रविवार, 19 अप्रैल 2015

जब हल चलाता है राजा..

... तब आता है रामराज





मैंने कभी रामायण नहीं पढ़ी. रामकथा हज़ारों बार सुनी है.अखंड पाठ में रामचरित मानस के कुछ हिस्सों का पाठ किया है. रामनवमी को हर साल रामजन्म प्रसंग की चौपाईयां गाईं हैं.  रामायण सीरियल भी देखा है. पूरा. आज भी जब कभी मोरारी बापू मिल जाते हैं टीवी पर रामकथा कहते तो बैठ जाता हूं, सुनने. रामकथा के कई हिस्से हैं, जिनको लेकर कौतुहल होता है. बार-बार मन में प्रश्न आता है. ऐसा हुआ तो क्यों हुआ? कथा के इस प्रसंग में भला सीख क्या है?

साभार

ऐसा ही एक प्रसंग सीता जन्म का है. ये कौतुहल सीता जी के जन्म को लेकर नहीं बल्कि राजा जनक के हल चलाने को लेकर है. हिंदुस्तान आज़ाद होने के करीब तीन दशक बाद पैदा हुए मेरे जैसे लोगों को कभी राजशाही को देखने परखने का मौका नहीं मिला.लोकशाही देखी है. वोट दिया है. नेताओं के वादे सुने हैं. जनसेवक की तरह काम करने का भरोसा देने वाले नेताओं को जीतने के बाद सुल्तान की तरह बर्ताव करते देखा है. कई बार कोफ़्त भी हुई है. खासकर तब, जब वोट के लिए दरवाजे पर आकर पैर छूने वाला नेता जीतने के बाद उसी वोटर के लिए दरवाजा तक नहीं खोलता. ऐसे ही मौकों पर मन में सवाल उठता है कि जब पांच साल के लिए कुर्सी पर बैठने वाले 'सेवक' के अंदर इतना गुरुर आ सकता है तो राजा फ़िर राजा ही ठहरा. सर्वशक्तिमान. ना जनता ने उसे चुना है. ना उसे आगे जनता से वोट लेना है. फ़िर भला वो जनता की पुकार पर हल लेकर क्यों उतर आया?



अकाल से जनता मरती तो मरती रहती. राजा जनक राहत और मुआवजा बंटवा देते. ज्यादा होता तो अपने सैनिकों को किसानो की मदद के लिए लगा देते. उनके लिए कौन सा अनाज घट रहा था, जो हल लेकर खेत जोतने निकल पड़े. जनक कोई तीसरी और चौथी दुनिया में शुमार होने वाले गरीब देश के राजा भी नहीं थे. मिथला की संपन्नता की कहानियां तो चारों ओर फैली थी. ऐसे ही सवालों के बीच एक ज्ञानी मित्र ने चाणक्य नीति बताई.


प्रजासुखे सुखं राज्ञ: प्रजानां तु हिते हितम् 
नात्मप्रियं हितं राज्ञ: प्रजानां तु हिते हितम् 




मतलब ये कि प्रजा के सुख में राजा का सुख है. उसे प्रजा के हित में ही अपना हित दिखना चाहिए. जो खुद को अच्छा लगे उसमें राजा का हित नहीं, उसका हित तो प्रजा को जो प्रिय लगे उसमें हैं.ये नीति आज के शासकों को भी पता होगी. जब मेरे जैसे अदना शख्स को ज्ञानियों की संगत मिल जाती है तो राज चलाने वालों के पास क्या कमी होगी. फिर उन्हें किसानों का दर्द क्यों नहीं दिखता ?



बेमौसम बरसात ने देश के तेरह राज्यों में लाखों किसानों को तबाह कर दिया है. प्रधानमंत्री जी दावा करते हैं कि वो किसानों के मन की बात जानते हैं. उन्होंने मुआवजे की रकम बढ़ाकर डेढ़ गुना कर दी. फ़सल बर्बादी पर मिलने वाले मुआवजे में भी राहत का एलान किया है. अब 33 फ़ीसदी फ़सल का नुकसान होने पर भी मुआवजा मिलेगा. लेकिन किसान खुश क्यों नही हैं ?



हिंदुस्तान की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी किसानों का हितैषी होने का भरम रखती है. उसके उपाध्यक्ष राहुल गांधी दो महीने की छुट्टी से लौटे तो सबसे पहले किसानों से मिले. उनकी पार्टी किसानों की समस्याओँ के जरिए संसद के बजट सत्र के दूसरे हिस्से में सरकार को घेरना चाहती है. लेकिन सवाल ये है कि क्या किसानों का दर्द उनके लिए सरकार को बैकफुट पर लाने का हथियार भर है ?

