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सोमवार, 11 अप्रैल 2016

मां ने कहा था....

'आग से मत खेलना' 



हे मां!

खुशी के वक्त आप जिसे चाहे याद करें.

दुख, दर्द, तकलीफ, मुश्किल, परेशानी और बुरे वक्त में तो मां ही याद आती है.

क्यूं ?

दिमाग और दिल भरोसे की उस मजबूत बुनियाद पर यकीन करते हैं, जिसे उन्होंने बचपन से परखा होता है.

भूख लगे तो मां खाना खिलाती है.

चोट लगे तो मां जख्म सहलाती है. आंसूं पोछती है. आंचल की छांव में छुपाकर सारा दर्द छीन लेती है.

मुश्किल वक्त हो तो उम्मीद भरी बातों से हौसले के टिमटिमाते चिराग को सूरज की तरह रौशन कर देती है और चुनौतियों का अंधेरा खुद ही दूर हो जाता है.

फेल होने पर ताना नहीं देती.

कहती है, 'चल फिर ट्राई कर, तू तो टॉप करेगा'. 


देवी मंदिरों में जाने वाले भक्त भी 'मां' पर इसी भरोसे की वजह से कतार लगाते हैं.

फिर क्या वजह है कि मां के आंगन में, उसकी आंख के सामने ही उसके सौ से ज्यादा बच्चे भस्म हो गए.

साढे तीन सौ से ज्यादा झुलस गए.

वो मां के आंगन में खुशी खोजने आए थे. उनके हिस्से मातम को लिख गया.

प्रधानमंत्री और मुख्यमत्री की विजिट के बीच सक्रिय हुए प्रशासन ने जांच का आदेश दे दिया है.

लेकिन, जांच इस एंगल से नहीं होगी, इसका यकीन है.

किसी का 'ताव' भी नहीं कि ऐसे सवालों का जवाब दे सके


ग़म में पूरा देश शरीक है.

जिनके पास संवेदनाएं हैं, उन्हें हर तरह का हादसा हिला देता है.

चोट भले ही दूसरे को लगे. खून भले ही किसी और का बहे. आंखें उनकी नम हो जाती हैं.

मैं बहुत से ऐसे लोगों को जानता हूं जो बेवजह अस्पतालों का रुख नहीं करते

वो खुद का दर्द तो बर्दाश्त कर जाते हैं लेकिन दूसरों को कराहते देख नहीं पाते.

हालांकि, जब मानवता पुकारती है तो ऐसे लोग कलेजा पत्थर करके मदद के लिए सबसे आगे दिखते हैं.

केरल में भी ऐसे लोग जरुर आगे आए होंगे.    


हादसों में 'बर्न केस' सबसे ज्यादा तकलीफदेह होते हैं.

चोट का दर्द सह लिया जाता है. लेकिन जलन असहनीय होती है.

बारुद से घायल होने वालों को हफ्तों और महीनों तक चैन नहीं मिलता.

सरकारों ने मुआवजों का एलान कर दिया है. मुख्यमंत्री ने कहा, 'मरने वालों को दस लाख'. प्रधानमंत्री ने कहा, 'दो लाख'.

मुआवजे का मरहम तकलीफ कम कर पाएगा, कहना मुश्किल है.

मुश्किल तो वो सवाल भी है, जो शुरु में पूछा था.

कोल्लम के मंदिर में बैठी जो 'मां' सौ साल से अपने बच्चों की मन्नत पूरी कर रही थी.

वो इस हादसे को क्यों नहीं रोक पाई?

देवी ने कोई चमत्कार क्यों नहीं किया?

सौ बार जब ये सवाल सुने तो मां की सुनाई दो कहावतें याद आ गईं

'आग और पानी खेलने की चीज नहीं'

हर मां अपने बच्चों को बार-बार ये याद दिलाती है. हिदायत देती है. कभी मनुहार करती है, कभी डांटकर बताती है.

शायद वो ऐसे ही डर की तरफ इशारा करती है.

और फिर यहां तो आतिशबाजी, पटाखों और बारूद का पूरा ढेर था.

देखने वालों और सुनने वालों ने बताया है कि धमाके की गूंज एक किलोमीटर दूर तक सुनाई दी


दूसरी कहावत है, 'जानकर जड़ करें और देव को दोष दें'.

यानी आप गलतियां खुद करें और दोष देवताओं पर लगा दें.

कहने का मतलब ये कतई नहीं कि पीड़ितों ने गलती की. लेकिन कोल्लम में गलतियां हुईं. एक नहीं कई.

