गुरुवार, 13 अगस्त 2015

रिमोट, सिनेमा और संसद

...पर्दे में रहने दो 

बड़ी उम्दा चीज है रिमोट. जबरदस्त एंटरटेनर. 

एक वक्त जिस टीवी को बुद्धू बक्सा कहा जाता था, रिमोट ने उस बक्से में मनोरंजन का खजाना भर दिया है.

रिमोट का बटन दबाओ और मुस्कुराते जाओ. 

मसलन, कुछ मिनट पहले की बात है. हाथ में रिमोट लिए टीवी पर टकटकी लगाए बैठा था 

यश चोपड़ा की फिल्म 'दीवार' का मशहूर सीन चल रहा था. 

तीन किरदार. अमिताभ बच्चन, शशि कपूर और निरुपमा रॉय. 

डॉयलॉग अमिताभ और शशि कपूर के बीच थे. 

अमिताभ कहते हैं,

'हां मैं साइन करुंगा'

'लेकिन, मैं अकेले नहीं करुंगा और सबसे पहले साइन नहीं करुंगा' 

'जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे बाप का साइन लिया था.' 

'पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरी मां को गाली देकर नौकरी से निकाल दिया था' 

'जाओ पहले उस आदमी का साइन लेकर आओ जिसने मेरे हाथ पे ये लिख दिया था'. 

'उसके बाद मेरे भाई तुम जिस कागज पर कहोगे मैं साइन कर दूंगा' 

अमिताभ चुप हुए तो शशि कपूर ने अलसाए अंदाज में बोलना शुरु किया 

'दूसरों के पाप गिनाने से तुम्हारे अपने पाप कम नहीं हो जाते'... 

डॉयलॉग आधा ही खत्म हुआ था कि उंगली में हरकत हो गई. एक न्यूज़ चैनल लग गया. 

संसद की खबर थी. संसद में हंगामा बरपा हुआ था. जबरदस्त शोर. 

एक महिला मंत्री बोल रही थीं. बोल क्या रहीं थीं. खुद पर लगे आरोपों के जवाब में वो आरोप गिना रहीं थीं जो कभी कांग्रेस पर लगे थे. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अतीत याद दिला रही थीं. 

'सारे काले कारनामे जो उस इतिहास में दर्ज हैं उनको पढ़ें' 

'लौट के पूछे मम्मा 15 हजार के हत्यारे एंडरसन को डैडी ने क्यों छुड़ाया था.' 

यहां भी मां. वहां भी मां. यहां भी बाप. वहां भी बाप. यहां भी सवाल. वहां सवाल. 

यहां भी खुद को बेकसूर साबित करने की कोशिश. वहां भी खुद को बेकसूर बताने का इरादा. 

यहां भी सुनने वाले की आंख में सौ सवाल. वहां भी सुनने वाले की आंख में सौ सवाल. 

कमाल का इत्तेफ़ाक.

उगंली बटन पर दबी. म्यूजिक चैनल लग गया. पंद्रह अगस्त करीब है. गाना उसी मूड का था. 

'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की'...

आधा गाना सुना कि तमन्ना फिर रिमोट का बटन दबाने की हो गई. 

न्यूज़ चैनल पर इस बार राहुल गांधी बोल रहे थे. 

'गांधी जी के तीन बंदर हुआ करते थे' 

'एक बंदर कहता था बुरा मत देखो'

'दूसरा बंदर कहता था बुरा मत सुनो' 

'तीसरा बंदर कहता था बुरा मत बोलो' 

'मोदी जी ने इसे मोदीफाई कर दिया है' 

'मोदी जी का कहना है' 

'सच को मत देखो, सच को मत सुनो, सच को मत बोलो'  

रिमोट दबा... टीवी दोबारा म्यूजिक चैनल पर सेट हो गया 

इस बार गाना था 'तुझे सब है पता मेरी मां'.. 

रिमोट हाथ में था तो दोबारा न्यूज़ चैनल पर लौटने का दिल हुआ 

राहुल अभी बोले जा रहे थे. 

राहुल कह रहे थे, 'कल यहां सुषमा जी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा, बेटा... बेटा तुम मुझसे गुस्सा क्यों हो मैंने तुम्हारा क्या किया' 

'मैंने सुषमा जी से कहा, सुषमा जी मैं आपसे गुस्सा नहीं हूं आपकी मैं आदर करता हूं' 

'और मैंने आपकी आंखों में देखा.. जैसे मैं अब देख रहा हूं मैंने आपसे कहा सुषमा जी मैं सच बोल रहा हूं और 
आपकी आंखें ऐसे गईं... आपकी आंखें ऐसे नीचे गईं' 

रिमोट ने फिर हरकत की. म्यूजिक चैनल पर टीवी सेट हुआ...

इस बार गाना था... 'पर्दे में रहने दो'... 

बुधवार, 12 अगस्त 2015

'गणेश को दूध पीना है तो यहीं पिएगा'

हमारे भरम पर भारी अम्मा की भक्ति 

मैं भी उन लोगों में शामिल था. मेरे एक हाथ में दूध भरा लोटा था और दूसरे में चम्मच. 

गली में ही गणेश जी की संगमरमर की मूरत के सामने खड़ा था. अपना नंबर आया तो मैं गणेश जी की सूंड  के आगे चम्मच दर चम्मच दूध लगाता गया. बहुत सा दूध बह रहा था. लेकिन चम्मच खाली होते ही लगता था कि गणेश जी ने कृपा कर दी. धन्य कर दिया. मेरा अर्पित किया हुआ दूध भी पी लिया. 

शंकर जी को दूध में नहाते कई बार देखा था. आज उनके बेटे की मौज थी. गणेश दूध पिए जा रहे थे और मेरे जैसे भक्त दूध पिलाए जा रहे थे. पूरी गली लाइन में लगी थी. मेरे हमउम्र किशोरों से लेकर बूढ़े- बुजुर्गों तक. गणेश जी को दूध पिलाकर कुछ मांगना है, ये हमें याद नहीं था. ये ख्याल भी नहीं आया कि गणेश जी तो लड्डू खाते हैं, भला अब दूध क्यों पीने लगे.

इस भीड़ में एक चेहरा मिसिंग था. मेरी अम्मा. यानी मेरे पापा की मां. 

