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बुधवार, 15 अप्रैल 2015

लापता, गुमशुदा, Missing!

जनाब, किसे खोज रहे हैं आप?



ग़ाजियाबाद जाइये या फिर गांधीनगर. कानपुर या फिर पटना. मन हो तो बुंदेलखंड का चक्कर भी लगा लीजिए. दीवारें पटी हुई हैं. जगह-जगह पोस्टर लग गए हैं. जिनका सबको पता है, वो 'लापता' बताए जा रहे हैं. 
भला कौन मानेगा कि जनरल (रिटा.) वीके सिंह गुम हो गए हैं. ट्विटर ट्रेंड से लेकर प्राइम टाइम की बहस तक वो हर जगह छाए हुए हैं. 



लेकिन,ग़ाजियाबाद में दाखिल होते ही आपका भरम टूट सकता है. यहां बाकायदा पोस्टर लगाकर सिंह साहब की तलाश की जा रही है. 'भारतीय कौटिल्य सेना' नाम के संगठन ने उनकी तलाश पर पांच सौ रुपये के इनाम का भी एलान किया है. 



किस्सा सिर्फ़ यूपी के जिला ग़ाजियाबाद  का नहीं. गुजरात के गांधीनगर में भी पोस्टर लगाकर तलाश की जा रही है. यहां बीजेपी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी को 'गुमशुदा' बताया गया है. अब आप कहेंगे, भला आडवाणी जी कैसे लापता हो सकते हैं. उनकी तो 'चुप्पी' भी हाल-हाल तक ख़बर रही है. 

                                   

आडवाणी की ही तरह बीजेपी के 'मार्गदर्शक' मुरली मनोहर जोशी भी 'लापता' हो गए हैं. उनकी तलाश में कानपुर में पोस्टर लगे हैं. 



पटना में लगे एक पोस्टर में बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा को 'गुमशुदा बताया गया है'. दूसरों को 'खामोश' कर देने वाले शॉटगन की 'चुप्पी' पर सवाल उठाया गया है. पोस्टर में पुरस्कार देने की बात भी कही गई है, लेकिन, कौन किसे देगा, ये साफ़ नहीं है. 



पोस्टर लगाकर तलाश राहुल गांधी की भी हो रही है. हालांकि, अब बताया जा रहा है कि वो दिल्ली आ गए हैं या बस आने ही वाले हैं. वैसे, कांग्रेस कई बार साफ़ कर चुकी है कि राहुल गांधी 'गायब' नहीं बल्कि 'छुट्टी' पर हैं, लेकिन, विरोधियों की नज़र में वो 'गुमशुदा' ही हैं 



दिलचस्प ये है कि बुंदेलखंड क्षेत्र में राहुल गांधी के साथ बीजेपी नेता उमा भारती की भी तलाश हो रही है. वो भी पोस्टर चिपका के. एक तरफ़ उमा दीदी. दूसरी तरफ़ राहुल भैया. 

कुछ महीने पहले ऐसा ही 'तलाश' अभियान नई दिल्ली क्षेत्र में भी चला था. पोस्टर छपे थे. दीवार पर लगे थे. यहां अरविंद केजरीवाल को गुमशुदा बताया गया था. दिल्ली चुनाव ने केजरीवाल को तलाश कर नई दिल्ली पहुंचा दिया और लोगों ने इनाम भी दिया, लेकिन, किसे ? जाहिर है, केजरीवाल को. 

                                   

तो बलिहारी है, ऐसे तलाशी अभियान की. जिनका पता है आप उन्हें ही लापता बताकर तलाश रहे हो और जब वो आपकी परिभाषा के मुताबिक मिल जाते हैं तो उन्हें ही इनाम थमा देते हो. ये ऐसा मज़ाक है, जिस पर अब हंसी भी नहीं आती. सब जानते हैं कि ऐसे पोस्टर छपवाने वाले पब्लिसिटी के लिए चर्चित चेहरों को खोज रहे हैं. कई बार शिकायतें जायज भी होती हैं. चुनावी मौसम में वादों के बीज बोने वालों से फ़सल का हिसाब मांगना वोटर अपना हक़ मानते हैं और जब ये हक़ हाथ से जाता दिखता है तो वो पोस्टर चिपकाने के सिवा कर भी क्या सकते हैं ? शायद इसीलिए 'राइट टू रिकॉल' की मांग उठी थी. लेकिन, पोेस्टरों के जरिए तलाशी अभियान चलाने वाले सीरियस कभी नहीं दिखते. अगर होते तो कथित 'गुमशदा' खुद प्रकट होने के लिए मजबूर हो जाएं. 


