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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

रिमोट, सिनेमा और संसद

...पर्दे में रहने दो 

बड़ी उम्दा चीज है रिमोट. जबरदस्त एंटरटेनर. 

एक वक्त जिस टीवी को बुद्धू बक्सा कहा जाता था, रिमोट ने उस बक्से में मनोरंजन का खजाना भर दिया है.

रिमोट का बटन दबाओ और मुस्कुराते जाओ. 

मसलन, कुछ मिनट पहले की बात है. हाथ में रिमोट लिए टीवी पर टकटकी लगाए बैठा था 

यश चोपड़ा की फिल्म 'दीवार' का मशहूर सीन चल रहा था. 

तीन किरदार. अमिताभ बच्चन, शशि कपूर और निरुपमा रॉय. 

डॉयलॉग अमिताभ और शशि कपूर के बीच थे. 

अमिताभ कहते हैं,

'हां मैं साइन करुंगा'

'लेकिन, मैं अकेले नहीं करुंगा और सबसे पहले साइन नहीं करुंगा' 

'जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे बाप का साइन लिया था.' 

'पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरी मां को गाली देकर नौकरी से निकाल दिया था' 

'जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे हाथ पे ये लिख दिया था'. 

'उसके बाद मेरे भाई तुम जिस कागज पर कहोगे मैं साइन कर दूंगा' 

अमिताभ चुप हुए तो शशि कपूर ने अलसाए अंदाज में बोलना शुरु किया 

'दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं हो जाते'... 

डॉयलॉग आधा ही खत्म हुआ था कि उंगली में हरकत हो गई. एक न्यूज़ चैनल लग गया. 

संसद की खबर थी. संसद में हंगामा बरपा हुआ था. जबरदस्त शोर. 

एक महिला मंत्री बोल रही थीं. बोल क्या रहीं थीं. खुद पर लगे आरोपों के जवाब में वो आरोप गिना रहीं थीं जो कभी कांग्रेस पर लगे थे. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अतीत याद दिला रही थीं. 

'सारे काले कारनामे जो उस इतिहास में दर्ज हैं उनको पढ़ें' 

'लौट के पूछे मम्मा 15 हजार के हत्यारे एंडरसन को डैडी ने क्यों छुड़ाया था.' 

यहां भी मां. वहां भी मां. यहां भी बाप. वहां भी बाप. यहां भी सवाल. वहां सवाल. 

यहां भी खुद को बेकसूर साबित करने की कोशिश. वहां भी खुद को बेकसूर बताने का इरादा. 

यहां भी सुनने वाले की आंख में सौ सवाल. वहां भी सुनने वाले की आंख में सौ सवाल. 

कमाल का इत्तेफ़ाक.

उगंली बटन पर दबी. म्यूजिक चैनल लग गया. पंद्रह अगस्त करीब है. गाना उसी मूड का था. 

'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की'...

आधा गाना सुना कि तमन्ना फिर रिमोट का बटन दबाने की हो गई. 

न्यूज़ चैनल पर इस बार राहुल गांधी बोल रहे थे. 

'गांधी जी के तीन बंदर हुआ करते थे' 

'एक बंदर कहता था बुरा मत देखो'

'दूसरा बंदर कहता था बुरा मत सुनो' 

'तीसरा बंदर कहता था बुरा मत बोलो' 

'मोदी जी ने इसे मोदीफाई कर दिया है' 

'मोदी जी का कहना है' 

'सच को मत देखो, सच को मत सुनो, सच को मत बोलो'  

रिमोट दबा... टीवी दोबारा म्यूजिक चैनल पर सेट हो गया 

इस बार गाना था 'तुझे सब है पता मेरी मां'.. 

रिमोट हाथ में था तो दोबारा न्यूज़ चैनल पर लौटने का दिल हुआ 

राहुल अभी बोले जा रहे थे. 

राहुल कह रहे थे, 'कल यहां सुषमा जी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, बेटा... बेटा तुम मुझसे गुस्सा क्यों हो मैंने तुम्हारा क्या किया' 

'मैंने सुषमा जी से कहा, सुषमा जी मैं आपसे गुस्सा नहीं हूं आपकी मैं आदर करता हूं' 

'और मैंने आपकी आंखों में देखा.. जैसे मैं अब देख रहा हूं मैंने आपसे कहा सुषमा जी मैं सच बोल रहा हूं और 
आपकी आंखें ऐसे गईं... आपकी आंखें ऐसे नीचे गईं' 

रिमोट ने फिर हरकत की. म्यूजिक चैनल पर टीवी सेट हुआ...

इस बार गाना था... 'पर्दे में रहने दो'... 

सोमवार, 10 अगस्त 2015

मेरा बच्चा (नेता) होनहार

... तो बजाओ ताली

आप तो जानते हैं. अंग्रेजी में उसे 'एब्रीविएशन' कहते हैं. आम बोलचाल में शॉर्टफॉर्म भी कह देते हैं. छोटे- छोटे बच्चों के मां-बाप की खुशी भी आपको याद होगी. उस वक्त जब किसी गेस्ट के सामने उनका बच्चा शॉर्टफॉर्म की फुलफॉर्म करता है. 

मां कहती है, 'बेटा, आईएएस की फुलफॉर्म बताओ'. 