ये सबके चौंकने की वजह थी. वो क्यों, ये भी बता देता हूं. 

अम्मा हर दिन सुबह तीन बजे उठती थीं. चार बजे घर में बने मंदिर में पहुंच जाती थीं. 
चौंसठ माला (एक माला में एक सौ आठ मनके होते हैं और हरिनाम करने वाले हर मनके पर महामंत्र यानी हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम हरे हरे का जाप करते हैं ) हरिनाम करके सुबह साढे छह बजे घर से डेढ किलोमीटर पैदल चलते हुए श्री राजाधिराज मंदिर में मंगला दर्शन करती थीं. फिर यमुना स्नान करते हुए घर लौटती थीं. 

यमुना से लाए जल से घर के लड्डू गोपाल का अभिषेक करती थीं. गोपाल जी को तुलसी के 108 दल चढाती थीं. उसके बाद पानी पीती थीं. फिर संस्कृत, बंग्ला और हिंदी के अनगिनत ग्रंथों का पाठ करती थीं. 

इस सब में दो बज जाते थे. फिर खाना खाती थीं. शाम चार बजे अम्मा के लड्डू गोपाल की नींद खुल जाती थी. उन्हें फल का भोग अम्मा ही लगाती थीं. उसके बाद पूजा और कीर्तन का क्रम शुरु होता था. 

रात आठ बजे की आरती के बाद अम्मा अगले दिन मंदिर और यमुना स्नान के लिए जाने की तैयारी करती थीं. एक डलिया, जिसे हम कंडिया कहते थे, में अपने कपड़े रखती थीं. एक डिब्बे में दान करने के लिए अनाज भरती. 

रात नौ से साढ़े नौ के बीच भगवान को शयन करातीं और फिर खाना खातीं. रात साढे दस बजे चौंसठ माला शुरु करतीं और फिर माला खत्म होने के बाद सोने का नंबर आता. 

अम्मा के इस रूटीन को गली ही नहीं पूरा मुहल्ला जानता था. अम्मा को दिल का दौरा पड़ चुका था. पैरालिटिक अटैक भी हो चुका था. एक बार भगवान के लिए माला बनाते समय आँख में सुई चुभ चुकी थी. अम्मा एलोपैथी की दवाएं भी नहीं लेती थीं. 

वो कहती थीं, 'ठाकुर जी सब ठीक करेगा. गोपाला देखेगा.' 

गोपाला की ऐसी कृपा थी कि इतनी बीमारियों का बोझ उठाए अम्मा 77 की उमर तक इसी रुटीन में रहीं. अम्मा कभी छड़ी लेकर नहीं चलीं. उनके चलने की रफ्तार लगभग दौड़ने जैसी रही. वो कभी लेट नहीं हुईं. हमेशा घड़ी की सूईयों से कदम ताल करके चलीं.

जीवन के आखिरी 3 महीने अम्मा बिस्तर पर थीं. आखिरी 15 दिन अम्मा ने खाना पीना छोड़ दिया था. हम बच्चे कसम देते. मिन्नत करते तो कभी कभार कुछ पीने के लिए मुंह खोल लेतीं. 

मुझे अम्मा की ज़िंदगी का आखिरी दिन याद है. अम्मा को खांसी का दौरा पड़ा. डॉक्टर ने इंजेक्शन लिखा. मैं जल्दी से इंजेक्शन लाया. साथ में कम्पाउंडर भी था. मैंने कहा, 'अम्मा चिंता मत करो'. 

अम्मा ने कहा, 'मुकुन्दा तू है तो मुझे क्या चिंता'. 
और शाम को अम्मा चली गईं. मैं मानता हूं कि ये इच्छा मृत्यु थी. 

अम्मा ने इन तीन महीनों में न माला फेरी. न यमुना स्नान को गईं. न अपने लड्डू गोपाल की सुध ली. अम्मा को शायद लग गया था कि अगर वो उसी रुटीन में रहीं तो लड्डू गोपाल उन्हें 'गोलोक' नहीं आने देंगे. 

गणेश जी ने जब दूध पिया, वो वक्त, अम्मा के इस दुनिया से जाने के करीब दो साल पहले का था. 

सब हैरान थे कि अम्मा क्यों नहीं आईं, दूध लिए, गणेश को पिलाने. अम्मा आतीं तो लाइन में पहला नंबर उनका ही होता. इसके लिए न तो हमें किसी से गुजारिश करनी होती न उनकी उम्र का हवाला देना होता. अम्मा की भक्ति की शक्ति का असर इतना था कि सब उन्हें खुद ही रास्ता दे देते. लेकिन, अम्मा नहीं आई. 

ऐसा नहीं है कि वो गणेश को दूध नहीं पिलाना चाहती थीं. उन्होंने एक कटोरी में दूध लिया. हमसे एक कदम आगे बढ़के दूध में चीनी मिलाई. गणेश बच्चे जो ठहरे. फीका दूध कैसे पीते. लेकिन, वो गली के मंदिर नहीं गईं. घर के मंदिर में अम्मा के भगवान के कुनबे में शिव परिवार भी है. इंच भर के पीतल के गणेश. अम्मा ने गणेश जी की सूंड के आगे दूध भरके चम्मच लगाया. गणेश जी ने दूध नहीं पिया. 

अब तक गली में हल्ला मच रहा था. 'गणेश जी ने मेरे हाथ से दूध पिया. मेरे हाथ से भी पिया. मैंने भी कटोरी भर दूध पिलाया.' 

मुझे हैरानी थी. गणपति सबका दिया दूध पी रहे हैं, लेकिन अम्मा के दिए दूध को गटकने में उन्हें क्या हर्ज है. मैंने कहा, 'अम्मा गली के गणेश दूध पी रहे हैं. वहीं चलो'. 

अम्मा मेरी हर बात मानती थीं. हर बात. लेकिन, इस बार अम्मा घर के मंदिर से बाहर भी नहीं आईं. 

अम्मा ने कहा, 'मुकुन्दा, गणेश को दूध पीना होगा, तो यहीं पिएगा'. 

मैं हैरान था. समझ नहीं पा रहा था कि अम्मा ऐसा क्यों कह रही हैं. गली के मंदिर जाने में उन्हें दिक्कत क्या है. मैने भी गली के गणेश को दूध पिलाया है. फिर अम्मा तो रोज़ मंदिर जाती हैं. 