प्रधानमंत्री ने दावा किया था कि किसानों की मदद के लिए राज्य और केंद्र मिलकर काम करेंगे, लेकिन असल स्थिति क्या है? यूपी में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि केंद्र ने किसानों के लिए पांच सौ करोड़ से ज्यादा रकम दी है. वहीं यूपी सरकार का दावा है कि उसे अब तक कोई मदद नहीं मिली.



मुआवजा बांटे जाने की कहानी किसी से छुपी नहीं है. आला अधिकारी से लेकर पटवारी तक सरकारी तंत्र के सब कारिंदे बेहाल किसान से चक्कर लगवा रहे हैं और सारी सरकारें किसानों की मदद के नाम पर अपनी पीठ ठोक रही हैं. बेचारगी की इस चक्की में पिसता किसान हर दिन जान दे रहा है. मुझे अच्छा लगा जब प्रधानमंत्री ने फ्रांस में कहा कि अब हिंदुस्तान की पहचान 'स्कैम इंडिया' की नहीं 'स्किल इंडिया' की होगी. ज्यादा अच्छा लगता अगर वो कुदरत की तबाही में बर्बाद हुए किसानों की मौत पर सॉरी कहते. वो कहते, हिंदुस्तान के लिए अच्छे दिन आ गए हैं, लेकिन किसानों का ख्याल रखने में कमी बाकी है. आखिर वो 'मर जवान, मर किसान' का नारा बदलने आए हैं. फिर हिंदुस्तान की असल स्किल तो खेती ही है. ताजा विपदा में बर्बाद होकर कितने किसान मरे हैं, इस आंकड़े की बात कर मैं दर्द बढ़ाना नहीं चाहता. हालांकि, ये कहना जरुरी है कि जब किसान उगाता है, तभी हिंदुस्तान खाता है. ये सच ही मुझे बताता है कि हमारे पुरखों ने हल थामने वाले कृष्ण के बड़े भाई को भगवान बलराम क्यों कहा. इसी सच को स्थापित करने के लिए सर्वशक्तिमान राजा जनक हल लेकर खेत में उतर आए. आज आपके सामने जब थाली सजे तो आप भी अपने मन की कसौटी पर इस सच को तोलिए. खुद से पूछ कर देखिए, क्या ये सच नहीं कि जब राजा हल चलाता है तभी रामराज आता है?


शनिवार, 18 अप्रैल 2015

एक 'नशा' हैं अमिताभ

...जो 42 साल से उतरता ही नहीं!


'जो 25 बरस में नहीं हुआ वो अब होगा'

यश चोपड़ा की 'दीवार' में जब अमिताभ बच्चन ने ये डॉयलॉग बोला तो किसे अंदाज़ा रहा होगा, वो भविष्य बता रहे हैं. आज करोड़ों लोग कोर्ट में खड़े होकर 'गीता' की शपथ लेकर कह सकते हैं, 'अदाकारी में अमिताभ जैसा करिश्मा ना हुआ था, ना हुआ है.'



ये जादुई आवाज़ का असर है, आर पार उतर जाने वाली आंखें का जलवा है, आसमान छूते कद का प्रताप है, भगवान दादा स्टाइल डांस स्टेप्स हैं, ठसक में कमर पर हाथ रख खड़े होने की अदा है या फिर 'हांय' बोलने का बेमिसाल अंदाज है, वो क्या है जो हिंदुस्तान को उनके सम्मोहन से बाहर आने ही नहीं देता? इस सवाल का जवाब पाने के लिए एक डीटेल्ड रिचर्स जरुरी है. 1975 में रिलीज़ हुई 'दीवार' के पच्चीस साल पहले और चालीस साल बाद यानी अब तक अमिताभ के औरे के आसपास भी कोई नहीं दिखता. 



सचिन तेंदुलकर के 'वनमैन आर्मी' बनने के दो दशक पहले अमिताभ 'वनमैन इंडस्ट्री' का रुतबा पा चुके थे. सचिन बल्ला टांगकर रिटायर हो चुके हैं, लेकिन, अमिताभ अब भी जमे हुए हैं. 72 की उम्र में पॉट पर बैठ कर जब वो 'पिडली सी बातें' गातें हैं तो कोई नाक-भौं नहीं सिकोड़ता बल्कि गाने के सुर ही पकड़ता रह जाता है.ऐसे ही किसी पल में अमिताभ एक्टिंग के खांचे से निकलकर ऐसी 'स्क़ॉच' बन जाते हैं जिसका नशा कभी उतरता नहीं. (शमिताभ में आदरणीय बच्चन जी ने खुद का परिचय दिया है, 'स्क़़ॉच मैं') 