आस्था के ऐसे मेलों में जहां हज़ारों हज़ार लोग जुटते हैं आग का खेल कितना घातक हो सकता है, इस बात का अंदाजा नहीं लगाने वाले क्या देवी मां के आंगन में खड़े होने के हकदार हैं?

गौर कीजिएगा. अगर कहीं दीपक जलता हो और बच्चा उसके पास जाए तो मां दौड़कर उसे खींच लाती है

दीपक को ऐसी जगह रख देती है जहां तक बच्चे की पहुंच न हो.

मां ने इशारा यहां भी दिया होगा लेकिन अंधी होड़ में देखने समझने की जहमत किसने उठाई

प्रशासन कहता है, 'हमने अनुमति नहीं दी'.

ठीक है अनुमति नहीं दी होगी लेकिन जहां आतिशबाजी का ऐसा बड़ा तमाशा हुआ हो, हज़ारों की भीड़ जुट रही हो तो क्या सिर्फ एक एप्लीकेशन लौटाने भर से प्रशासन का काम पूरा होता है


अपना इरादा शासन, प्रशासन, सरकार और आयोजकों को कोसने का नहीं.

हम तो उस 'बरहामन' को कोस रहे हैं जिसने वर्ष प्रतिपदा के दिन ग़ालिब की ग़ज़ल सुनाते हुए कहा था, 'ये साल अच्छा है'.

कोल्लम की तकलीफ में हम सब शामिल हैं

लेकिन क्या हम इस हादसे से सबक लेंगे?  

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

आपने हंसाया और

हम वोट दे आए... 


इरादा अपनी पीठ ठोकने का नहीं है. 

कतई नहीं. 

ऐसी उम्मीद भी नहीं कि कोई मुझे राजनीति का पंडित, विश्लेषक या फिर जनता की 'नब्ज' का पारखी माने. 

फिर नतीजों को लेकर मैंने कोई गारंटीशुदा बात भी नहीं की थी. 

पहले जो कहा था, आज भी बस वही दोहराऊंगा. 

मैंने कहा था कि बिहारी 'बुड़बक' नहीं है. 

http://raishumari.blogspot.in/2015/10/blog-post.html

और, बिहार विधानसभा के चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले होंगे. 

और जीतेगा वही जो सबसे ज्यादा 'एंटरटेन' करेगा 

http://raishumari.blogspot.in/2015/04/blog-post_16.html

मांझी एंटरटेनर थे लेकिन नई पार्टी को कामयाबी दिलाने के दबाव ने उनके मसखरेपन को गुम कर दिया. 

नरेंद्र मोदी ने कोशिश की लेकिन लोकसभा जैसा माहौल नहीं जमा पाए. 

वो ज्यादातर वक्त एंग्री सुपरमैन के रोल में रहे. चीखते, चिल्लाले, कोसते या शिकायत करते दिखे. 

लंदन में मोदी का जो अंदाज दिखा, उसकी झलक भर बिहार में दिखा दी होती तो वोटर इस कदर नहीं रूठते. 

बीजेपी के बाकी नेता शायद 'हंसने-हंसाने' में यकीन ही नहीं करते. 

खास किस्म के अनुशासन ने शायद उनका 'सेंस ऑफ ह्यूमर' विकसित ही नहीं होने दिया. 

या फिर वो शायद ये मानते हों कि हंसे तो 'राष्ट्रवादी' बुरा न मान जाएं. उन्हें 'नॉन सीरियस' न समझा जाए.

एंटरटेनमेंट में बाजी मारी लालू प्रसाद यादव ने. 

अमित शाह लिफ्ट में फंसे तो उनके पेट का नाप लेने लगे. 

प्रधानमंत्री के समर्थक रैलियों में जिस तरह उन्हें चीयर करते हैं, उसकी बार-बार नकल की. 

मोदी ने बिहार के लिए स्पेशल पैकेज का ऐलान किया तो उसकी मिमिक्री करने लगे. 

और तो और, एक रैली में मंच पर पंखा गिर गया तो भी हंसने-हंसाने से नहीं चूके.

मुश्किल सवालों का जवाब भी हंसते-हंसते दिया. 

मुलायम सिंह यादव महागठबंधन से अलग हुए. 

पूछा गया कि समधी छोड़ गए तो लालू ने कहा, 'मेरे दो साले भी मुझे छोड़ चुके हैं'

जवाब सुनते ही ठहाके गूंज पड़े  

लंबे वक्त के बाद चुनावी मौसम में लालू हंसे भी खूब- हंसाया भी खूब. 

