तुझे बुरा नहीं लगता, तेरा नाम पप्पू है'.

वो हंसकर रह गया.

ऐसा नहीं है कि उसे सवाल समझ न आया हो.

ऐसे भी वो मेरे मुश्किल सवालों को दरकिनार ही कर देता है. कभी हंसकर. कभी बहाने बनाकर

लेकिन दिलचस्प ये है कि जैसे ही वो कोई बहाना बनाता है, झूठ झट से पकड़ में आ जाता है.

उसके बहानों के लिए मैंने कई बार उसकी कान खिंचाई भी की है. सरेआम

मसलन, समोसे के साथ मिलने वाली लाल मीठी चटनी को ब्रज क्षेत्र में सोंठ कहा जाता है. 

मिर्च नहीं खाने वाले सोंठ खूब पसंद करते हैं. 

एक बार हम दोस्त बैठे गप लगा रहे थे. पप्पू से समोसे लाने को कहा गया. साथ में सोंठ भी लाने की हिदायत दी गई. 

भाई लौटा तो सोंठ नहीं लाया. 

सवाल हुआ तो बोला, 'सोंठ खत्म हो गई थी'. 

पप्पू इतने पर रुकता तो फिर वो पप्पू ही क्या? 

उसने आगे कहा. 

'दुकानदार बोला, सोंठ नहीं है बक्खर ले जा. अब मैं बक्खर क्या लाता'. 

अगर आप नहीं जानते तो बताना जरुरी है, बक्खर चीनी की उस चाशनी को कहा जाता है जिसमें जलेबी और इमरती को डुबोकर मीठा बनाया जाता है. 

पप्पू का जवाब सुनते ही कुछ साथी हंसे. कुछ मुस्कुराए पर अपना पारा चढ़ गया. 

लेकिन, पप्पू ज़िद्दी इतना कि बात मुंह से निकल गई तो फिर पीछे हटने को तैयार नहीं. 


भाई लोग ये किस्से भी सुनाते हैं कि वो अपने पैसे कितने एहतियात से रखता है. 

साथ में सफ़र करना हो और टिकट लाने की जिम्मेदारी पप्पू के नाम हो तो यकीन मानिए आते ही सबसे उनके हिस्से की रकम वसूल लेगा. 

ऐसा अपना अनुभव नहीं. बाकी साथियों का कहना है. 

दोस्त ऐसे ही और भी किस्से सुनाते हैं. 

और पप्पू के 'पप्पू' होने पर खूब चुटकी लेते हैं. उसे कंजूस बताने वालों की भी कमी नहीं. 

अपनी राय भी ऐसी ही बातों पर बनती बिगड़ती थी. 

लेकिन पप्पू ने अभी एक झटके में आंख खोल दी. बता दिया कि कही, सुनी बात को लेकर किसी की ब्रांडिंग करना ठीक नहीं. 

कई बार तो आंखों देखी बातें भी सच की पूरी तस्वीर पेश नहीं करतीं. 

पप्पू जहां काम करता है, वो एक ट्रस्ट है. गायों की सेवा भी करता है. 

गोवंश यानी गाय, बछड़े, बछिया या फिर सांड़ों के मरने पर उनको समाधि देता है. 

बीते दिनों पप्पू को भी इस काम में लगाया गया. सुपरविजन करने के लिए. जरुरत पड़े तो बाकी कर्मचारियों की मदद के लिए. 

पूरी प्रक्रिया में मदद करने वालों को मेहनताना भी मिलता है. 

200 रुपये. 

दस मौके मिले महीने में तो दो हज़ार रुपये. 

पप्पू की अब तक जो तस्वीर गढ़ी गई थी, उसके मुताबिक ये रकम कम नहीं है. 

पप्पू को जब पहली बार इस काम पर भेजा गया तो लौटकर आने पर उसे 200 रुपयों की पेशकश हुई. 

पप्पू ने इनकार कर दिया. 

सवाल हुआ 'क्यों नहीं लोगे?'. 

पप्पू ने कहा, 'गाय मां है, मां की सेवा के पैसे नहीं लूंगा'. 

सवाल पूछने वाले ने कहा, 'बड़े अधिकारी बुलाकर कहेंगे तो?' 

पप्पू ने कहा, 'कह दूंगा, चारा मंगाकर गायों को खिला दो साहब'.

'और ये भी समझ लो साहब, पैसे नहीं लूंगा तो ये मत समझना कि काम नहीं करूंगा'. 