नरेंद्र मोदी जब गुमान में कहते हैं, 'हम सबसे युवा देश हैं. हमारी आधी से ज्यादा आबादी पैंतीस साल से कम लोगों की है' तो ऐसे तमाम लोग मुस्कुरा के रह जाते हैं, जो उम्र के साठ और सत्तर दशक देख चुके हैं. वजह ये है कि अमिताभ इस पीढ़ी को 'बूढ़ा' होने ही नहीं देते. इस उम्र के तमाम लोग अमिताभ को देख-देखकर जवान हुए जाते हैं. उम्रदराज़ों ने तो जुमला ही बना लिया है, 'बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप'



खूबी ये भी है कि अमिताभ नाम का करिश्मा किसी खास उम्र तक सीमित नहीं. चालीस साल पहले हिंदुस्तान  का हर शख्स नाम पूछे बिना ही बता देता था, 'माई नेम इज़ एंथनी गोंजालविस' तो आज सेलिब्रेट करने का कोई मौका सामने आने पर हर कोई यही कहता है,'पार्टी तो बनती है.'



अमिताभ का असर पॉलटिकल पार्टियों पर भी एक सा है. राजीव गांधी और बाल ठाकरे उनके दोस्त रहे हैं. नरेंद्र मोदी और मुलायम सिंह ने उन्हें ब्रॉन्ड एंबेसडर बनाया है. हिंदुस्तान पर बरसों राज करने वाले अंग्रेज भी उनके दीवाने हैं. लंदन में महात्मा गांधी की मूर्ति के अनावरण पर उन्हें बुलाया जाता है. इंग्लैंड के प्रधानमंत्री किसी आम फैन की तरह बड़े फ़ख्र से उनके साथ खड़े होकर फोटो खिंचाते हैं. 



ओलंपिक एसोसिएशन अमिताभ को मशाल थमाती है. उन्हें ब्रॉन्ड एंबेसडर बनाने के लिए कंपनियां लाइन लगाए रहती हैं. उन्हें हिंदुस्तान का सबसे उम्दा गेम शो होस्ट माना जाता है. स्क्रिप्ट राइटर आज भी खास उनके लिए कहानी लिखते हैं. जिस उम्र में उनके हम उम्र सीधे खड़े नहीं हो पाते अमिताभ गुंडों की फौज़ को मारते हुए भी अविश्वसनीय नहीं लगते. 



वो ना झुकते हैं और ना ही रुकते हैं. थकना तो शायद उन्होंने सीखा ही नहीं. अमिताभ फिल्म के पर्दे पर ना दिखें तो टीवी पर नज़र आ सकते हैं. वो ट्विटर और फ़ेसबुक पर भी मौजूद रहते हैं... इतने सबके बाद भी वो ब्लॉग लिखने का वक्त निकाल लेते हैं. इस ब्लॉग ने आज सात साल पूरे कर लिए हैं. अमिताभ नाम के 'नशे' में डूबे हर ब्लॉगर के लिए पार्टी तो बनती है!

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

ब्रेक तो बनता है बॉस!

... ताकि ज़िंदगी चलती रहे


गाड़ी हो या 24 घंटे चलने वाले चैनल. आईपीएल का मैच हो या नौकरी. ब्रेक तो सबको चाहिए. ज़रा कल्पना कीजिए आप किसी गाड़ी में बैठे हों और ब्रेक ना लगे तो क्या हो ? ज़िदगी भी एक ऐसी ही गाड़ी है, जो रास्ते से भटकने लगे तो ब्रेक लगाना पड़ता है.



ये बात दीगर है कि कई बार ब्रेक बहुत अखरते हैं. टीवी पर किसी दिलचस्प सीरियल को देखते वक्त मैंने ब्रेक को लेकर बहुत सी शिकायतें सुनी हैं. मसलन, ' ये टीवी वाले बड़े चालू हैं. जबरदस्ती कहानी खींचते हैं. जब कुछ इंट्रेस्टिंग आने वाला होता है, ब्रेक ले लेते हैं. '

जब से टीवी और रिमोट ने जिंदगी का कंट्रोल संभाला है ब्रेक की अहमियत और भी बढ़ गई है. देखने वालों को ब्रेक टाइम भले ही कितना भी अखरता हो, एंकर्स की अदा को निखार देता है. इन एंकर्स की ही बलिहारी है कि बच्चे- बच्चे की ज़ुबान पर चढ़ गया है, 'बस एक छोटा सा ब्रेक'. पढ़ने का मन ना हो तो ये छोटा ब्रेक कितना बड़ा हो सकता है सब जानते हैं. बच्चों की बातों को ज़रा ध्यान से सुनिए कहीं जाते वक्त कहेंगे 'मिलते हैं ब्रेक के बाद'. कुछ पूछो तो कहेंगे 'बताएंगे ब्रेक के बाद' या 'दिखाएंगे ब्रेक के बाद'