अब गणेश को दूध पिलाने के लिए जाने में क्या एतराज. मैंने अपनी नरम दिल अम्मा का ये रुप पहली बार देखा. अम्मा ने कह दिया कि नहीं, 'गणेश को पीना है तो यहीं पिए'. 

अम्मा ने करीब आधा घंटा कोशिश की. चम्मच खाली नहीं हुआ. 

बाद में अखबारों, पत्रिकाओं और गुरु ज्ञानियों ने बताया कि दरअसल, गणेश ने कहीं दूध पिया ही नहीं था. वो ऐसा भरम था जिसने एक देश को भरमा दिया था. मेरे जानने वालों में अम्मा हीं थीं जिन्हें ये भरम नहीं हुआ. दिक्कत ये थी कि हमारी आंख अम्मा की भक्ति ने नहीं खोली. नामी ज्ञानियों को पढ़ने और सुनने के बाद हम जागे. अब सवाल था कि अम्मा को 'घर के ठाकुर' पर ही इतना भरोसा था तो वो मंदिर क्यों जाती थीं. अम्मा मंदिर जाती थीं स्थान को महत्व देने. भगवान तो हमेशा उनके साथ थे. मैंने रैदास की कहानी सुनी थी. 'मन चंगा तो कठोती में गंगा'. अम्मा ने उस कहानी का मतलब समझाने की कोशिश की तब हम समझ न सके. 'गोबर गणेश' साबित हुए. क्या गारंटी की हम अब भी समझे हैं. जरा गौर से देखिए, आप या हम किसी के कहने पर गणेश को दूध तो नहीं पिला रहे. 

सोमवार, 10 अगस्त 2015

मेरा बच्चा (नेता) होनहार

... तो बजाओ ताली

आप तो जानते हैं. अंग्रेजी में उसे 'एब्रीविएशन' कहते हैं. आम बोलचाल में शॉर्टफॉर्म भी कह देते हैं. छोटे- छोटे बच्चों के मां-बाप की खुशी भी आपको याद होगी. उस वक्त जब किसी गेस्ट के सामने उनका बच्चा शॉर्टफॉर्म की फुलफॉर्म करता है. 

मां कहती है, 'बेटा, आईएएस की फुलफॉर्म बताओ'. 

बच्चा जवाब देता है, 'इंडियन एडमिनस्ट्रेटिव सर्विस.' 

मां के चेहरे पर मुस्कान. दूसरा सवाल आता है. 

'बेटा, अब सीबीआई बताओ.' 

बच्चा कहता है, 'सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन.' 

मां का चेहरा खुशी से लाल. अब सबसे मुश्किल सवाल. 

'अच्छा, बीसीसीआई की फुलफॉर्म क्या है'?

बच्चा छत की तरफ देखता है. आंखे मिचमिचाता है. इस बार मुस्कुराने की बारी गेस्ट की होती है. मां के चेहरे पर हवाई सी उड़ रह है. 

डैडी बोल पड़ते हैं, 'अरे छोड़ो भी. तुमने तो घर पर ही स्कूल खोल दिया.'

खतरा बच्चे के नहीं डैडी के फेल होने का है. 

मां अब भी हिम्मत नहीं हारती. 

'क्या राहुल, मेरा अच्छा बेटा, भूल गया. थोड़ी देर पहले ही तो सुना रहा था.' 

डैडी फिर कहते हैं, 'तुम भी... कमाल करती हो.' 

इतने में बच्चे का मुंह खुलता है. सौ की स्पीड से बोलने वाला बच्चा राहुल दस की स्पीड से शुरुआत करता है. 

'बोर्ड... बोर्ड ऑफ कंट्रोल... बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट...' 

आखिरी दो शब्दों में रफ्तार बढ़ जाती है. 

'.. इन इंडिया. बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर... क्रिकेट इन इंडिया...' 

मां कुर्सी छोड़कर खड़ी हो जाती है. ताली बजाने लगती है. घर आए अतिथि महोदय भी शर्मा- शर्मी में एक- दो बार दोनों हाथों की हथेली मिला देते हैं. फुसफुसाते हुए कहते हैं, 'शाबास'. 

मां उनके रिएक्शन को नहीं देखती. उसे देखने की फुर्सत भी नहीं. वो अपनी धुन में रहती है. अपनी सुनाए जाती है. 

'बताइये भाई साहब. सिर्फ चार साल का है. कोई और बच्चा बता देगा. आप बताइये.' 

गेस्ट कुछ कहते उसके पहले ही मां का जोश बढ़ जाता है. 

'ये तो कुछ नहीं. आप कुछ भी पूछिए. यूएसए पूछिए. यूएसएसआर पूछिए. पूछिए. पूछकर देखिए. ये सब बता देगा.'

पहले बच्चा बालों में उंगलिया डाले सिर खुजला रहा था. अब यही काम गेस्ट महोदय करते हैं. 

सोचते हैं. 'पूछूं.. क्या पूछूं... अरे क्यों पूछूं...'

मन ही मन सोचते हैं... 'पहले बच्चे को रट्टू तोता बनाते हो, फिर हमारे सामने रौब जमाते हो. कहां फंस गए.' 

कुछ देर सोच विचार के कहते हैं, 'जी ... जी... बड़ा होनहार बच्चा है... आईएएस ही बनेगा...' 

अपनी इस भविष्यवाणी पर मन ही मन बड़ा सा क्वैश्चनमार्क भी लगा लेते हैं. 

ये सीन 1980 के दशक का है. तब यूएसएसआर के टुकड़े नहीं हुए थे. बच्चों के पास प्लेस्टेशन नहीं थे और दूसरों पर रौब गांठने के लिए ऐसा ही कुछ किया जाता था. बच्चा गेस्ट के सामने ऐसा इम्तिहान देता था जिसका रिजल्ट उसे नहीं बल्कि उसके मां-बाप को मिलता था. 

गेस्ट भी मन से या बेमन आशीर्वाद देता था .. 'आईएएस बनेगा'.