'महीने में रोज़ जाना होगा तो जाऊंगा'.  


गायों को लेकर देश में बड़ी बहस छिड़ी है. 

पप्पू कभी ऐसी बहस में नहीं पड़ता. कम से कम मैंने नहीं देखा. 

उसके देखे सुने अंदाज से जो तस्वीर बनी थी, उसके मुताबिक भी अपनी सोच होती कि पप्पू पैसे छोड़ नहीं सकता. 

लेकिन, वाह भई पप्पू . मौके पर चौका जमा दिया. 

सामने नहीं किया. लेकिन अब लिख के सरेआम पूरी दुनिया के सामने कहता हूं 'सलाम पप्पू' . 

इसलिए नहीं कि उसने कमाई के एक जरिए को किनारे किया. 

बल्कि इसलिए कि सिर वही है जो सही चौखट पर झुके. हर कदम को चूमने वाला 'चापलूस' सबको पसंद भले ही आ सकता हो लेकिन क्या वो मां का मोल लगाने से बच पाएगा. 

गाय को वोट के बाज़ार में उतारने वालों से पूछ के देखिए.

बुधवार, 23 मार्च 2016

कृष्ण खेलें होली

और तरसें हम गोरे-काले...

 चेहरे पर रंग चढ़ा हो फिर क्या पता, कौन गोरा है और कौन काला.

सबको समान बना देने वाला होली जैसा कोई उत्सव दुनिया के किसी हिस्से में होता हो तो बता दें.

और अगर आप ब्रज की गलियों में पहुंच जाएं तो बरसाना से लेकर नंदगांव और मथुरा- वृंदावन तक में गुलाल के गुबार के बीच लाठियां लेकर पुरुषों को दौड़ाती महिलाओं के दर्शन न हों, ये मुमकिन नहीं.

ये दृश्य अब से नहीं पांच हज़ार साल पहले से दिखते हैं. महिला अधिकारों और नारी स्वतंत्रता को लेकर शुरू हुई बहसों से हज़ारों साल पहले से.

यही कृष्ण का दर्शन है और यही उनकी कृपा.

अन्याय और असमानता का रोना रोने से समानता आ सकती है या नहीं, ये बहस का मुद्दा है.
कृष्ण कभी ऐसी बहस में नहीं पड़े.

उन्होंने उत्सवीय परंपराओं को ऐसे मोड़ दे दिए कि हंसते- खेलते, आनंद मनाते ऊंच-नींच के भेद मिटते चले गए.

कृष्ण की पिचकारी से प्रेम रंग निकला. राधा भींगी और नाराज़ होकर कान्हा की तरफ लाठी लेकर दौड़ीं. ये लाठी अधिकार की थी. 

इसने ब्रज की महिलाओं के हाथ को इतना शक्ति संपन्न बना दिया जिसका बल पांच सहस्त्राब्दियों के बाद भी कम नहीं हुआ है. 

फागुन के महीने में लाठियों की ये बारिश देखने देश दुनिया से अनगिनत लोग ब्रज की गलियों में जुटते हैं. वो कृष्ण युग की परंपराओं से क्या सीखते हैं पता नहीं लेकिन वो उतने पल के लिए कृष्ण या राधा बन जाते हैं जितनी देर ब्रज की धूल में मिला रंग-गुलाल उनके चेहरे पर चिपका रहता है. 

कृष्ण का महारास हो या फिर होली का उल्लास. हर तरफ कृष्ण थे क्योंकि वहां मौजूद हर कोई कृष्ण हो गया. 
लेकिन कृष्ण बने रहना आसान नहीं. कृष्ण होकर आप शिकायत नहीं कर सकते. आनंद, उल्लास और प्रेम में रो तो सकते हैं लेकिन अवसाद के सागर में डूबे नहीं रह सकते. 
जिन्हें झीकते रहने की आदत है, वो क्षणिक आनंद के बाद अपने गोरे- काले चेहरे लिए कृष्ण लोक से बाहर आ जाते हैं. 

और जो कृष्ण बने रहते हैं, उनके लिए हर दिन होली का उत्सव है और हर तरफ आनंद है. जहां कृष्ण है वहां उमंग, उल्लास और उत्साह के रंगों की बरसात के अलावा कुछ और हो ही नहीं सकता. 

यकीन न हो तो इस होली कृष्ण होकर देखिए. 