सच कहा जाए तो सीरियस होकर खोज़ने की जरुरत इन बड़े नाम वाले लापता लोगों को नहीं. इससे किसी का भला होता हो, ये लगता नहीं. तलाशी अभियान की जरुरत उन लापता बच्चों को है, जो वक्त के किस अंधेरे में गुम हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता. इन बच्चों का पता ना उनके घरवाले लगा पाते हैं और ना ही शुभचिंतक. पुलिस तो खैर सीरियस होती ही नहीं. नेशनल क्राइम ब्यूरो का आंकड़ा मुझे बताया गया है, जिसके मुताबिक हर आठ मिनट में एक मासूम 'गायब' हो जाता है. यानी हर घंटे करीब आठ बच्चे लापता हो जाते हैं. इनमें लड़कियों की तादात आधे से ज्यादा होती है. गुमशुदा बच्चों में से चालीस फ़ीसदी कभी लौट कर घर नहीं आते. पिछले साल अकेले दिल्ली में 7 हज़ार से ज्यादा बच्चे गायब हुए थे. मासूम बच्चों के इस तरह गुम होने पर सुप्रीम कोर्ट तक चिंता जाहिर कर चुका है.
तो पोस्टर छाप कर बड़े- बड़े लोगों को तलाशने वाले भाइयो (अगर बहनें भी इस अभियान में शामिल हैं तो मेरा संबोधन उन्हें भी है) कृपया अपना धन और समय इन स्वनामधन्य लोगों पर व्यर्थ ना करें. ये वक्त पड़ने पर खुद प्रकट हो जाएंगे. इन्हें जो 'इनाम' देना है, सामने आने पर दें. पोस्टर छापें, चिपकाएं और तलाशी अभियान चलाएं तो किसी ऐसे मासूम के लिए जिसके लौटने पर एक परिवार की खुशियां लौटेंगी. आपको दुआएं और ताउम्र के लिए सुकून मिलेगा. आइये मिलकर खोजते हैं उन मासूमों को जो ना जाने किन अंधेरों में गुम हो जाते हैं. 

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

...राजगद्दी के पहले वनवास

                                                   एक 'युवराज' की अजब-गजब कहानी 





ये कहानी कलियुग की है. त्रेतायुग की उस मशहूर कहानी से इस का साम्य तलाशना पूरी तरह बेमानी होगा. राहुल गांधी और राम में समानता सिर्फ़ इतनी है कि दोनों का नाम 'रा' से शुरु होता है. 'भक्त' ये भी कह सकते हैं कि राम भी 'गद्दी' संभालने के पहले वन चले गए थे. लेकिन, राम का वनगमन मर्यादा से बंधा था. पिता के वचन की मर्यादा. इसका मान रखते हुए वो वन में ही 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हो गए. राम वन न जाते तो रामायण की कथा भी न होती. वनवास ने उन्हें पुरुष से महापुरुष और फ़िर भगवान बना दिया. 

                                         

राम की इस कहानी के उलट राहुल गांधी ने ख़ुद वनवास चुना. वो भी उस समय जब कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनकी ताज़पोशी की ख़बरें ज़ोरों पर थीं. राम माता कैकयी की नाराज़गी की वजह से वन गए थे तो राहुल गांधी ख़ुद नाराज़ बताए जाते हैं. ये जरुर है कि उन्हें भी जाने की इजाज़त मां ने ही दी. वो कहां हैं और कब लौटेंगे, इस बारे में कोई आधिकारिक जानकारी नहीं है. हालांकि, सार्वजनिक तौर पर चुप रहने वाले कांग्रेस के नेता बिना पूछे ही बता देते हैं कि राहुल म्यामांर में हैं और 19 अप्रैल को कांग्रेस की किसान रैली के पहले दिल्ली लौट आएंगे. 



राम वन गए थे तो राजकाज से जुड़ी उनकी जिम्मेदारियां भरत ने संभाली थीं. राहुल की गैरमौजूदगी में कांग्रेस को संजीवनी देने का काम उनकी मां सोनिया गांधी को संभालना पड़ा. सोनिया बेटे की गैरमौजूदगी में इस कदर सक्रिय हुईं कि कई कांग्रेसियों ने दबे सुर में कहना शुरु कर दिया कि राहुल का वनवास जितना लंबा खिंचे पार्टी के लिए उतना ही अच्छा है. राम के राज संभालने का इंतज़ार हर किसी को था, लेकिन, राहुल के पक्ष में ऐसा कोई माहौल नहीं दिखता. कांग्रेस के जो नेता राहुल गांधी के वनवास की टाइमिंग पर सवाल उठा रहे थे, वो सोनिया की सक्रियता देखने के बाद कहने लगे कि अभी अध्यक्ष बदलने का सही समय नहीं. इनमें गांधी परिवार के करीबी माने जाने वाले संदीप दीक्षित जैसे नेता शामिल हैं. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी इशारों में राहुल पर निशाना साध चुके हैं. 