लालू के आसपास कोई आ ही नहीं पाया. तो वोटरों ने हंसते-हंसते उन्हें सबसे ज्यादा सीटें थमा दीं. 

हर वक्त सीरियस रहने वाले नीतीश कुमार भी वोटरों को एंटरटेन करने में पीछे नहीं रहे. 

क्या आपको याद है, पहले कभी नीतीश ने पेरोड़ी की थी, वो भी थ्री ईडियट स्टाइल?

और, जो लोग इन नतीजों को यादव, कुर्मी, ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत यानी जातिगत वोटिंग के खांचे में देख रहे हैं, उनसे विनम्रता के साथ मैं कहना चाहता हूं कि सर जी आपसे मैं इत्तेफाक नहीं रखता. 

जातिगत समीकरण देखकर टिकट सिर्फ महागठबंधन ने नहीं दी थी. 

भारतीय जनता पार्टी के आधुनिक 'चाणक्य' अमित शाह ने भी दी थी. 

जाति का यही फॉर्मूला लोकसभा चुनाव में भी आजमाया गया था. तब भी वोटरों ने जाति और जुमलों से अलग अपनी पसंद की लाइन ली थी. 

अब भी यही किया है. वो आगे भी यही करेंगे. 

बिहार के वोटर खुशनुमा माहौल पसंद करते हैं. चीखते- चिल्लाते, रोते- धोते, शिकायत करते नेता उन्हें रास नहीं आते. 

अगली बार बिहार के समर में उतरें तो याद रखिएगा, वोटरों को एंटरटेन करेंगे तो जीत गारंटी के साथ मिलेगी. 

जाति के गणित पे बिहार के चुनाव में जुआ खेलना चाहेंगे तो वोटर धम्म से जमीन पर पटक देंगे. 

'पक्के' वोट बैंक के बाद भी लालू जी ने दस साल पटक ही खाई थी. 

और, जिस 'जाति' को चुनाव में उन्होंने दरकिनार किया, उससे उनके जुड़ाव के कुछ अनसुनी कहानियां स्टोर में हैं. आप कहेंगे तो किसी दिन वो भी बयान कर दी जाएंगी. 

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

किसके अच्छे दिन

किसके बुरे दिन 


ये दिव्य ज्ञान है. 

केजरीवाल जी ने सुबह सवेरे ही ट्विटर पर इसकी घोषणा कर दी. 

साफ शब्दों में. शुद्ध हिंदी में. 

'मेरी जानकारी के मुताबिक मोदी जी बिहार चुनाव बुरी तरह से हार रहे हैं'. 

केजरी बोल (ट्वीट) जब सामने आए, उस वक्त तक बिहार की 243 सीटों में से सिर्फ 49 पर मतदान हुआ था. 

दूसरे चरण की 32 सीटों पर मतदान शुरु ही हुआ था. 

अरविंद केजरीवाल की सूचना का स्त्रोत क्या है, उन्होंने खुलासा नहीं किया. 

इसकी जरूरत भी नहीं. 

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने भी नतीजों को लेकर इसी तरह की भविष्यवाणियां की थीं. 

मोदी के अनुमान सटीक निकले. अब कसौटी पर केजरीवाल का दावा है. 

एक चमत्कारिक दावा लालू जी ने भी किया. 




मोतीहारी के पास लखौरा में लालू की एक रैली थी. 

गरमी का मौसम उतार पर है. फिर भी लालू जी बड़े नेता हैं तो आयोजक चाहते थे कि उनके माथे पर पसीने की एक बूंद भी न आए. 

गरमी से बचाने के लिए मंच पर पंखा लगाया गया था. 

बीच रैली में मंच पर पंखा गिरा और लालू जी मातारानी पर बलिहारी हो गए. 

बोले,  'मां दुर्गा ने बचाया है'. 

गले में पड़ा लॉकेट भी दिखाया. मां की तस्वीर वाला. 

मां की बात हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर ने भी की. वो गौमाता की भक्ति दिखा रहे थे. 

लेकिन, भक्ति का अंतर देखिए. खट्टर की बातें सांप्रदायिकता के पाले में खिंच गई. 


लालू जी पहले भी भक्ति भाव दिखा चुके हैं. 

मांस खाने से तौबा की तो इसे शिवजी से सपने में मिला आदेश बताया था. 