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

आपने हंसाया और

हम वोट दे आए... 


इरादा अपनी पीठ ठोकने का नहीं है. 

कतई नहीं. 

ऐसी उम्मीद भी नहीं कि कोई मुझे राजनीति का पंडित, विश्लेषक या फिर जनता की 'नब्ज' का पारखी माने. 

फिर नतीजों को लेकर मैंने कोई गारंटीशुदा बात भी नहीं की थी. 

पहले जो कहा था, आज भी बस वही दोहराऊंगा. 

मैंने कहा था कि बिहारी 'बुड़बक' नहीं है. 

http://raishumari.blogspot.in/2015/10/blog-post.html

और, बिहार विधानसभा के चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले होंगे. 

और जीतेगा वही जो सबसे ज्यादा 'एंटरटेन' करेगा 

http://raishumari.blogspot.in/2015/04/blog-post_16.html

मांझी एंटरटेनर थे लेकिन नई पार्टी को कामयाबी दिलाने के दबाव ने उनके मसखरेपन को गुम कर दिया. 

नरेंद्र मोदी ने कोशिश की लेकिन लोकसभा जैसा माहौल नहीं जमा पाए. 

वो ज्यादातर वक्त एंग्री सुपरमैन के रोल में रहे. चीखते, चिल्लाले, कोसते या शिकायत करते दिखे. 

लंदन में मोदी का जो अंदाज दिखा, उसकी झलक भर बिहार में दिखा दी होती तो वोटर इस कदर नहीं रूठते. 

बीजेपी के बाकी नेता शायद 'हंसने-हंसाने' में यकीन ही नहीं करते. 

खास किस्म के अनुशासन ने शायद उनका 'सेंस ऑफ ह्यूमर' विकसित ही नहीं होने दिया. 

या फिर वो शायद ये मानते हों कि हंसे तो 'राष्ट्रवादी' बुरा न मान जाएं. उन्हें 'नॉन सीरियस' न समझा जाए.

एंटरटेनमेंट में बाजी मारी लालू प्रसाद यादव ने. 

अमित शाह लिफ्ट में फंसे तो उनके पेट का नाप लेने लगे. 

प्रधानमंत्री के समर्थक रैलियों में जिस तरह उन्हें चीयर करते हैं, उसकी बार-बार नकल की. 

मोदी ने बिहार के लिए स्पेशल पैकेज का ऐलान किया तो उसकी मिमिक्री करने लगे. 

और तो और, एक रैली में मंच पर पंखा गिर गया तो भी हंसने-हंसाने से नहीं चूके.

मुश्किल सवालों का जवाब भी हंसते-हंसते दिया. 

मुलायम सिंह यादव महागठबंधन से अलग हुए. 

पूछा गया कि समधी छोड़ गए तो लालू ने कहा, 'मेरे दो साले भी मुझे छोड़ चुके हैं'

जवाब सुनते ही ठहाके गूंज पड़े  

लंबे वक्त के बाद चुनावी मौसम में लालू हंसे भी खूब- हंसाया भी खूब. 

लालू के आसपास कोई आ ही नहीं पाया. तो वोटरों ने हंसते-हंसते उन्हें सबसे ज्यादा सीटें थमा दीं. 

हर वक्त सीरियस रहने वाले नीतीश कुमार भी वोटरों को एंटरटेन करने में पीछे नहीं रहे. 

क्या आपको याद है, पहले कभी नीतीश ने पेरोड़ी की थी, वो भी थ्री ईडियट स्टाइल?

और, जो लोग इन नतीजों को यादव, कुर्मी, ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत यानी जातिगत वोटिंग के खांचे में देख रहे हैं, उनसे विनम्रता के साथ मैं कहना चाहता हूं कि सर जी आपसे मैं इत्तेफाक नहीं रखता. 

जातिगत समीकरण देखकर टिकट सिर्फ महागठबंधन ने नहीं दी थी. 

भारतीय जनता पार्टी के आधुनिक 'चाणक्य' अमित शाह ने भी दी थी. 

जाति का यही फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में भी आजमाया गया था. तब भी वोटरों ने जाति और जुमलों से अलग अपनी पसंद की लाइन ली थी. 

अब भी यही किया है. वो आगे भी यही करेंगे. 

बिहार के वोटर खुशनुमा माहौल पसंद करते हैं. चीखते- चिल्लाते, रोते- धोते, शिकायत करते नेता उन्हें रास नहीं आते. 