अब आईएएस तो गिनती के बनते हैं साल में. कितने बनते. पता नहीं किसी गेस्ट ने सोचा क्यों नहीं. बच्चा नेता भी बन सकता है. 1980 के दशक के उन बच्चों के मां-बाप की सोच और सवाल शायद अब तक नहीं बदले हैं. उन बच्चों के मां-बाप के हमउम्र नेता इन दिनों जिस अंदाज में लोगों से सवाल पूछते हैं, उससे यही लगता है. 

एक नेताजी पूछते हैं, 'जेडीयू मतलब'?  जवाब भी खुद देते हैं, 'जनता का दमन उत्पीड़न.' 'आरजेडी का फुलफॉर्म'? 'रोज जंगल राज का डर'. 

दूसरे नेताजी भी पीछे नहीं. वो पूछते हैं, 'बीजेपी मतलब'... फिर जवाब देते हैं, 'बड़का झुट्ठा पार्टी'. 

तो बजाइये ताली. कहिए शाबास. अगर आप खुद को 1980 के उस दशक से जोड़ पाते हैं तो मुस्कुराइए. इस दौर का जमकर मजा लीजिए. इस बार 'तमाशा' आप नहीं. तमाशा बुजुर्गों की फौज कर रही है और आपका जिम्मा ताली बजाकर मजा लेने का है. हां, आपके पास एक ऑप्शन भी है. बोर हो जाएं तो चैनल बदल सकते हैं. मुझे यकीन है कि ये तमाशा देखने आप किसी रैली में तो नहीं ही जाएंगे.    

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

बारिश, मेढ़क, हिजड़े और कलाम

सबको मेरा सलाम 

सवाल अचानक ही सूझा. गाड़ी दौड़ रही थी. म्यूज़िक सिस्टम पर एफएम सेट था. बाहर बारिश हो रही थी. रिमझिम रिमझिम. उसी से ताल मिलाती गूंज रही थी किशोर कुमार की आवाज़. 'रिमझिम गिरे सावन...'  
सुलगते मन ने अचानक सवाल दाग दिया, 'किशोर कुमार सावन में न पैदा हुए होते तो क्या उनकी आवाज़ में वो आग होती कि सुनने वाला सुलगने लगे?'

जवाब कौन देता? मन की बला से. मन कोई राहुल द्रविड़ थोड़े है कि क्रीज पर टिक गए तो फिर हटेंगे नहीं. बारिश होती रही. गाड़ी दौड़ती रही. आईटीओ, यमुना ब्रिज, अक्षरधाम... मन भी दौड़ता गया. कहिए बहता गया. सड़क पर बहते पानी की तरह. 

बरसात हो रही थी तो कहावत भी याद हो आई. 'बरसाती मेढ़क'. बरसात में तो मेढ़क भी निकल आता है. फिर हमारा- आपका 'राय' बनाने का अड्डा क्या मेढ़क से भी गया गुजरा है? 
मन ने कहा, 'शब्दों की नाव बनाओ. तैरा दो. हो सकता है रायशुमारी के थम से गए पानी में भी कोई हलचल हो जाए.' 
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बातें बहुत हैं. लेकिन, दिक्कत ये है कि बादल फट जाए तो पानी संभालना मुश्किल हो जाता है. सावन में तो रिमझिम रिमझिम गिरती बूंदे ही रास आती हैं. तो आज कुछ आंखों देखी बातें.
दिल्ली में रात के वक्त अगर आप आईटीओ से गुजरे हैं तो रेड लाइट पर ताली पीटकर कार की खिडकियां बजाने वाले दोस्तों से मुलाकात जरुर हुई होगी. जो भैये उन्हें इज्जत देना चाहते हैं वो उन्हें 'किन्नर' कहते हैं लेकिन उस जमात ने बार-बार कहा है कि उसे 'हिजड़ा' कहा जाए. हिजड़े मू़ड में हों तो आप लाख तुर्रम होते रहिए, जेब ढीली करके ही आगे बढ़ पाएंगे. 
लेकिन, उस दिन मैंने कमाल देखा. अपना ड्राइवर एक कहानी सुना रहा था. कहानी सुनने में अपनी दिलचस्पी उतनी नहीं थी, जितनी उसकी सुनाने में थी. चलती गाड़ी आईटीओ पर खड़ी हुई तो हिजड़े खिड़की पीटने लगे. 
'अरे सलमान खान... दे दे.' वो अंदाज ऐसा था कि खुद ही मुस्कुराहट आ गई. दिल दिल्लगी का हो गया. हाथ दाईं ओर उठा, ड्राइवर की ओर इशारा किया और कहा, 'शाहरुख से ले लो'. हिजड़ा टीम के तीन मेंबर ड्राइवर की तरफ पहुंच गए. ड्राइवर साहब की दिलचस्पी न उनमें थी और न उनकी डिमांड में. वो तो अपनी कहानी में कोई रुकावट नहीं चाहते थे. एक झटके में कहा, 'स्टॉफ.' इस शब्द का चमत्कार सरकारी बसों में कई बार देखा था लेकिन पता न था कि ये हिजड़ों के बीच भी धडल्ले चलता है. हलक से हाथ डालकर पैसे खींच लेने वाले हिजड़े चुपचाप आगे बढ़ लिए. उनकी कहानी याद नहीं लेकिन ये दलील शायद ही भुलाई जाए
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और चलते चलते किस्सा-ए-कलाम
सपने वो नहीं होते जो रात में सोते समय नींद में आते हैं. सपने वो होते हैं जो रातों में सोने नहीं देते. (मसलन, बारिश का सपना...ये कलाम साब ने नहीं कहा, भाई ने जोड़ दिया है)
कलाम साहब... सलाम... दशक दो दशक बाद होती है मुलाकात... वहीं सितारों के बीच... तब तक दुआ देते रहिएगा, हुजूर 

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

For Ladies Only

अविश्वसनीय लेकिन सच है!

बात हक की है. कम से कम महिलाएं 'यहां' अपना हक़ लेना जानती हैं. इससे बेशक दिल्ली की तस्वीर न बदलती हो. 16 दिसंबर 2012 को चेहरे पर लगा बदनुमा दाग न धुलता हो, लेकिन, एक स्टीकर पर लिखे 'तीन शब्दों' को दिल्ली जितनी इज्ज़त देती है, उसको सलाम तो बनता है.
दिल्ली मेट्रो में सफ़र करते 11 साल से ज्यादा वक्त हो गया. शुरुआत में सफ़र का मक़सद उत्सुकता थी. उस वक्त मेट्रो का इतना विस्तार भी नहीं था. दिल्ली में लाइन का जाल बिछा तो मेट्रो जरुरत बन गई. 'पीक आवर' में भीड़ में पिस जाने की घबराहट और टनल में अचानक मेट्रो के रुक जाने पर होने वाली बेचैनी के वक्त जाने कितनी बार मेट्रो में सवार न होने की कसम ली है. फिर भी कोई कशिश तो मेट्रो में है, जो खींच लेती है. हर दिन एक्सरसाइज़ न कर पाने की खीज मेट्रो की अंतहीन सीढ़ियां चढ़ने में गुम हो जाती है. सड़क पर सिग्नल दर सिग्नल रेंगते हुए चलने और ऑटोवालों से किराए को लेकर होने वाली किचकिच से मेट्रो मज़े में बचा लती है. ईमेल चेक करते, व्हॉटसएप पर आए मैसेज पढ़ते बीस से पच्चीस मिनट का सफ़र कैसे कट जाता है, पता नहीं चलता. 
अगर आप शुरुआती स्टेशन से मेट्रो में सवार नहीं होते तो सीट मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं होता. हर मुसाफिर ऐसे ही चमत्कार की आस लिए मेट्रो में दाखिल होता है. कनॉट प्लेस के स्टेशन (राजीव चौक) को छोड़ दें तो हर जगह सीट पाने को आपाधापी सी दिखती है. मेट्रो का दरवाजा खुलते ही प्लेटफॉर्म पर खड़े लोग ऐसे लपकते हैं, जैसे डर हो समुद्र मंथन से निकला अमृत पल भर की देर होने पर गुम हो जाएगा. अगर आप इत्मिनान के हामी हैं और 'सीट प्रेमी लपका ब्रिगेड' के एक्शन व्यवहार पर नज़र रखने का इरादा बनाकर मेट्रो में सवार होते हैं तो यकीन कीजिए आप हर दिन एक दिलचस्प कहानी लेकर उतरेंगे. 
मैं आज मेट्रो में लगे जिस स्टिकर की बात कर रहा हूं, आपको भी उसकी ताक़त का अंदाजा होगा. हरे रंग के इस स्टिकर ने दिल्ली को बेहद सभ्य, समझदार और उदार बना दिया है. महिलाएं इत्तेफ़ाक रखें या नहीं, इस स्टिकर ने उनकी 'शक्ति' में इज़ाफ़ा कर दिया है. इरादा परखने का हो तो यकीनन आजमा के देखिए. अगर किसी कोच में वो दो सीट खाली हैं, जिन के ऊपर 'For Ladies Only' यानी सिर्फ़ महिलाओं के लिए लिखा हो, तो 100 में से 60 फ़ीसदी उम्मीद है कि वो तब तक खाली ही रहेंगी, जब तक कि कोई महिला ही उसे आकर धन्य न कर दे. 


मैंने कल ही गौर किया. कॉलेज में पढ़ने वाले पांच लड़के आठ डिब्बे वाली मेट्रो के आखिरी कोच में सवार हुए. इत्तेफ़ाक से एक तरफ एक साथ पांच सीट खाली थीं, लेकिन उनके बीच एक अजीब होड़ शुरु हो गई. उनमें से कोई भी उन दो सीटों पर नहीं बैठना चाहता था, जिनके ऊपर महिलाओं के आरक्षित होने का स्टिकर लगा था. तीन 'अनारक्षित' सीटों पर बैठे लड़के कहते रहे, ' बैठ जाओ यार. कोई आए तो हट जाना ' लेकिन, बाकी बचे दो लड़कों को खड़ा रहना मंजूर था, महिलाओं के लिए आरक्षित पर बैठना नहीं. बाद में वो मेट्रो का नियम भंग करते हुुए फर्श पर बैठ गए, लेकिन, लेडीज़ सीट पर नहीं बैठे. ऐसा मैंने पहली बार नहीं देखा. महिला सीट पर बैठने की गुस्ताखी अपने से भी नहीं होती. अगर कोई पुरुष ऐसी सीट पर बैठ भी जाए तो महिला के आते ही ऐसे खड़ा हो जाता है, जैसे क्लास में प्रिंसिपल के आते ही सारे छात्र खड़े हो जाते हैं. अगर कोई न उठे तो शाम तक उनकी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है. जैसे कि 2014 में इन दो महाशयों की हुई थी. 


मेरे कहने का ये मक़सद कतई नहीं कि लेडीज सीट छोड़ने वाले सिर्फ डर की वजह से ऐसा करते हैं. ज्यादातर लोगों का फ़ैसला उनकी विनम्रता और अनुशासन से जुड़ा होता है. मैंने 'अनारक्षित' सीटों पर बैठे ऐसे लोगों को भी देखा है जो किसी महिला के आते ही अपनी जगह ऑफर कर देते हैं और खुद खड़े होकर सफ़र पूरा करते हैं. ये लोग भी उसी दिल्ली का हिस्सा हैं, जिसे मेट्रो का प्रबंधन करने वालों ने किसी वक्त महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रही माना था और एक कोच रिजर्व करने का फ़ैसला किया था. ये बात 2010 की है. 
उसके बाद दिल्ली की तस्वीर बहुत बदली. दिसंबर 2012 के 'निर्भया कांड' के बाद कई सवाल उठे और उन्हें उठाने वाली सिर्फ़ महिलाएं नहीं थीं. उनके हक़ की आवाज पुरुष साथियों ने भी बुलंद की. लेकिन, हक़ (सीट) के लिए महिलाओं का जितना आग्रह मेट्रो में दिखता है, उतना कहीं और नहीं.
 दिल्ली मेट्रो की वो तमाम खूबियां जिन पर कुर्बान होकर फिल्मवाले शूटिंग के लिए आते हैं, वो भविष्य में शायद इस पहलू पर भी गौर करना चाहेंगे. मैं तो खैर मेट्रो में सफ़र करने वाले उन तमाम देवताओं को प्रणाम कर ही रहा हूं. वो देवता क्यों हैं, अर्थ इस श्लोक में है 'यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता'  

रविवार, 26 अप्रैल 2015

... लगा, हममें से कोई नहीं बचेगा

किसी को छू के गुजरी, किसी को साथ ले गई मौत 

फ़ोन डरते हुए लगाया. नेटवर्क भी साथ नहीं दे रहा था. डर ये था कि पता नहीं दूसरी तरफ से क्या ख़बर मिलेगी? घंटी बजती गई. कोई जवाब नहीं मिला. मैंने रिडायल का बटन दबाया. इस बार दूसरी तरफ से कांपती सी आवाज आई.  हे...लो. ये नरेंद्र थे. मेरे एक साथी के परिचित. बिहार के रहने वाले हैं. अब काठमांडू में रहते हैं. मुझे, उनसे काठमांडू के हालात पता करने थे.  