राहुल के नेतृत्व को लेकर कांग्रेस के नेताओं ऐसा रुख पहली बार नहीं दिखा. 2004 में सक्रिय राजनीति में आए राहुल गांधी के पांव जब कभी सियासी अखाड़े में उखड़ते दिखे कांग्रेस में एक ऐसी जमात सक्रिय हो गई, जो राहुल को पीछे करने और प्रियंका गांधी को आगे लाने की वकालत में जुट गई. पति रॉबर्ट वाड्रा पर लगे तमाम आरोपों के बाद भी राजनीतिक विश्लेषकों, मीडिया और वोटरों के बीच प्रियंका के लिए खास आकर्षण दिखता है. इंदिरा गांधी से उनकी तुलना होती है. राजनीति की कसौटी पर प्रियंका अब तक कसी नहीं गईं, लेकिन, 2014 के आम चुनाव में जब पूरी कांग्रेस बीजेपी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के हमलों के आगे हांफ रही थी, तब अकेले प्रियंका थीं, जिन्होंने मोदी पर जमकर पलटवार किया. यूपी की रायबरेली और अमेठी सीट पर सोनिया और राहुल गांधी की जीत को भी प्रियंका का ही करिश्मा माना गया. लेकिन, सोनिया गांधी ने कभी राहुल को पीछे कर प्रियंका को आगे लाने की कोशिश नहीं की. इसके पीछे एक अजब थ्योरी बताई जाती है. भारत की तरह इटली में भी पितृसत्तात्मक समाज है. यानी उत्तराधिकारी बेटे को ही बनाया जाता है. प्रियंका भी अब तक राहुल के लिए चुनौती बनती नहीं दिखीं.

राहुूल को युवराज कहने वाले भी दलील देते हैं कि कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी की तरह काम नहीं करती. ये राजवंश की परिपाटी पर आगे बढती है, जहां सबसे अहम कुर्सी गांधी परिवार के लिए सुरक्षित है. कांग्रेस को सत्ता मिलती तो प्रधानमंत्री की कुर्सी पर पहली दावेदारी राहुल गांधी की ही होती. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए जाने कितनी बार कहा था कि वो राहुल गांधी के लिए कुर्सी छोड़ सकते हैं. लेकिन, राहुल किसी और मिट्टी के बने हैं. उनके आगे जो कुर्सियां लगाई जाती हैं, उनमें वो कभी दिलचस्पी नहीं दिखाते. राहुल गांधी को जब कांग्रेस ने अपना उपाध्यक्ष चुना तो उन्होंने बड़े भावुक अंदाज में राज़ खोला कि उनकी मां ने बताया है,'हकीकत में सत्ता ज़हर है'.2014 के आम चुनाव में पूरी कांग्रेस चाहती थी कि राहुल ये ज़हर पी लें और नीलकंठ हो जाएं, लेकिन, नरेंद्र मोदी ने ये साध पूरी नहीं होने दी. 


कांग्रेस ने राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले प्रोजेक्ट तो नहीं किया, लेकिन, बीजेपी नेता ने  अपने पत्ते कुछ इस अंदाज में चले कि लड़ाई राहुल बनाम मोदी की हो गई. राहुल ये लड़ाई क्यों हारे, इसके कारणों की पड़ताल होती रहेगी, लेकिन, ये बताना जरुरी है कि ये राहुल की पहली हार नहीं थी. आम चुनाव के पहले राहुल ने यूपी के विधानसभा चुनाव में जान लगाई थी, लेकिन, वहां अखिलेश यादव ने उन्हें पटखनी दे दी, जो करिश्मे और अनुभव में मोदी के आगे कहीं नहीं ठहरते. दिल्ली के सियासी अखाड़े में राहुल को अरविंद केजरीवाल ने पीटा. हार के इस सिलसिले ने राहुल के राजनीतिक कौशल पर इतना बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया कि कांग्रेस उनके वनवास पर खुश होने लगी. कांग्रेस के अंदर से आती खबरें बताती हैं कि राहुल गांधी कांग्रेस को बदलना चाहते हैं. वो नए प्रयोग और नए चेहरों को आजमाना चाहते हैं. पुराने कांग्रेसी ऐसा होने नहीं देना चाहते. इसी वजह से राहुल नाराज़ हैं.इतना तय है कि नाराजगी दूर होते ही राहुल गांधी लौटेंगे. देर सवेर उन्हें कांग्रेस की सबसे अहम कुर्सी भी मिल जाएगी, लेकिन, ये एक नेता के तौर पर उनके भविष्य बदलने की गारंटी नहीं. राहुल को अगर कांग्रेस का उद्धारक बनना है तो उन्हें रणछोड़ की छवि से पीछा छुड़ाना होगा. उन्हें पहले कांग्रेस को भरोसा दिलाना होगा कि वो पार्टी की तकदीर बदल सकते हैं. इसके बाद वोटरों का भरोसा जीतने की बारी आएगी. जब तक राहुल चुनौतियां के आगे अड़कर खड़ा होना नहीं सीखेंगे उन्हें गुस्सा आता रहेगा और कोई ना कोई वन उन्हें अपनी ओर खींचता रहेगा. इतना तय है कि इस वनवास से राहुल न राम बनेंगे और न ही गौतम बुद्ध.