अगली बार बिहार के समर में उतरें तो याद रखिएगा, वोटरों को एंटरटेन करेंगे तो जीत गारंटी के साथ मिलेगी. 

जाति के गणित पे बिहार के चुनाव में जुआ खेलना चाहेंगे तो वोटर धम्म से जमीन पर पटक देंगे. 

'पक्के' वोट बैंक के बाद भी लालू जी ने दस साल पटक ही खाई थी. 

और, जिस 'जाति' को चुनाव में उन्होंने दरकिनार किया, उससे उनके जुड़ाव के कुछ अनसुनी कहानियां स्टोर में हैं. आप कहेंगे तो किसी दिन वो भी बयान कर दी जाएंगी. 

सोमवार, 2 नवंबर 2015

वीरु बोले तो...

एक बदकिस्मत 'सुल्तान'

उन दिनों क्रिकेट किसी फितूर की तरह सिर पर सवार रहता था. 

सचिन बैटिंग कर रहे हों तो फिर कोई भी काम इतना जरूरी नहीं लगता था जिसे उनकी पारी खत्म होने तक टाला न जा सके. 

जुलाई- अगस्त 2001 की उस सीरीज़ में सचिन तेंदुलकर नहीं खेल रहे थे. 

क्रिकेट देखने की सबसे बड़ी वजह ही मौजूद न हो तो मैच छोड़ा भी जा सकता था. 

तो मैने स्कूटर उठाया और फतेहपुर सीकरी जाने वाली सडक पकड़ ली. 

आना-जाना मिलाकर कोई डेढ सौ किलोमीटर का सफर था. मुझे उम्मीद थी कि छह घंटे में लौट आऊंगा और मैच अगर 50 ओवर तक चला तो आखिरी ओवरों का खेल देखने को भी मिल जाएगा. 

हुआ भी यही. न्यूज़ीलैंड के खिलाफ उस मैच को भारत ने छियालीसवें ओवर में ही जीत लिया और मैंने द्रविड़ को विनिंग शॉट लगाते देखा. मिडऑफ बाउंड्री को पार करती गेंद चार रन के लिए निकल गई. 

लेकिन इस जीत से ज्यादा चर्चा उस बात की थी जिसे मैंने मिस कर दिया. 

हर कोई सचिन तेंदुलकर के 'क्लोन' की बात कर रहा था. 

ये क्लोन थे वीरेंद्र सहवाग. ये सहवाग का पहला मैच नहीं था. वो 1999  में टीम में आए थे और इस मैच के पहले 14 मैच खेल चुके थे. एक हाफ सेंचुरी भी जमा चुके थे  मिडिल ऑर्डर में बल्लेबाजी करते हुए. लेकिन, उन पर किसी का ध्यान गया हो, ये आज मैं दावे से नहीं कह सकता. 

लेकिन, सिर्फ सात घंटे में वो क्रिकेट की दुनिया की सबसे बड़ी 'सनसनी' बन चुके थे. 

उस दौर में सचिन तेंदुलकर का क्या रुतबा था, इसे आज चाहकर भी बयान नहीं किया जा सकता. 

बस ये समझिए कि सचिन हिंदुस्तान की धड़कन थे. 

आज की तरह उन दिनों क्रिकेट सिर्फ एक खेल भर नहीं था. 

वो वक्‍त वनडे के सबसे सुनहरे दौर में से एक था. 

और सचिन वनडे के सबसे बड़े खिलाड़ी थे. सिर्फ रिकॉर्ड के दम पर नहीं. बल्लेबाजी की उस रौबीली शैली की वजह से जो तब के जानकारों के मुताबिक उनके पहले सिर्फ विवियन रिचर्ड्स के पास थी. 

भारत ने श्रीकांत जैसे विस्फोटक ओपनर का खेल देखा था लेकिन श्रीकांत की अपनी सीमाएं थीं. 

और सचिन, उन्हें तो उस दौर में किसी सीमा में बांधना ही मुमकिन नहीं था. 

वो गेंदबाजों को पीटते भर नहीं थे, उनके धुर्रे बिखेर देते थे. अकरम से लेकर मेक्ग्रा और वार्न से लेकर मुरलीधरन तक सचिन के आगे सहमे और सिमटे दिखते थे. 