नेपाल और उससे जुड़े भारतीय इलाके से लेकर दिल्ली तक की जड़ को हिलाने वाले भूकंप को गुजरे तीन घंटे का वक्त हो चुका था. नरेंद्र की सांसें जिस कदर उखड़ी हुई थीं, उससे साफ़ था कि काठमांडू में हालात बेहद खराब हैं. उस वक्त तक मरने वालों का आधिकारिक आंकड़ा सौ के करीब बताया जा रहा था. लेकिन, नरेंद्र से बात करते करते मैं समझ चुका था कि ये गिनती कहां तक पहुंचेगी, इसका दुनिया को अभी ठीक-ठीक अंदाजा ही नहीं. 
'जाने कितने लोग मलबे में फंसे हैं. कैसे उन्हें निकालें? अस्पताल में जितने घायल पहुंच रहे हैं, उतने बेड नहीं हैं. कितने घर गिर गए हैं. कई तो अब भी हवा में झूल रहे हैं. अब गिरे कि तब गिरे. मेरी गली में ही छह मकान लटके हुए हैं. बिजली नहीं है. टीवी बंद है. मोबाइल भी मुश्किल से लग रहा है. सब कुछ ढह गया है'

नरेंद्र अपनी याददाश्त पर ज़ोर डालते हुए ताज़ा हालात का हूबहू ब्योरा पेश करने लगे. जब भूकंप आया वो काठमांडू के मुख्य बाज़ार में थे. भावुक से हुए नरेंद्र ने कहा, 'उस पल लगा हममें से कोई नहीं बचेगा.' उफ! क्या खौफ़ रहा होगा. डगमगाते कदम. हिलती- डुलती ज़मीन. कांपता जिस्म. मौत के डर को महसूस कर सुन्न सा होता दिमाग. 
फ़ोन चालू ही था. नरेंद्र हालात बयान किए जा रहे थे. पल भर के लिए मेरे दिमाग ने मुझे उसी हालात के बीच लाके खड़ा कर दिया. सोचने लगा, अगर मैं वहां होता, तो क्या करता? जवाब भी खुद ही सामने आ गया. नेपाल से सैंकड़ो मील दूर मैं उस वक्त दिल्ली के धर्मशिला हॉस्पिटल के सामने था. मुझे, हॉस्पिटल के सामने के अपार्टमेंट में रहने वाले अपने करीबी मित्र अतीत जी के घर पहुंचने की जल्दी थी. तभी कदम डगमगाए. मुझे लगा, हाल में मुंह में डाली 'तुलसी' असर दिखा रही है. ये ख्याल हावी होता उसके पहले ही मैंने अपार्टमेंट की अलग-अलग बिल्डिंग में रहने वालों को बेतहाशा दौड़ते हुए ग्राउंड फ्लोर पर आते देखा. तब समझ आया ये तुलसी नहीं भगवान 'शेषनाग' का प्रभाव है. (बचपन में कहानी पढ़ी थी कि ये पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है. वो हिलते हैं तो भूकंप आता है. इस कथा का असल आशय क्या है, किसी दूसरे दिन चर्चा करेंगे )
 एक सवाल उस दिन भी दिमाग में आया था, जब किसान गजेंद्र सिंह जंतर-मंतर पर फंदा लगाकर झूल गए थे. मैं होता तो क्या करता? सच ये है कि मैं नहीं था, जो थे, या जो वहां ना होकर भी कुछ कर सकते थे, उन्होंने सिर्फ राजनीति की. भूकंप से हुई तबाही के बीच फिलहाल किसानों का दर्द पर्दे के पीछे चला गया है. 


अपने बिहार और यूपी में भी जान-माल का नुकसान हआ है, लेकिन, नेपाल तो तबाहो-बर्बाद हो गया है. भूकंप का डर लोगों के दिल में बैठ गया है. जिनके घर ढह गए या गिरने की हालत में पहुंच गए, उनकी बात अलग है. जिनके घर सलामत हैं वो भी रात के वक्त घरों में जाने को तैयार नहीं. ये डर जल्दी नहीं जाएगा. चुनौती प्रशासन के सामने भी कम नहीं. उसके सामने नेपाल को दोबारा खड़ा करने का इम्तिहान है. परीक्षा की इस घड़ी में भारत ने नेपाल की तरफ मजबूती से मदद का हाथ बढ़ाया है. 

कई दिनों से मुश्किलों में घिरी दिखने वाली मोदी सरकार भूकंप के वक्त मुस्तैदी दिखाने को लेकर तारीफ की हकदार है. हिंदुस्तान के प्रभावित राज्यों के साथ नेपाल को मदद भेजने में जो जज्बा, तत्परता और सूझबूझ दिखाई गई है, वो सलाम करने लायक है. 
और, आखिर में दो मिनट का मौन उनके लिए जो कुदरत के कोप के चलते बेवक्त ही महाकाल के गाल में चले गए. प्रार्थना, हर दूसरे साल हिमालय की गोद में क्रोध दिखाने वाले शिव से भी. हे, केदारनाथ... हे, पशुपतिनाथ... अब तांडव बंद कर दो. हर दिन मायूसी की बात करना अच्छा नहीं लगता... त्राहिमाम...त्राहिमाम 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2015

तुझमें रब दिखता है...

ये अक्खा इंडिया कहता है


कुछ ऐसा ही हुआ होगा. कृष्ण ने जब गोवर्धन उठाया होगा. अकेले. अपनी सबसे छोटी उंगली पर और जिसने वो दृश्य देखा होगा, वो उन्हें 'भगवान' ना कहता तो क्या कहता ? 