टीवी के लिए तो ब्रेक ही वो इंजन है, जो मुनाफे की गाड़ी को खींचता है और चैनलों का बाकी कंटेंट उसी पर सवार होकर आगे बढ़ता है. क्रिकेट में कमाई की लीग के ब्रॉडकास्टर्स को जब उम्मीद के मुताबिक मुनाफ़ा होता ना दिखा तो आईपीएल में भी 'ब्रेक' आ गया.स्ट्रेटजिक ब्रेक. यूं तो क्रिकेट मैचों में ब्रेक पहले भी होते थे. दो पारियों के बीच इनिंग्स ब्रेक, लेकिन, स्ट्रेटजिक ब्रेक का मकसद ही ब्रॉडकॉस्टर को वो खिड़की मुहैया करना था, जिसके जरिए वो दर्शकों को विज्ञापनों का दीदार कराके ख़ुद मुनाफ़े की गारंटी कर सकें.


वैसे, कई बार उन लोगों के लिए ब्रेक बड़े काम का होता है जो कुदरत के दबाव के ख़िलाफ़ जंग लड़ रहे होते हैं. वो किसी दिलचस्प सीरियल या फ़िर मैच के बीच 'कुदरत की पुकार ' (नेचर्स कॉल दोस्तों) को अनसुना करते हुए कुर्सी पर जमे रहते हैं. ऐसे में ब्रेक कितनी बड़ी राहत लाता है, बस वो ही बता सकता है, जो इस हालात से गुज़रा हो. हालांकि, ज़्यादतर लोगों को 'छोटे' बताए जाने वाले ब्रेक बड़ा अखरते हैं. उनकी शिकायत होती है, 'प्रोग्राम बताते आधे घंटे का हैं, लेकिन, 20 मिनट से ज्यादा कभी नहीं दिखाते. पता ही नहीं चलता, प्रोग्राम के बीच ब्रेक दिखाते हैं या ब्रेक के बीच प्रोग्राम'

ये शिकवा सिर्फ टीवी चैनलों से नहीं. सरकारी बाबुओं से भी लोगों को यही शिकायत होती है. 'इनके तो ब्रेक ही खत्म नहीं होते. कभी लंच ब्रेक तो कभी टी ब्रेक.' लेकिन आप लाख शिकवे करते रहिए, उनकी सेहत पर फर्क नहीं पड़ता.




फिलहाल सरकार की गाड़ी के ड्राइवर यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जवाहर लाल नेहरु की ही तरह 'आराम हराम है' का नारा बुलंद करते हैं. वो कई बार कह चुके हैं कि उन्होंने अपने काम से 15 मिनट की भी छुट्टी यानी ब्रेक नहीं लिया, लेकिन इन बाबुओं की बला से. वो तो ये ही मानते हैं कि ज़िदगी की गाड़ी को सही तरीके से चलाने के लिए ब्रेक बहुत जरुरी है. वो आप से भी कहेंगे कि कभी काम का तनाव हावी हो जाए और आप किसी समझदार शख्स से समाधान पूछें तो वो यही कहेगा, 'टेक ए ब्रेक'. ऐसे ही समझदार लोगों ने जुमला बनाया है, 'ब्रेक तो बनता है'



मुझे नहीं पता, नेहरु के परनाती राहुल गांधी ने किस से सलाह ली. लेकिन उन्होंने घोषित तौर पर ब्रेक लिया. (अघोषित तौर पर तो वो अक्सर ही ब्रेक पर रहते हैं). वो भारतीय राजनीतिक इतिहास के पहले ऐसे सक्रिय नेता बन गए जो लगातार 8 हफ्ते तक ब्रेक पर रहे. अब क्या कहें एक रिवाज सा हो गया है कि तमाम लोगों को ख़ुद तो ब्रेक लेना पसंद है, लेकिन, दूसरों का ब्रेक अखरता है. राहुल का ब्रेक पर जाना भी अखरा. अब राहुल वापस आ गए हैं. तो इंतज़ार इस बात का है कि ब्रेक के बाद वो क्या दिखाते हैं ? उनकी राजनीति की कहानी में कोई ट्विस्ट आता है या नहीं.... ये भी जानेंगे, लेकिन, एक छोटे से...


गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेट, एंटरटेनमेंट

'बिहार' जहां राजनीति है 'एंटरटेनमेंट'!