गाय के मुद्दे पर घेरने की कोशिश लालू को भी हुई थी. मोदी ने तो पानी पी-पीकर खबर ली थी. 

फिर अचानक जाने क्या हुआ, मोदी राष्ट्रपति के दिखाए रास्ते पर चले गए. मुद्दा बदल लिया. लेकिन खट्टर फिर वैताल को उसी डाल पर ले आए. 

बात वापसी की हो रही तो जान लीजिए कि मुद्दा अब सिर्फ 'घर वापसी' तक नहीं सिमटा है. 

जुमले भी राह बदल रहे हैं.  

लौट लौट के आ रहे हैं. या लाए जा रहे हैं. वो आ रहे हैं तो मुंह चिढ़ा रहे हैं. 


भाई लोग हेमा जी की एक पुरानी तस्वीर निकाल लाए हैं. जसवंत सिंह के साथ खड़ी हैं हेमा जी. 

महंगाई बयान करने वाला पोस्टर गले में डाल रखा है. 

पोस्टर में एक किलो दाल की कीमत 55 रुपये बताई गई है. 

भाई लोग पूछ रहे हैं कि अब जब दाल 205 रुपये किलो बिक रही है, वो भी थोक में तो फिर हेमा जी कहां हैं? उनका पोस्टर कहां है?

भाई लोगों ने तस्वीर भी उस दिन तलाशी, जिस दिन हेमा जी बर्थडे मना रही थीं. 

सेलेब्रेशन का खुमार उतार दिया. 

लेकिन, ऐसे पोस्टरों का मज़ा देखिए. 

अपने पवार जी ने कह दिया, 'लोग कह रहे हैं हमारे बुरे दिन वापस कर दो'. 

'हमें अच्छे दिन नहीं चाहिए'. 

तो क्या केजरीवाल की सूचना का स्त्रोत पवार साहब हैं? 

उनके बयान के आधार पर ही वो पॉवर की इक्वेशन बता रहे हैं? 

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

बिहार की प्रयोगशाला

राजनीति का शीर्षासन 


राजनीति में दो और दो हमेशा चार नहीं होते. 

बाइस हो सकते हैं. ज़ीरो हो सकते हैं. एक भी हो सकते हैं. 

जैसे अब बिहार में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद हो गए हैं. 

ये राजनीति का शीर्षासन है. इसे ऐसी परिक्रमा भी कह सकते हैं, जिसमें चलने वाला जहां से शुरु करता है, फिर वहीं पहुंच जाता है. संतुष्टि का भाव भी रहता है.  


पहले लालू- नीतीश भाई-भाई थे. जोड़ी सुपरहिट थी.  फिर राह अलग हो गई. जुदाई के बाद भी बिहार की राजनीति इन दोनों के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही. 

नीतीश लालू को कोसते रहे और सत्ता सुख भोगते रहे. लालू ने भी नीतीश की ईंट से ईंट बजाने की कोशिश कम नहीं की. राबड़ी देवी जी तो गाली देने में हर हद पार कर गईं. 

उन दिनों नदी के दो पाट की तरह दिखने वाले लालू और नीतीश आगे जाकर मिल जाएंगे, किसने सोचा था?

तभी तो मैंने कहा कि राजनीति में गणित के फॉर्मूले नहीं चलते. 

कई बार पारखी भी चक्कर खा जाते हैं. 

इसी साल दिल्ली में हुए चुनाव के नतीजे इसका सुबूत हैं. साल 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की हार भी खुद को राजनीति का पंडित कहने वालों के मुंह पर तमाचा थी. 

लेकिन, वो बिराहमन ही क्या, जो खुद को ज्ञाता न माने. 


बिहार की राजनीति के बेहद रपटीले अखाड़े में पैर जमाने की कोशिश कर रहे पहलवानों को लेकर पंडित फिर भविष्यवाणी कर रहे हैं. 

बिना ये परवाह किए कि राजनीति में कैलकुलेटर की बताई संख्या सटीक हो, ये जरुरी नहीं. 

अगर फॉर्मूला चल जाए तो स्थिति साफ है. चुनाव के दौरान जातियों के पाले खींच लेने वाले बिहार में ये साफ है कि किस गठबंधन के साथ कौन सी जाति है. 

लेकिन दिक्कत ये है कि बिहारियों की गिनती उन 'ज़िंदा कौमों' में होती है जो राजनीति के सारे समीकरणों को गड्ड-मड्ड कर देती है. 