फिर, हमारा कुसूर क्या ? हम भी गवाह हैं, 22 अप्रैल 1998 की उस अद्भुत रात के, जब शारजाह क्रिकेट एसोसिएशन के उस स्टेडियम को रेतीला तूफान उड़ा लेने की ज़िद दिखा रहा था. रेत के अंधड़ के बीच हर कोई छुपने की जगह तलाश रहा था. क्रिकेट का रोमांच धूल भरी तूफ़ानी आंधी में कहां उड़ गया था, पता ही नहीं चला. छुपते, भागते और हांफते लोगों की जमात के बीच सिर्फ एक शख्स था, जो हाथ में बल्ला थामे ऐसे डटकर खड़ा था मानो उसी बल्ले के ज़ोर से तूफ़ान को शारजाह की बाउंड्री के बाहर खदेड़ देगा. ये हौसला 24 बरस की उसकी उम्र, 5 फुट 5 इंच के कद और औसत काठी के मुक़ाबले कहीं बड़ा था. उसका असल कद तो रेतीली हवा का गुबार थमने के बाद दिखा. ऑस्ट्रेलिया की महापराक्रमी टीम के खिलाफ़ उसने वैसे ही बल्ला चलाया, जैसे कृष्ण का सुदर्शन घूमता था. विरोधी गेंदबाज हांफने लगे और भारतीय समर्थक नाचने लगे.

कलियुग में क्रिकेट को धर्म मानने वाले भक्तों ने उसी रात सचिन तेंदुलकर नाम के उस शख्स को भगवान का दर्जा दे दिया. मैं भी ऐसे ही भक्तों में शामिल हूं. इस पोस्ट को पढ़ने वाले लोगों में से अगर कुछ ऐसे हैं, जिन्होंने उस मैच महान मैच को लाइव नहीं देखा, तो मैं बता देता हूं कि स्कोर बोर्ड आपको कभी उस रोमांच की जानकारी नहीं दे सकता जो हमने महसूस किया. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ वो मैच भारत के लिए सेमीफाइनल सरीखा था. जीत के लिए 285 और फ़ाइनल में पहुंचने के लिए 254 रन चाहिए थे. सौरव, मोंगिया, अजहर, जडेजा सारे बल्लेबाज नाकाम हो गए, लेकिन, अकेले सचिन ने ऑस्ट्रेलिया को घुटने पर ला दिया. अगर अंपायर ने गलत डिसीजन ना दिया होता तो सचिन ने मैच भी जीत लिया होता. 143 रन की पारी के साथ फ़ाइनल का टिकट तो वो न्यूज़ीलैंड से छीन ही लाए. दो दिन बाद अपने जन्मदिन के रोज़ सचिन ने एक और शतक जमाया और ऑस्ट्रेलिया का ट्रॉफी जीतने का ख्वाब तोड़ दिया.
इस मैच के करीब नौ साल पहले पाकिस्तान के पेशावर में भारत और पाकिस्तान के बीच बीस ओवरों का नुमाइशी मैच खेला जा रहा था. सचिन की उम्र तब 16 साल थी. वोे क्रीज पर आए तो भारत को पांच ओवर में सत्तर रन बनाने थे. सचिन ने मुश्ताक अहमद को निशाने पर लिया. ओवर खत्म हुआ तो महान लेग स्पिनर अब्दुल क़ादिर बच्चे से दिखते सचिन सामने खड़े थे. क़ादिर ने पूरे गुरुर में कहा,'बच्चे को क्यों मार रहे हो? हमें मार के दिखाओ?' कादिर को कतई पता नहीं था कि उन्होंने सांड़ को लाल कपड़ा दिखा दिया है. ओवर की पहली गेंद हवा में उड़ते हुए बांउड्री के बाहर. तीसरी गेंद पर चौका और आखिरी तीन गेंदों पर लगातार तीन छक्के. छह गेंदों में 28 रन देने वाले क़ादिर उस ओवर के बाद ऐसे गुम हुए कि फिर सचिन के सामने कभी नहीं दिखे. 



सचिन ने अपने बल्ले से क्रिकेट मैदान पर पराक्रम की जो कहानी लिखी, उसमें एक क़ादिर का ही गुमान नहीं उतरा, उन्हें गेंदबाजी करने वाला हर बॉलर सजदा करते हुए ही गया. सचिन ने इस करिश्मे की शुरुआत उस वक्त की जबकि ब्रायन लारा ने इंटरनेशनल क्रिकेट में एंट्री नहीं ली थी. वीरेंद्र सहवाग की उम्र 11 साल थी और वो बल्ला पकड़ना सीख रहे थे. विराट कोहली सिर्फ एक बरस के थे और घुटनों पर चल रहे थे.
सचिन ने हिंदुस्तान के लिए कितने मैच जीते, मैं इसकी गिनती भी बता सकता हूं, लेकिन वो आंकड़े सचिन के उस सम्मोहन की कहानी बयान नहीं कर सकते, जिसने हिंदुस्तान और पूरी दुनिया को चौबीस साल तक जकड़े रखा. इनमें से करीब डेढ़ दशक ऐसा था, जबकि सचिन की क्रीज पर मौजूदगी ही भारतीय टीम की जीत की गारंटी थी. सचिन खेलते तो स्टेडियम फुल हो जाते. सड़कें सूनी हो जातीं. वो शतक के करीब होते तो ट्रेन तक रुक जातीं. उनके आउट होते ही स्टेडियम खाली हो जाते. टीवी सेट बंद हो जाते. क्रिकेटर सचिन, हिंदुस्तानियों के लिए ऐसी उम्मीद थे, जो उन्हें जीतने का हौसला देती.

क्या आप 24 फरवरी 2010 का वो मैच भूल सकते हैं, जब ग्वालियर में सचिन वनडे क्रिकेट में दो सौ रन बनाने वाले पहले बल्लेबाज बने. उस दिन ममता बनर्जी ने रेल बजट पेश किया था. हर दिन ट्रेन में सफ़र करने वाले करोड़ों लोगों से जुड़ी ख़बर सचिन के दोहरे शतक के जश्न में ऐसे छुप गई, जैसे सूरज निकलने के बाद चांद छुप जाता है.
 हिंदुस्तान में सचिन नाम के जलवे का क्या असर है, सिर्फ महसूस किया जा सकता है. बयान नहीं. 40 साल की उम्र में भारत रत्न होना, इसी जलवे की निशानी है. सचिन आज बयालीस साल के हो गए हैं, लेकिन, ये सिर्फ वो उम्र है जो उनके जन्म से जोड़ी जाती है. उनका जलवा तो सदियों के पार निकल चुका है. कौन जाने इस दुनिया के भी पार...कृष्ण के गोलोक धाम तक.. या फिर विष्णु के क्षीर सागर तक... सुनते हैं, मोदी जी ने कैलाश का नया रास्ता खुलवा दिया है, वहां जाके तो परख हो ही सकती है. क्या पता महादेव के सिंहासन के नीचे कोई शोेएब अख्तर पर अपरकट जड़कर छक्का मारते सचिन का पोस्टर लगा आया हो. चलिए, देख के आएं?



गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

एक मौत, सौ तमाशे!

दिल्ली तेरी बेदिली पर नेता हंसें हम रोए...


ख़त तो आपने पढ़ लिया होगा. सात लाइन के इस ख़त में जो बात रुला देती है, वो है, 'मेरे तीन बच्चे हैं.' ख़ेत में बेशुमार मेहनत के बाद उगी फ़सल बर्बाद हो गई थी. अब उसे अपनी 'नस्ल' की चिंता थी. बड़ी उम्मीद के साथ 'दिलवालों' की दिल्ली आया था. उपाय पूछ रहा था. उसे घर जाना था, किसी दिलासे के साथ, लेकिन, दिल्ली ने तब तक उस पर ध्यान नहीं दिया, जब तक कि वो लटक नहीं गया. 
गजेंद्र सिंह घर लौटा, लेकिन सांसें दिल्ली में छोड़कर. और, दिल्ली के 'रहनुमाओं' को देखिए, वो भाषण देने का मोह तक नहीं छोड़ पाए. किसानों के दर्द की बात करके नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरने के लिए रैली बुलाने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को हमने आपने कई बार भावुक होते देखा है, लेकिन गजेंद्र के पेड़ पर झूल जाने के बाद भी ना उनकी आंखें नम हुईं और ना आवाज में दर्द में दिखा. रस्मी तौर पर दो मिनट का मौन रखने का चलन भी उन्हें याद नहीं आया. केजरीवाल साहब गजेंद्र की बेबसी भूलकर पुलिस को कोसने में जुट गए. 
उन्होंने कहा, 'ज्यादा ग्लानि इस बात की हो रही है कि हम लोगों की आंखों के सामने वो पेड़ पर चढ़े. हम बार-बार पुलिस से कहते रहे उसे बचा लीजिए. पुलिस हमारे कंट्रोल में नहीं है. किसी के सामने किसी की जान जा रही हो, वो ये कह के जान नहीं बचाएगा कि मैं उसके कंट्रोल में नहीं हूं.' अब समझिए केजरीवाल का शिकवा क्या है? क्या ऐसा नहीं लगता कि वो कहना चाह रहे हैं कि भाई, देखो अगर दिल्ली पुलिस हमारे अधीन होती तो क्या मजाल थी कि गजेंद्र पेड़ पर जान दे देता. अब कोई पूछे, केजरीवाल साहब, पूरी आम आदमी पार्टी बार-बार कहती है, आपकी अपील में बहुत दम है. आपने इस अपील को गजेंद्र को बचाने के लिए क्यों नहीं इस्तेमाल किया ? पुलिस निकम्मी ठहरी. आप ही कुछ कर लेते. 

किस्सा सिर्फ एक केजरीवाल का नहीं. उनकी पार्टी भर का नहीं. हमारे वोटों का हर सौदागर इस त्रासदी को सबक मानने के बजाए नौटंकी में जुटा दिखा. बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने केजरीवाल से गजेंद्र के पेड़ पर लटकने के बाद सत्तर मिनट चली रैली का हिसाब ऐसे मांगा, जैसे वो खुद को 'चक दे इंडिया' का शाहरुख समझ रहे हों और किसी हॉकी टीम से 70 मिनट के खेल का हिसाब मांग रहे हों. केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस और बीजेपी को कोसा तो पात्रा और बीजेपी के बाकी नेताओं ने आम आदमी पार्टी की 'संवेदनहीनता' पर ऐसे सवाल उठाए मानो कोई पुराना हिसाब चुकाने आए हों. पात्रा साहब, दिल्ली तो आपकी भी है. देश और किसानों के भाग्य को संवारने की जिम्मेदारी पांच साल के लिए आपको मिली है. सरकार बनने के शुरुआती दिनों में जब कामकाज पर सवाल पूछे गए तो प्रधानमंत्री जी ने कहा कि उन्हेें सौ दिन का 'हनीमून पीरियड' भी नहीं मिला. अब तो सरकार बने 11 महीने हो गए! ये ठीक है आप 11 महीने में देश का भाग्य नहीं बदल सकते, लेकिन, ऐसे हादसे के वक्त इतना तो कह सकते हैं, हां, 'हम भी गुनहगार हैं. हम अपने गिरेबां में भी झांकेंगे' लेकिन, नहीं, आप भी उसी जमात का हिस्सा हैं, जो सिर्फ क्रेडिट लेना जानती है. आप भी मानते हैं कि गुनाह की जिम्मेदारी दूसरों के मत्थे होनी चाहिए.
 
आप के इस प्रहसन का ही नतीजा है कि मेहनतकश और बुलंद हौसले वाले किसानों की हिम्मत जवाब देने लगी है. आंकड़े बताते हैं कि हर घंटे दो किसान जान दे रहे हैं, लेकिन, कौन पूछता है?. गजेंद्र ने भी दिल्ली के बजाए दौसा में जान दी होती तो उसे भी कौन पूछता ? गजेंद्र के बलिदान पर शुरु हुई राजनीति अभी थमती नहीं दिखती. तमाशा जारी रहेगा. मुझे उसमें दिलचस्पी नहीं. मेरा सवाल तो दिलवालों के शहर से है, दिल्ली, तुम तो ऐसी नहीं थी. तुम्हारी पहचान तो तुम्हारे दिलदार होने से है. कुछ तो ऐसा करो कि गजेंद्र को जिन तीन बच्चों की चिंता थी, उनकी किस्मत संवर जाए.