बच्चा जवाब देता है, 'इंडियन एडमिनस्ट्रेटिव सर्विस.' 

मां के चेहरे पर मुस्कान. दूसरा सवाल आता है. 

'बेटा, अब सीबीआई बताओ.' 

बच्चा कहता है, 'सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन.' 

मां का चेहरा खुशी से लाल. अब सबसे मुश्किल सवाल. 

'अच्छा, बीसीसीआई की फुलफॉर्म क्या है'?

बच्चा छत की तरफ देखता है. आंखे मिचमिचाता है. इस बार मुस्कुराने की बारी गेस्ट की होती है. मां के चेहरे पर हवाई सी उड़ रह है. 

डैडी बोल पड़ते हैं, 'अरे छोड़ो भी. तुमने तो घर पर ही स्कूल खोल दिया.'

खतरा बच्चे के नहीं डैडी के फेल होने का है. 

मां अब भी हिम्मत नहीं हारती. 

'क्या राहुल, मेरा अच्छा बेटा, भूल गया. थोड़ी देर पहले ही तो सुना रहा था.' 

डैडी फिर कहते हैं, 'तुम भी... कमाल करती हो.' 

इतने में बच्चे का मुंह खुलता है. सौ की स्पीड से बोलने वाला बच्चा राहुल दस की स्पीड से शुरुआत करता है. 

'बोर्ड... बोर्ड ऑफ कंट्रोल... बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट...' 

आखिरी दो शब्दों में रफ्तार बढ़ जाती है. 

'.. इन इंडिया. बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर... क्रिकेट इन इंडिया...' 

मां कुर्सी छोड़कर खड़ी हो जाती है. ताली बजाने लगती है. घर आए अतिथि महोदय भी शर्मा- शर्मी में एक- दो बार दोनों हाथों की हथेली मिला देते हैं. फुसफुसाते हुए कहते हैं, 'शाबास'. 

मां उनके रिएक्शन को नहीं देखती. उसे देखने की फुर्सत भी नहीं. वो अपनी धुन में रहती है. अपनी सुनाए जाती है. 

'बताइये भाई साहब. सिर्फ चार साल का है. कोई और बच्चा बता देगा. आप बताइये.' 

गेस्ट कुछ कहते उसके पहले ही मां का जोश बढ़ जाता है. 

'ये तो कुछ नहीं. आप कुछ भी पूछिए. यूएसए पूछिए. यूएसएसआर पूछिए. पूछिए. पूछकर देखिए. ये सब बता देगा.'

पहले बच्चा बालों में उंगलिया डाले सिर खुजला रहा था. अब यही काम गेस्ट महोदय करते हैं. 

सोचते हैं. 'पूछूं.. क्या पूछूं... अरे क्यों पूछूं...'

मन ही मन सोचते हैं... 'पहले बच्चे को रट्टू तोता बनाते हो, फिर हमारे सामने रौब जमाते हो. कहां फंस गए.' 

कुछ देर सोच विचार के कहते हैं, 'जी ... जी... बड़ा होनहार बच्चा है... आईएएस ही बनेगा...' 

अपनी इस भविष्यवाणी पर मन ही मन बड़ा सा क्वैश्चनमार्क भी लगा लेते हैं. 

ये सीन 1980 के दशक का है. तब यूएसएसआर के टुकड़े नहीं हुए थे. बच्चों के पास प्लेस्टेशन नहीं थे और दूसरों पर रौब गांठने के लिए ऐसा ही कुछ किया जाता था. बच्चा गेस्ट के सामने ऐसा इम्तिहान देता था जिसका रिजल्ट उसे नहीं बल्कि उसके मां-बाप को मिलता था. 

गेस्ट भी मन से या बेमन आशीर्वाद देता था .. 'आईएएस बनेगा'.

अब आईएएस तो गिनती के बनते हैं साल में. कितने बनते. पता नहीं किसी गेस्ट ने सोचा क्यों नहीं. बच्चा नेता भी बन सकता है. 1980 के दशक के उन बच्चों के मां-बाप की सोच और सवाल शायद अब तक नहीं बदले हैं. उन बच्चों के मां-बाप के हमउम्र नेता इन दिनों जिस अंदाज में लोगों से सवाल पूछते हैं, उससे यही लगता है. 

एक नेताजी पूछते हैं, 'जेडीयू मतलब'?  जवाब भी खुद देते हैं, 'जनता का दमन उत्पीड़न.' 'आरजेडी का फुलफॉर्म'? 'रोज जंगल राज का डर'. 

दूसरे नेताजी भी पीछे नहीं. वो पूछते हैं, 'बीजेपी मतलब'... फिर जवाब देते हैं, 'बड़का झुट्ठा पार्टी'. 

तो बजाइये ताली. कहिए शाबास. अगर आप खुद को 1980 के उस दशक से जोड़ पाते हैं तो मुस्कुराइए. इस दौर का जमकर मजा लीजिए. इस बार 'तमाशा' आप नहीं. तमाशा बुजुर्गों की फौज कर रही है और आपका जिम्मा ताली बजाकर मजा लेने का है. हां, आपके पास एक ऑप्शन भी है. बोर हो जाएं तो चैनल बदल सकते हैं. मुझे यकीन है कि ये तमाशा देखने आप किसी रैली में तो नहीं ही जाएंगे.