                                    'क्यों जी, चूहा मार कर खाना कोई खराब बात है क्या ?' 
पत्रकार मुख्यमंत्री को घेरने आए थे. सवाल पूछा. जवाब में सीएम ने भी सवाल दाग दिया. वो इतने पर ही नहीं रुके. कहानी को आगे बढ़ाया.'बहुत लोग चूहा खाते हैं. हम भी चूहा खाते थे. आज भी खाते हैं.'



देखने वाले सन्न. सुनने वाले सुन्न, लेकिन सुनाने वाले के चेहरे पर क्लोजअप मार्का चौड़ी मुस्कान. बताने की जरुरत नहीं. सब जानते हैं. ये बयान जीतनराम मांझी का है, जो उन्होंने मुख्यमंत्री रहते दिया. ऐसा अंदाज़, ऐसी साफ़गोई राजनीति में कहां दिख सकती है? आप नहीं जानते तो जान लीजिए, वो सिर्फ और सिर्फ एक ही जगह है, बिहार. 



बुद्ध की भूमि. बुद्धिकौशल में सबसे आगे. चाणक्य की जिस नीति पर पूरी दुनिया कुर्बान है, बिहार की मिट्टी के कण-कण में वो दर्शन बसा है. बात दुनिया की हो, या फिर हिंदुस्तान के दूसरे हिस्सों की, नेताओं को राजनीति के दांव- पेंच सीखने में उम्र खपानी पड़ती है, लेकिन, यहां, बिहार में बच्चा ज़मीन पर कदम बाद में रखता है, राजनीति में पारंगत पहले हो जाता है.   

और, अगर आप ये माने बैठे हैं कि जीतनराम मांझी ने ये बयान नासमझी में दिया, तो आप बड़ी भूल कर रहे हैं. मांझी खूब जानते थे कि वो क्या कह रहे हैं. वो ये भी जानते थे कि उनकी कही बात दूर तलक पहुंचेगी. वो ये ही तो चाहते थे. किसी को हंसाने और किसी को उबकाई लाने वाले एक बयान भर से मांझी बिहार में कथित तौर पर महादलितों के सबसे बड़े नेता हो गए. 



अगर आप राजनीति को एक सीरियस बिज़नेस समझते हैं, तो मान लीजिए कि आपके फ़ेल होने के चांस बढ़ रहे हैं. 20 वीं सदी के अंतिम और 21 वीं सदी के अब तक के डेढ़ दशकों में बिहार के नेताओं ने बार-बार बताया है कि वोटरों को एंटरटेन करना राजनीति में कद बढ़ाने और कुर्सी पर बने रहने की गारंटी देता है. ऐसा ना होता तो मांझी को कुर्सी से हटाने में बिहार के आधुनिक मसीहा नीतीश कुमार के पसीने ना छूट गए होते और जब-जब नीतीश पसीना पोंछते मांझी उन्हें हंसी-हंसी में एक और चोट दे देते. 

मसलन जब नीतीश गुट की ओर से मांझी पर इस्तीफे का दबाव पड़ा तो उन्होंने कहा, ''नीतीश कुमार ने ग़लती नहीं की. महाग़लती की. उन्होंने ये समझने में गलती कि हमारे हाथ का कठपुतला बनेगा.'' 

दिलचस्प अंदाज में एंटरटेनमेंट करते हुए अगर मांझी ने अपना राजनीतिक कद इतना बढ़ाया ना होता तो क्या बीजेपी और नरेंद्र मोदी उन पर लट्टू दिखते?


हंसी को हथियार बनाकर बिहार की सियासत में झंडे लहराने का कमाल करने वाले मांझी इकलौते नेता नहीं. लालू प्रसाद यादव ने तो महज एंटरटेनमेंट के जरिए ही बिहार पर 15 साल राज किया. बिहार की ज़मीन को कर्मभूमि बनाने के बाद शरद यादव भी शायद यही मानने लगे कि वोट तो तभी मिलेगा, जबकि वोटर हंसेगा. नतीजा ये है कि शरद सीरियस मामलों को भी एंटरटेनिंग बनाने की कोशिश में आए दिन विवाद खड़ा कर देते हैं. कभी वो महिला संगठनों के निशाने पर होते हैं तो कभी सामाजिक संगठनों के, लेकिन, इससे उनके राजनीतिक कद पर असर नही होता.  


अगर आप नीतीश कुमार को 'गंभीर' छवि में कैद देखते हैं तो ये आप का भरम भर है. वो देवेन वर्मा की तरह सीरियस दिखते हुए ही कॉमेडी कर जाते है़. अब बताइये, लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल को जंगल राज बताकर बिहार में कामयाबी के झंडे लहराने वाले नीतीश आज उनके हाथ में हाथ डाले दिख रहे हैं तो क्या ये मजाक नहीं? 