जब स्थिति इस कदर कन्फ्यूज करने वाली हो तो जीत के लिए जोखिम लेने पड़ते हैं. प्रयोग करने पड़ते हैं. तो एनडीए और महागठबंधन ने पूरे बिहार को प्रयोगशाला बना दिया है. 

प्रयोगशाला अगर नामी हो तो हर वैज्ञानिक वहीं जाकर शोध करना पसंद करता है. ऐसे में ओवैसी भी आ गए हैं बिहार. 

ओवैसी ने एक खास इलाके को चुना है. वो पिछड़ेपन को मुद्दा बना रहे हैं. 

उद्धारक की छवि पेश करते हुए उस इलाके को चमन बनाने का सपना दिखा रहे हैं. लेकिन, कहने वाले ये बताने से नहीं चूक रहे कि वो अपनी ताकत विकास के दावे के बजाए अपनी जाति के वोटों को मान रहे हैं. 


प्रयोग एनडीए भी भरपूर कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बात विकास से शुरु की. 

फिर बिहार को लुभावना पैकेज दिया. बिहार के पिछड़ेपन की बात की और दावा किया कि उनकी सरकार बनी तो फिर... समझ लीजिए कि बिहार जाने क्या हो जाएगा. 

बीजेपी की अगुवाई में एनडीए के प्रयोगों के बीच आरएसएस ने भी एक्सपेरिमेंट शुरु कर दिए. भागवत जी ने आरक्षण को लेकर एक बयान दे दिया. 

प्रयोगों के इस दौर में हवा उम्मीद के मुताबिक नहीं बनी. मोदी ने पैकेज जिस अंदाज में दिया, उसे नीतीश- लालू की जोड़ी ने बिहार की बोली लगाना बता दिया. 

भागवत के बयान को आरक्षण खत्म करने की साजिश कह दिया. 

इस बीच कहानी में ट्विस्ट आया. दादरी हो गया. नोएडा और पटना की दूरी एक हज़ार किलोमीटर है लेकिन बीफ यानी गोमांस का मुद्दा पलक झपकते ही नोएडा से पटना पहुंच गया. 

ये बात अलग है कि अब एक प्रयोगशाला ने साफ कर दिया है कि दादरी में मारे गए अखलाक अहमद के फ्रीज में रखा मांस बीफ नहीं बल्कि मटन था लेकिन बिहार की प्रयोगशाला में बीफ के सहारे कामयाबी की रेसेपी तैयार करने की कोशिश शुरु हो गई. 


इस बीच बड़बोले लालू गोमांस पर ऐसा कुछ बोल गए जो उनके ही खिलाफ जाने लगा. कम से कम भ्रम तो ऐसा ही बनाया गया. लालू कहते रहे कि मैंने ऐसा नहीं कहा. बीजेपी के नेताओं ने उनके खंडन पर ध्यान ही नहीं दिया और वो बताते गए कि देखो, देखो लालू क्या कह रहे हैं. छी. छी. छी. 

लालू ने जो सफाई दी उसकी भी इस सफाई से धुलाई हुई कि उनकी सांसे उखड़ने लगीं. लालू पिछले दो चुनाव नीतीश कुमा्र से हारे जरुर हैं लेकिन वो ऐसे हांफे कभी नहीं थे. अपनी ही प्रयोगशाला में लालू पहली बार ऐसे 'लुल्ल' दिखे. हालांकि वो चतुर सुजान हैं. उन्हें इस स्थिति का अंदाजा रहा होगा. तभी उन्होंने जहर का घूंट पीते हुए नीतीश कुमार से हाथ मिलाया था.

नीतीश भी लपके हुए लालू की तरफ आए तो उसकी वजह यही थी कि दो दशक बाद बिहार की राजनीति सिर्फ लालू और नीतीश के चेहरों तक नहीं सिमटी रही. एक ऐसा तीसरा चेहरा आ गया जो बिहार की जमीन पर नहीं उगा लेकिन इसी जमीन पर लालू और नीतीश दोनों को पटक मार गया. लोकसभा चुनाव में.  

बहरहाल, बिहार की प्रयोगशाला में हो रहे प्रयोगों को लेकर राजनीति के वैज्ञानिक चाहे जिस नतीजे की उम्मीद लगाएं, लेकिन असल निष्कर्ष क्या निकलेगा, इसे लेकर कोई दावे से कुछ कहने की स्थिति नहीं है. 