मैंने पहले सुना फिर रिपीट टेलीकास्ट में देखा. कोलंबो में न्यूज़ीलैंड के खिलाफ उस मैच में सहवाग सचिन तेंदुलकर की कार्बन कॉपी थे. 

वही विस्फोटक अंदाज. वैसा ही बैकफुट पंच, वही फ्लिक, उसी अंदाज में कट. 

सचिन के सम्मोहन में जकड़े कमेंटेटर उनकी 'कॉपी' पर भी कुर्बान थे. 

उन दिनों समाचार चैनलों की क्रांति शुरु ही हुई थी. 

मैच का टेलीकास्ट करने वाले चैनल का प्रसारण थमा और न्यूज़ चैनलों ने सहवाग की पारी घुमा-घुमाकर दिखानी शुरु कर दी. 

उनकी सचिन से इतनी तुलना हुई कि इस मैच के बाद सहवाग को नया नाम मिल गया 'नजफगढ़ का तेंदुलकर'. 

उन दिनों सहवाग जिस बेबाकी से खेलते थे, बोलने में भी उतने ही बेबाक थे. 

किसी उत्साही रिपोर्टर ने पूछ लिया, 'आप में और सचिन में क्या अंतर है?'

सहवाग ने तपाक से कहा, 'बैंक बेलेंस का'. 

मुझे जवाब अच्छा नहीं लगा. ऐसा लगा कि एक ही शतक के बाद ये बंदा कैसे खुद को सचिन मान बैठा है? 

अब जाके पता चला कि सहवाग खुद भी ये जवाब देने के बाद सहज नहीं थे. उन्होंने इसके लिए सचिन से माफी भी मांगी थी. 

खैर, मेरे जैसे लोगों के दिल में भी सहवाग के जवाब को लेकर जो मलाल था, वो ज्यादा देर नहीं टिक सका. 

सहवाग की हर पारी उनकी फैन फॉलोइंग बढ़ाती गई. 

धीमे-धीमे वो सचिन की छाया से मुक्त होने लगे. बल्कि कुछ हद तक वो सचिन को छाया में लेने लगे. 

ये सुनने और पढ़ने में भले ही अटपटा लगे लेकिन मेरा मानना है कि सचिन पर कभी विरोधी गेंदबाजों ने इतना दबाव नहीं बनाया होगा जितना सहवाग ने बनाया. 

सचिन के इस क्लोन ने एक ही झटके में वनडे में ओपनिंग के उस रोल को हथिया लिया जो सचिन ने तमाम गुजारिश के बाद हासिल किया था. 

मुल्तान में द्रविड़ के पारी घोषित करने के बाद नाराजगी जाहिर करने के पहले सचिन ने खुद को ओपनिंग के रोल से हटाए जाने को लेकर भी शिकायत की थी. 

अगस्त 2001 की करिश्माई पारी के बाद सहवाग ओपनिंग स्लॉट में फिक्स हो गए. लेफ्ट राइट कॉम्बिनेशन कायम रखने के लिए सौरव गांगुली दूसरे ओपनर की पोजीशन थामे रहे और सचिन जब टीम में लौटे तो उन्हें कुछ मैचों में चौथे नंबर पर बैटिंग करनी पड़ी. 

और, सचिन को कहना पड़ा कि वो वनडे में ओपनिंग करना चाहते हैं. 

और, टीम मैनेजमेंट को कहना पड़ा कि वो ये बात टीम मीटिंग में भी कह सकते थे. 

ये तब तक अमूमन निर्विवाद रहे सचिन के साथ जुड़ा शायद पहला विवाद था. 

फिर वो बहस शुरू हुई जिसे हाल में कपिल देव ने भी दोबारा हवा दी है कि सचिन अपना 'नैचुरल गेम' नहीं खेलते. 

नैचुरल गेम यानी गेंदबाज पर सवार होने वाला खेल. हर गेंद को बाउंड्री के बाहर भेजने की जिद दिखाने वाला खेल. 

सचिन ने करियर के पहले दस साल में इसी अंदाज में बल्लेबाजी की थी. उस वक्त ऐसा लगता था कि सचिन ये बर्दाश्त नहीं कर पाते थे कि उनके साथी बल्लेबाज का स्ट्राइक रेट उनसे बेहतर हो. 

सहवाग ऐसे पहले बल्लेबाज थे जिन्हें चुनौती देने में सचिन को दिक्कत होने लगी. धीरे-धीरे सचिन का खेल बदलता गया. 

सचिन को लेकर दीवानगी सहवाग के आने के बाद भी कम नहीं हुई लेकिन बदलाव जरूर हुआ. 

पहले सचिन वो अकेले बल्लेबाज थे जिनके आउट होते ही टीम इंडिया की जीत की आस टूटने सी लगती थी. खासकर वनडे क्रिकेट में. विरोधी कप्तान अपनी टीम मीटिंग में सबसे ज्यादा वक्त सचिन को रोकने का प्लान तैयार करने पर लगाते थे लेकिन, सहवाग आए तो  वो भी विरोधी कप्तान का उतना ही वक्त लेने लगे. 

सहवाग के साथ खेलने का फायदा मेरे ख्याल से सबसे ज्यादा राहुल द्रविड़ को मिला. 

अगर सहवाग टेस्ट क्रिकेट में ओपनर न बने होते तो मुझे संदेह है कि द्रविड़ तीन नंबर के इतने महान बल्लेबाज होते. (मैं द्रविड़ भक्तों से माफी चाहता हूं)

टेस्ट क्रिकेट में सहवाग की कामयाबी ने द्रविड़ की कामयाबी का ग्राफ भी काफी ऊंचा कर दिया. 

मैं बरसों बरस सचिन के खेल के सम्मोहन में जकड़ा रहा हूं. अब भी दीवानगी का वो दौर मेरे साथ है लेकिन फिर भी मुझे ये कहने में कोई संकोच नहीं कि सचिन और द्रविड़ के उलट सहवाग कभी अपने नाम के बोझ तले दबते पिसते नहीं दिखे.

सहवाग अपने दौर के ऐसे अकेले सुपरस्टार थे जो अपनी शर्तों पर खेले. जिन्होंने हिंदुस्तान के गुरुर को सबसे ज्यादा सुकून दिया. जिन्होंने पाकिस्तान के गेंदबाजों की सबसे ज्यादा पिटाई की. 

लेकिन, मेरी नज़र में वो सबसे ज्यादा 'अनलकी' भी रहे. 

सहवाग ने संन्यास का एलान किया तो मुझे लगा कि 'सुल्तान' और 'नवाब' जैसे खिताबों से नवाजे गए इस महान बल्लेबाज की विदाई सचिन, कुंबले और सौरव की तरह शान से होनी चाहिए थी. 

बाद में सहवाग ने भी यही मलाल जाहिर किया. 

लेकिन, अफसोस सिर्फ विदाई का नहीं. 2006 में उन्हें जब पहली बार ड्रॉप किया गया तो उनकी सिर्फ एक सीरीज़ खराब थी. दक्षिण अफ्रीका में वो करीब 15 के औसत से ही रन बना सके थे. लेकिन, उस सीरीज में हर बड़ा सितारा फ्लॉप था. सहवाग ने एक सीरीज पहले ही वेस्ट इंडीज में 51 और उसके दो सीरीज पहले पाकिस्तान में करीब 74 के औसत से रन बनाए थे. 

ऐसे ही करियर के आखिर में जब उन्हें ड्रॉप किया गया तो उनकी सिर्फ एक सीरीज के पहले दो मैच खराब थे. पिछली ही सीरीज में उन्होंने एक शतक बनाया था. 

वनडे टीम से ड्रॉप होने के सिर्फ 11 मैच पहले उन्होंने 219 रन की रिकॉर्डतोड़ पारी खेली थी. आखिरी के 11 मैचों में भी उन्होंने एक हाफ सेंचुरी बनाई थी और तीस से ज्यादा के चार स्कोर बनाए थे. 

सहवाग के संन्यास के बाद मैं इतना जरुर कहना चाहूंगा कि सचिन और सहवाग में बैंक बैलेंस के अलावा भी एक फर्क था. वो ये कि सचिन नाम का जो सम्मोहन बीसीसीआई को नतमस्तक रखता था, वो सहवाग की तकदीर में नहीं था. नहीं तो 'क्लोन' को भी ओरिजनल सचिन की तरह ही लाल गलीचे बिछाकर विदा किया जाता. 

हां, बीसीसीआई से इतनी गुजारिश जरुर है कि दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ आखिरी दो टेस्ट मैच की टीम अभी चुनी नहीं गई है. 

दिल्ली के मैच में वीरू को बुला लो. मैच खिला दो. उनका और फैन्स दोनों का दिल रह जाएगा. अब तो वो फॉर्म में भी हैं.