             


लेकिन, फिक्र क्या ? बिहार के मेधा महारथी तो राजनीति के 'मसखरेपन' पर ही फिदा हैं. उनके लिए तो शायद राजनीति का मतलब ही एंटरटेनमेंट हो चुका है. लोकसभा चुनाव में घोटालों की एबीसीडी पढ़ाते हुए नरेंद्र मोदी ने सबसे ज्यादा एंटरटेन किया तो बिहार की ज़मीन पर कमल खिल गया. अब इंतज़ार विधानसभा चुनाव का है. वहां जो जितना ज्यादा एंटरटेन करेगा, वो उतनी ही ज्यादा सीट पाएगा. 


बुधवार, 15 अप्रैल 2015

लापता, गुमशुदा, Missing!

जनाब, किसे खोज रहे हैं आप?



ग़ाजियाबाद जाइये या फिर गांधीनगर. कानपुर या फिर पटना. मन हो तो बुंदेलखंड का चक्कर भी लगा लीजिए. दीवारें पटी हुई हैं. जगह-जगह पोस्टर लग गए हैं. जिनका सबको पता है, वो 'लापता' बताए जा रहे हैं. 
भला कौन मानेगा कि जनरल (रिटा.) वीके सिंह गुम हो गए हैं. ट्विटर ट्रेंड से लेकर प्राइम टाइम की बहस तक वो हर जगह छाए हुए हैं. 



लेकिन,ग़ाजियाबाद में दाखिल होते ही आपका भरम टूट सकता है. यहां बाकायदा पोस्टर लगाकर सिंह साहब की तलाश की जा रही है. 'भारतीय कौटिल्य सेना' नाम के संगठन ने उनकी तलाश पर पांच सौ रुपये के इनाम का भी एलान किया है. 



किस्सा सिर्फ़ यूपी के जिला ग़ाजियाबाद  का नहीं. गुजरात के गांधीनगर में भी पोस्टर लगाकर तलाश की जा रही है. यहां बीजेपी के सीनियर नेता लालकृष्ण आडवाणी को 'गुमशुदा' बताया गया है. अब आप कहेंगे, भला आडवाणी जी कैसे लापता हो सकते हैं. उनकी तो 'चुप्पी' भी हाल-हाल तक ख़बर रही है. 

                                   

आडवाणी की ही तरह बीजेपी के 'मार्गदर्शक' मुरली मनोहर जोशी भी 'लापता' हो गए हैं. उनकी तलाश में कानपुर में पोस्टर लगे हैं. 



पटना में लगे एक पोस्टर में बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा को 'गुमशुदा बताया गया है'. दूसरों को 'खामोश' कर देने वाले शॉटगन की 'चुप्पी' पर सवाल उठाया गया है. पोस्टर में पुरस्कार देने की बात भी कही गई है, लेकिन, कौन किसे देगा, ये साफ़ नहीं है. 



पोस्टर लगाकर तलाश राहुल गांधी की भी हो रही है. हालांकि, अब बताया जा रहा है कि वो दिल्ली आ गए हैं या बस आने ही वाले हैं. वैसे, कांग्रेस कई बार साफ़ कर चुकी है कि राहुल गांधी 'गायब' नहीं बल्कि 'छुट्टी' पर हैं, लेकिन, विरोधियों की नज़र में वो 'गुमशुदा' ही हैं 



दिलचस्प ये है कि बुंदेलखंड क्षेत्र में राहुल गांधी के साथ बीजेपी नेता उमा भारती की भी तलाश हो रही है. वो भी पोस्टर चिपका के. एक तरफ़ उमा दीदी. दूसरी तरफ़ राहुल भैया. 

कुछ महीने पहले ऐसा ही 'तलाश' अभियान नई दिल्ली क्षेत्र में भी चला था. पोस्टर छपे थे. दीवार पर लगे थे. यहां अरविंद केजरीवाल को गुमशुदा बताया गया था. दिल्ली चुनाव ने केजरीवाल को तलाश कर नई दिल्ली पहुंचा दिया और लोगों ने इनाम भी दिया, लेकिन, किसे ? जाहिर है, केजरीवाल को. 

                                   

तो बलिहारी है, ऐसे तलाशी अभियान की. जिनका पता है आप उन्हें ही लापता बताकर तलाश रहे हो और जब वो आपकी परिभाषा के मुताबिक मिल जाते हैं तो उन्हें ही इनाम थमा देते हो. ये ऐसा मज़ाक है, जिस पर अब हंसी भी नहीं आती. सब जानते हैं कि ऐसे पोस्टर छपवाने वाले पब्लिसिटी के लिए चर्चित चेहरों को खोज रहे हैं. कई बार शिकायतें जायज भी होती हैं. चुनावी मौसम में वादों के बीज बोने वालों से फ़सल का हिसाब मांगना वोटर अपना हक़ मानते हैं और जब ये हक़ हाथ से जाता दिखता है तो वो पोस्टर चिपकाने के सिवा कर भी क्या सकते हैं ? शायद इसीलिए 'राइट टू रिकॉल' की मांग उठी थी. लेकिन, पोेस्टरों के जरिए तलाशी अभियान चलाने वाले सीरियस कभी नहीं दिखते. अगर होते तो कथित 'गुमशदा' खुद प्रकट होने के लिए मजबूर हो जाएं. 


सच कहा जाए तो सीरियस होकर खोज़ने की जरुरत इन बड़े नाम वाले लापता लोगों को नहीं. इससे किसी का भला होता हो, ये लगता नहीं. तलाशी अभियान की जरुरत उन लापता बच्चों को है, जो वक्त के किस अंधेरे में गुम हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता. इन बच्चों का पता ना उनके घरवाले लगा पाते हैं और ना ही शुभचिंतक. पुलिस तो खैर सीरियस होती ही नहीं. नेशनल क्राइम ब्यूरो का आंकड़ा मुझे बताया गया है, जिसके मुताबिक हर आठ मिनट में एक मासूम 'गायब' हो जाता है. यानी हर घंटे करीब आठ बच्चे लापता हो जाते हैं. इनमें लड़कियों की तादात आधे से ज्यादा होती है. गुमशुदा बच्चों में से चालीस फ़ीसदी कभी लौट कर घर नहीं आते. पिछले साल अकेले दिल्ली में 7 हज़ार से ज्यादा बच्चे गायब हुए थे. मासूम बच्चों के इस तरह गुम होने पर सुप्रीम कोर्ट तक चिंता जाहिर कर चुका है.
तो पोस्टर छाप कर बड़े- बड़े लोगों को तलाशने वाले भाइयो (अगर बहनें भी इस अभियान में शामिल हैं तो मेरा संबोधन उन्हें भी है) कृपया अपना धन और समय इन स्वनामधन्य लोगों पर व्यर्थ ना करें. ये वक्त पड़ने पर खुद प्रकट हो जाएंगे. इन्हें जो 'इनाम' देना है, सामने आने पर दें. पोस्टर छापें, चिपकाएं और तलाशी अभियान चलाएं तो किसी ऐसे मासूम के लिए जिसके लौटने पर एक परिवार की खुशियां लौटेंगी. आपको दुआएं और ताउम्र के लिए सुकून मिलेगा. आइये मिलकर खोजते हैं उन मासूमों को जो ना जाने किन अंधेरों में गुम हो जाते हैं. 

सोमवार, 13 अप्रैल 2015

100 साल बाद महात्मा गांधी की तलाश

मथुरा की सड़कों पर बापू के पद​चिन्ह तलाशते 'युगांधर'

ट्रेन वक्त से कुछ पहले पहुंच गई. मैं मथुरा जंक्शन के प्लेटफॉर्म नम्बर दो पर खड़ा था. अपने स्टेशन पर असमंजस ज्यादा होता है. सारे रास्ते पहचाने से होते हैं. तय करना मुश्किल होता है कि दाएं से जाएं या बाएं से. अब मथुरा में दो फुटओवर ब्रिज हैं. मैने नए पुल पर चढने का फैसला किया.

प्लेटफॉर्म नम्बर एक पर उतरकर कुछ कदम ही बढ़ा था कि बैनर नजर आया, '100 साल बाद महात्मा गांधी की तलाश में युगांधर'. बैनर के साथ बीस एक लोग थे, साथ में महात्मा गांधी की तस्वीर भी थी, लोगों से कुछ पूछताछ करते चल रहे थे


उत्सुकता बढ़ी तो मैं रुका. सामने पुराने मित्र राकेश शर्मा दिखे. किसी वक्त वो एक बड़े नाम वाली पार्टी के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं. तब से अपने साथियों के बीच वो 'विधायक जी' के नाम से मशहूर हैं. बैनर पर 'युगांधर' नाम के जिस संगठन का जिक्र था, विधायक जी उसके अध्यक्ष हैं
मेरी उत्सुकता शांत करने के लिए विधायक जी ने बताया, 'आज से ठीक सौ साल पहले महात्मा गांधी मथुरा आए थे. 14 अप्रैल को उन्होंने मथुरा जंक्शन से मद्रास जाने के लिए ट्रेन पकडी थी. मद्रास जनता एक्सप्रेस'


विधायकजी और उनकी टीम इ​तिहास के झरोखे में झांककर मथुरा की गलियों में बापू के कदमों के निशान तलाशने निकली थी. जाहिर है, उस दौर का कोई शख्स महात्मा गांधी के दौरे की गवाही देने के लिए मौजूद नहीं है.


उम्मीद थी कि रेलवे को इस बारे में कोई जानकारी होगी. वजह ये है कि 1915 में द​क्षिण अ्फ्रीका से महात्मा गांधी की वापसी को केंद्र सरकार ने प्रवासी दिवस के मौके पर जोरशोर से याद किया. मथुरा जंक्शन पर
इन दिनों रेल सप्ताह भी मनाया जा रहा है. स्टेशन पर प्रदर्शनी लगाई गई है. उसमें रेलवे के लिए अहम तारीखों का जिक्र करते हुए एक बैनर लगा हुआ है. इस बैनर में भी बापू के मथुरा आने की कोई जानकारी नहीं है.






स्टेशन प्रबंधक केएल मीणा भी बापू के मथुरा आने और मथुरा जंक्शन से ट्रेन पकड़ने को लेकर अनिभिज्ञ थे. 
युगांधर कार्यकर्ताओं ने जब जानकारी दी तो उन्होंने बापू को नमन करने की रस्म जरूर अदा की.




मुझे युगांधर के महासचिव पुण्डरीक रत्न ने बताया कि मथुरा के विधायक प्रदीप माथुर, जो कांग्रेस पार्टी के प्रबुद्ध नेता हैं, को भी बापू के मथुरा आने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. बापू के पदचिन्ह तलाशते कार्यकर्ताओं ने जब माथुर से इस बारे में पूछा तो उन्होंने चौंककर कहा, 'अरे ऐसा है क्या?'

                        

ऐसे में मैने युगांधर के अध्यक्ष से पूछा कि आखिर उन्होंने इतिहास की इस अहम तारीख को कैसे याद रखा.
अध्यक्ष राकेश शर्मा ने कहा, 'हमारे यानी युगांधर परिवार के वैचारिक गुरु मधुकर उपाध्याय जी ने यह अहम जानकारी हमें दी. श्री उपाध्याय वरिष्ठ प़त्रकार और प्रखर गांधी वादी चिंतक है. महात्मा गांधी की वापसी पर उनकी 100 एपीसोड की सीरीज, खामोशी की दास्तां आकाशवाणी पर प्रसारित हो रही है.'
राकेश शर्मा उर्फ विधायकजी ने कहा कि जिस दिन सर ने हमें ये अहम जानकारी दी उसी दिन हमने तय किया कि मथुरा की ग​लियों मे घूमकर पड़ताल करेंगे और पता करेंगे कि क्या किसी को याद हैं कि महात्मा गांधी कभी मथुरा भी आए थे.


महात्मा गांधी की याद को तलाशने निकली विधायक जी के युगांधरों की टीम एक गाड़ी पर बैनर लगाकर पूरे दिन मथुरा, गोकुल और वृंदावन की गलियों में घूमी, लेकिन, उसे कहीं कोई ऐसा शख्स नहीं मिला जिसे मथुरा और बापू के मेल की याद हो.
बापू मथुरा आए थे तो यहां की गंदगी देखकर बहुत दुखी हुए थे. मथुरा आज भी साफ नहीं. स्टेशन बेहतर हो गया है. शहर की सूरत बदल गई है. गांधी के नाम पर पार्क है. विकास बाजार में उनकी बड़ी मूर्ति लगी है. शहर के व्यस्त चौराहे होलीगेट के पास गांधी आश्रम है. लेकिन, उन्हें याद करने वाले और उनके बताए रास्ते पर चलने वाले कम ही हैं. 


कम से कम सफाई को लेकर बापू के आग्रह को मथुरा ने पूरी तरह नजरअंदाज किया हुआ है. विधायक जी ने बताया कि उनका संगठन यमुना और मथुरा की सफाई के लिए जागरूकता अभियान चलाता है. संगठन ने कई बार घाटों की सफाई भी की है. 14 अप्रैल को, जिस दिन बापू ने मथुरा जंक्शन से मद्रास की टेन पकडी थी, युगांधर के कार्यकर्ता ​फिर से स्टेशन पर जुटेंगे. सफाई करेंगे और अपने बीच बापू के कदमों के निशान तलाशने की कोशिश करेंगे.