मजा ये है कि खबरी लोग तब भी बिहार के मूड की भविष्यवाणी करने से नहीं चूक रहे हैं. नेता एक दूसरे की पोल खोल रहे हैं तो चैनल ओपिनयन पोल दिखा रहे हैं. ज्यादातर मोदी सेना को आगे बता रहे हैं. कुछ ने लालू-नीतीश की जोड़ी को भी आगे बताया है. 


बिहार में चुनाव की तारीखें भी शोध के बाद तय की गईं लगती हैं. बिहारी भाई चुनाव के लिए पहला चरण 12 अक्टूबर यानी जेपी की जयंती के एक दिन बाद बढ़ाएंगे. 

हमेशा की तरह इस बार भी लड़ाई जेपी के चेलों के बीच है. एक तरफ हैं लालू-नीतीश दूसरी तरफ हैं सुशील मोदी, रविशंकर प्रसाद. 

चालीस साल पहले जेपी ने इन चेलों को जाति से ऊपर उठने के लिए जनेऊ तोड़ो का नारे सिखाया था. लेकिन चेले चालीस साल बाद भी जातियों के पाले में बैठे हुए हैं.  

उन्हें जेपी का दूसरा नारा याद है. 'संपूर्ण क्रांति अब नारा है. भावी इतिहास हमारा है'. सवाल करने वाले ये भी पूछ सकते हैं कि भावी है तो इतिहास कैसे हो सकता है और इतिहास है तो भावी कैसे हो पाएगा. 

खैर, मेरा सवाल उस प्रयोग के नतीजे के लेकर है, जो बिहार की राजनीतिक प्रयोगशाला में हो रहा है. नेता चाहे जो भी मानें मेरी सोच साफ है. बिहारी बुड़बक नहीं होते. दुनिया ने उनकी छवि चाहे जैसी भी बना दी हो, लेकिन राजनीति की समझ उनमें बहुत साफ है. और इस बार बिहार इसे पूरी साफगोई से बताने जा रहा है. 

चलते-चलते बिहारी साथियों की ओर से मिला एक हंसगुल्ला 

बिहार की दशा सुधारने के लिए एक मीटिंग बुलाई गई. 

सवाल था क्या किया जाए. 

एक चिरकुट ने कहा, चलो जी अमेरिका पर हमला बोल देते हैं. 

बाकी बोले, ऊ से का होगा. 

जवाब मिला. अमेरिका से जीतेंगे तो नहीं. अमेरिका जीत के अपना झंडा लगा देगा. फिर हम भी अमेरिका होंगे. 

बिकास खुद्दे हो जाएगा. 

किनारे बैठे चच्चा चुप थे. 

सबने पूछा, ऐ चच्चा, चुप काहे हो. 

चच्चा सिर खुजलाते हुए बोले. 

साला सोच रहे हैं कि हम जीत गए तो अमेरिका का क्या होगा?

'जय बिहार'






मंगलवार, 18 अगस्त 2015

नंबर का खेल समझिए साहेब

दुनिया फंसेगी आंकड़ों का जाल तो बिछाइये 


आज बात एक सवाल से शुरु करते हैं. 

क्या आपको आंकड़ों से खेलना आता है ? अगर नहीं तो जल्दी सीख लीजिए. 

21 वीं सदी में कामयाबी के तिलिस्म का ताला आंकड़ों की चाबी से ही खुलता है. 

लेकिन, आपको ध्यान रखना होगा कि आपके पास सही चाबी है. 

नहीं तो ज़िंदगी ताले खोलने की कोशिश में ही गुजर जाएगी.  

जो आंकड़ों को महज भरम मानते हैं, उनसे मैं कहूंगा अपनी सोच को थोड़ा सा 'मॉडिफाई' कर लें. 

आंकड़े भरम नहीं इंद्रजाल सरीखे होते हैं, जो पूरे जमाने को भरमा देते हैं. या कहें कि दीवाना बना देते हैं. 

चलिए मैं एक और सवाल पूछता हूं. 

नितिन फायर प्रोटेक्शन इंडस्ट्रीज का नाम सुना था? मैंने कल तक नहीं सुना था. सुनने की वजह बना एक दिलचस्प आंकड़ा. 

कंपनी के शेयरों में अमिताभ बच्चन ने निवेश किया और उनमें दस फ़ीसदी का उछाल आ गया. 

अगर शेयर इतनी तेज़ी से छलांग न लगाते तो अमिताभ का निवेश भी ख़बर नहीं बनता. 

बात अमिताभ की निकली है तो बॉलीवुड का हाल भी देखते चलें. 

एक दौर वो था, जब किसी आने वाली फिल्म की कहानी, संगीत और दूसरे आर्टिस्टिक पहलू पर बात होती थी लेकिन अब सवाल सिर्फ एक होता है. क्या ये फिल्म 100 करोड़ के क्लब में शामिल होगी?

क्रिकेट तो खैर आंकड़ों की पिच पर ही खेला जाता है. 

ये आंकड़े ही खेल की दिलचस्पी बढ़ाते हैं और फैन्स को मैदान और टीवी के सामने तक खींच कर लाते हैं. 

अब मैच की कामयाबी टीआरपी यानी उस आंकड़े से तय होती है कि टीवी पर उसे कितने लोगों ने देखा. 

भारत और श्रीलंका की बोरिंग समझी जा रही टेस्ट सीरीज में भी आंकड़ों ने ही दिलचस्पी जगाई. 

सीरीज़ शुरु होने के पहले बताया गया कि भारत ने 22 साल से श्रीलंका में टेस्ट सीरीज़ नहीं जीती है और विराट कोहली की जोशीली युवा टीम ऐसा कर सकती है. 

ये बात अलग है कि गॉल में खेले गए पहले टेस्ट मैच में इस टीम ने कुल्हाड़ी पर पैर मार लिया. 

और तो और, आंकड़े न हों तो घोटालों की 'गरिमा' भी समझ में नहीं आती. 

मसलन दो हज़ार करोड़ का घोटाला. सुनते ही लगता है, हैरान होकर पूछें, 'भैये बताओ क्या लूट मचाई है'? किसी चौपाल पर कोई पूछ भी सकता है, 'बताओ तो जी, कित्ते ज़ीरो लगिंगे दो हज़ार करोड़ में?'

इन आंकड़ों के दम पर ही पूर्व सीएजी विनोद राय का नाम बच्चे-बच्चे को याद हो गया. अब उस कुर्सी पर शर्मा जी बैठे हैं, लेकिन किसे पता? 

आंकड़ों का ये खेल इमेज बिल्डिंग में खासा मददगार साबित हो सकता है. 

क्या आपको पता है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कितने घंटे सोते थे और कितने घंटे काम करते थे?

मुझे नहीं पता. लेकिन मोदी जी के बारे में पता है. वो बीस घंटे काम करते हैं और चार घंटे सोते हैं. 

मुझे ये भी पता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने 15 मिनट की भी छुट्टी नहीं ली. 

और, अब थोड़ी देर पहले ये भी पता चला है कि वो यूएई से एक भारी-भरकम आंकड़ा लेकर लौट रहे हैं 

मोदी जी लेकर क्या गए थे, पता नहीं लेकिन साढ़े चार लाख करोड़ के निवेश का भरोसा लेकर आ रहे हैं. 

ये आंकड़ा इतना बड़ा है कि अगर आप ज़ीरो लगाने या गिनने को कह दें तो मुझे चक्कर आ सकते हैं. 

और अब आज के लिए मेरा आखिर सवाल कि इस रकम का होगा क्या?  

क्या इससे आपकी ज़िंदगी में बदलाव आएगा? जरुर आ सकता है, बशर्ते आप आंकड़ों से खेलना सीख पाएं

और, चलते-चलते आंकड़ों से जुड़ा एक किस्सा. 

कुछ दिन पहले बिहार के एक सांसद से मुलाकात हुई. बड़े दिलचस्प और ईमानदार सांसद हैं. बातें भी ईमानदारी से करते हैं. बात रेलवे की हो रही थी. 

उन्होंने कहा, 'हम तो अपनी जानते हैं. पहले हमारे यहां के लिए मगध नंबर एक गाड़ी थी. वक्त पर चलती थी. फिर संपूर्ण क्रांति आई. मगध पिटने लगी. संपूर्ण क्रांति नंबर वन बन गई और वक्त पर पहुंचाने की गारंटी देने  लगी. फिर, राजधानी सातों दिन के लिए मिल गई. अब राजधानी नंबर वन हो गई'. 

मैंने पूछा, 'संपूर्ण क्रांति का क्या हुआ'? 

वो बोले, 'होना क्या था? पिटने लगी. हमारे यहां तो कोई एक ही नंबर वन रह सकता है'. 

ज़रा नंबर का खेल समझिए, साहब 

सोमवार, 17 अगस्त 2015

हवा बदल सकती है

लेकिन फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता 

बाल्की का वो एड अद्भुत था. 

काका की मौत के कुछ दिन पहले ही टीवी पर दिखना शुरु हुआ था.

दुनिया ये भूली नहीं थी कि काका यानी राजेश खन्ना हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे लेकिन उन दिनों वो किस हाल में थे, किसी को नहीं पता था. न फिक्र थी. 

अचानक वो विज्ञापन आया और छा गया. हरेक के दिलो दिमाग पे. 

वो फैन्स चौंक पड़े, जिन्होंने सत्तर के दशक में राजेश खन्ना के चमकते चेहरे, अदा के साथ गर्दन को झटका देते हुए आंख बंद करने के अंदाज पर निसार होकर उन्हें सुपरस्टार की पदवी दी थी. 

कांपती आवाज. झुकी हुई पीठ. सफेद दाढ़ी शायद पिचके हुए गालों को छुपाने के लिए रखी गई थी, लेकिन वो ऐसा करने में नाकाम थी. 

आंख पर चश्मे था. लेकिन देखने वाले ये परखने से नहीं चूके कि काका की आंखों में वही रूमानियत बाकी है. 

सुनहरे दिनों की याद दिलाने वाली कोई और बात बाकी थी तो वो था सुपरस्टार होने का गुरुर. 

पैंतीस सैकेंड के एड में जब राजेश खन्ना इठला के कहते हैं 

'हवा बदल सकती है लेकिन फैन्स हमेशा मेरे रहेंगे' 

'बाबू मोशाय, मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता' 

तो शायद ही किसी को लगा हो कि वो गलत दावा कर रहे हैं. 

आपको हैरत हो सकती है, भला आज में इस एड को क्यों याद कर रहा हूं. क्यों उसकी बात कर रहा हूं. बताता हूं, 
इसकी वजह हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. 

यूएई के दौर पर गए मोदी के लिए अबू धाबी में वही दीवानगी दिखी, जो राजेश खन्ना जैसे बॉलीवुड के गिने-चुन सुपरस्टार्स को नसीब होती है. राजनीति में तो उसकी कल्पना बेमानी है. 

उनका शेख जायद मस्जिद पहुंचना कई मामलों में अनूठी बात थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी पहली बार एक मस्जिद में दाखिल हुए. 

लेकिन, इससे भी बड़ा अजूबा था, वहां मौजूद लोगों का 'मोदी- मोदी, मोदी-मोदी' कहते हुए प्रधानमंत्री को चीयर करना. हमने ये भारत में देखा है. अमेरिका में देखा है. ऑस्ट्रेलिया में देखा है और अब यूएई में देख रहे हैं.

मोदी का यूएई दौरा तय होने के बाद ज्यादातर लोग जान गए हैं कि वहां करीब 26 लाख हिंदुस्तानी रहते हैं. 

विरोधी कह सकते हैं कि ये इवेंट मैनेजमेंट का कमाल है. 

लेकिन, अबू धाबी के चंद एक लोग, जिनसे मेरी बात हुई, वो ऐसा नहीं मानते. 

उन्हें मोदी के दौरे के इर्द-गिर्द एक अजब सा उत्साह दिख रहा है. 

अब बात हवा बदलने की भी कर लेते हैं. घर में अब मोदी के लिए वो माहौल नहीं दिखता, जिसके दम पर उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता था. 

उनकी सरकार कई सवालों के घेरे में है. मोदी से लोगों का मोह भले ही भंग न हुआ हो, लेकिन उनको लेकर दिखने वाली दीवानगी जरुर घटी है. 

संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के हंगामे में कार्यवाही न चल सकी तो तमाम लोगों ने मोदी की भूमिका पर भी सवाल उठाए. 

विपक्ष को तो खैर उनके हर कदम में खोट नज़र आता ही है. फिल्म हो या फिर राजनीति जब हवा बदलने लगती है तो पैरों के नीचे की जमीन संभालना मुश्किल होता है. फैन्स तो खैर सबसे पहले साथ छोड़ते हैं. 

और, जो बदलते हालात के बाद भी फैन्स को तिल भर भी नहीं हिलने दे. अपने तिलिस्म में बांधे रखे. वो सदाबहार सुपरस्टार होता है. काका की तरह. 

पहले लाल किले से बच्चों के बीच की तस्वीरें और अब यूएई का माहौल गवाही देता है कि मोदी ने भी स्टारडम का वो फॉर्मूला खोज लिया लगता है, जहां वो हर विरोधी से कह सकते हैं,  

'हवा बदल सकती है लेकिन फैन्स हमेशा मेरे रहेंगे' 

'मित्रों, मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता'