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रविवार, 10 अप्रैल 2016

सलाम कि तुम 'पप्पू' हो



                                                   
'पप्पू'

भाई लोग कहते हैं ये नाम उस पर सूट करता है.

जावेद अख्तर ने जब गाना लिखा, 'पप्पू कान्ट डान्स साला' , उसका नाम उसके काफी पहले रखा गया था.

एक चर्चित राजनीतिक शख्सियत के लिए सोशल मीडिया पर 'पप्पू' उपनाम पॉपुलर होने से बहुत- बहुत पहले.

अस्सी के दशक में मां-बाप बच्चों के ऐसे ही नाम रख लेते थे.

घर के पुकारू नाम.

पप्पू, गुड्डा, मुन्ना, कालू, ...

मैंने तो एक बार पूछ भी लिया था.

'यार, आजकल पप्पू का मतलब तो निपट चू ि ् माना जाता है. तुझे बुरा नहीं लगता, तेरा नाम पप्पू है'.

वो हंसकर रह गया.

ऐसा नहीं है कि उसे सवाल समझ न आया हो.

ऐसे भी वो मेरे मुश्किल सवालों को दरकिनार ही कर देता है. कभी हंसकर. कभी बहाने बनाकर

लेकिन दिलचस्प ये है कि जैसे ही वो कोई बहाना बनाता है, झूठ झट से पकड़ में आ जाता है.

उसके बहानों के लिए मैंने कई बार उसकी कान खिंचाई भी की है. सरेआम

मसलन, समोसे के साथ मिलने वाली लाल मीठी चटनी को ब्रज क्षेत्र में सोंठ कहा जाता है. 

मिर्च नहीं खाने वाले सोंठ खूब पसंद करते हैं. 

एक बार हम दोस्त बैठे गप लगा रहे थे. पप्पू से समोसे लाने को कहा गया. साथ में सोंठ भी लाने की हिदायत दी गई. 

भाई लौटा तो सोंठ नहीं लाया. 

सवाल हुआ तो बोला, 'सोंठ खत्म हो गई थी'. 

पप्पू इतने पर रुकता तो फिर वो पप्पू ही क्या? 

उसने आगे कहा. 

'दुकानदार बोला, सोंठ नहीं है बक्खर ले जा. अब मैं बक्खर क्या लाता'. 

अगर आप नहीं जानते तो बताना जरुरी है, बक्खर चीनी की उस चाशनी को कहा जाता है जिसमें जलेबी और इमरती को डुबोकर मीठा बनाया जाता है. 

पप्पू का जवाब सुनते ही कुछ साथी हंसे. कुछ मुस्कुराए पर अपना पारा चढ़ गया. 

लेकिन, पप्पू ज़िद्दी इतना कि बात मुंह से निकल गई तो फिर पीछे हटने को तैयार नहीं. 


भाई लोग ये किस्से भी सुनाते हैं कि वो अपने पैसे कितने एहतियात से रखता है. 

साथ में सफ़र करना हो और टिकट लाने की जिम्मेदारी पप्पू के नाम हो तो यकीन मानिए आते ही सबसे उनके हिस्से की रकम वसूल लेगा. 

ऐसा अपना अनुभव नहीं. बाकी साथियों का कहना है. 

दोस्त ऐसे ही और भी किस्से सुनाते हैं. 

और पप्पू के 'पप्पू' होने पर खूब चुटकी लेते हैं. उसे कंजूस बताने वालों की भी कमी नहीं. 

अपनी राय भी ऐसी ही बातों पर बनती बिगड़ती थी. 

लेकिन पप्पू ने अभी एक झटके में आंख खोल दी. बता दिया कि कही, सुनी बात को लेकर किसी की ब्रांडिंग करना ठीक नहीं. 

कई बार तो आंखों देखी बातें भी सच की पूरी तस्वीर पेश नहीं करतीं. 

पप्पू जहां काम करता है, वो एक ट्रस्ट है. गायों की सेवा भी करता है. 

गोवंश यानी गाय, बछड़े, बछिया या फिर सांड़ों के मरने पर उनको समाधि देता है. 

बीते दिनों पप्पू को भी इस काम में लगाया गया. सुपरविजन करने के लिए. जरुरत पड़े तो बाकी कर्मचारियों की मदद के लिए. 

पूरी प्रक्रिया में मदद करने वालों को मेहनताना भी मिलता है. 

200 रुपये. 

दस मौके मिले महीने में तो दो हज़ार रुपये. 

पप्पू की अब तक जो तस्वीर गढ़ी गई थी, उसके मुताबिक ये रकम कम नहीं है. 

पप्पू को जब पहली बार इस काम पर भेजा गया तो लौटकर आने पर उसे 200 रुपयों की पेशकश हुई. 

पप्पू ने इनकार कर दिया. 

सवाल हुआ 'क्यों नहीं लोगे?'. 

पप्पू ने कहा, 'गाय मां है, मां की सेवा के पैसे नहीं लूंगा'. 

सवाल पूछने वाले ने कहा, 'बड़े अधिकारी बुलाकर कहेंगे तो?' 

पप्पू ने कहा, 'कह दूंगा, चारा मंगाकर गायों को खिला दो साहब'.

'और ये भी समझ लो साहब, पैसे नहीं लूंगा तो ये मत समझना कि काम नहीं करूंगा'. 

'महीने में रोज़ जाना होगा तो जाऊंगा'.  


गायों को लेकर देश में बड़ी बहस छिड़ी है. 

पप्पू कभी ऐसी बहस में नहीं पड़ता. कम से कम मैंने नहीं देखा. 

उसके देखे सुने अंदाज से जो तस्वीर बनी थी, उसके मुताबिक भी अपनी सोच होती कि पप्पू पैसे छोड़ नहीं सकता. 

लेकिन, वाह भई पप्पू . मौके पर चौका जमा दिया. 

सामने नहीं किया. लेकिन अब लिख के सरेआम पूरी दुनिया के सामने कहता हूं 'सलाम पप्पू' . 

इसलिए नहीं कि उसने कमाई के एक जरिए को किनारे किया. 

बल्कि इसलिए कि सिर वही है जो सही चौखट पर झुके. हर कदम को चूमने वाला 'चापलूस' सबको पसंद भले ही आ सकता हो लेकिन क्या वो मां का मोल लगाने से बच पाएगा. 

गाय को वोट के बाज़ार में उतारने वालों से पूछ के देखिए.

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो

जिसने पाप ना किया हो...


बचपन में पढ़ा था. थोड़ा बहुत याद भी है. 

आपने भी पढ़ा होगा. इको सिस्टम में फूड चेन. 

चूहा पेड़ पौधों को खाता है फिर सांप का भोजन बन जाता है. सांप को नेवला खा लेता है. नेवले का शिकार शेर करता है और शेर चील की भूख मिटाता है. 

दुनिया ऐसे ही चलती है. 

इस दुनिया में टिकता वही है, जो खुद को हालात के माकूल सबसे बेहतर तरीके से ढाल लेता है. 

डार्विन साहब ने इसे 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' कहा. 

हालांकि, अपनी याददाश्त पर कितना भी ज़ोर डालूं ये याद नहीं पड़ता कि कभी ऐसा कुछ पढ़ाया गया हो कि फूड चेन में एक प्रजाति अपनी ही प्रजाति को मार डाल रही हो. 

वो भी दूसरी प्रजाति को बचाने के लिए. 

अब फूड चेन नए सिरे से तैयार की जा रही है. दुनिया के पुराने सिद्धांत बदले जा रहे हैं. 

अब गाय की जान इंसान की जान से ज्यादा कीमती है. 

गाय के कत्ल के शक में इंसान दूसरे इंसान को मार रहे हैं. 

ये नई किस्म की कड़ी है. 

कोई इंसान अगर भूख (आप स्वाद भी पढ़ सकते हैं) मिटाने के लिए गाय का गोश्त खाने का ख्याल लाता है तो उसे अपने पड़ोसी से सावधान रहना चाहिए. 

क्या पता उसे अपनी नस्ल से ज्यादा फिक्र गायों की हो. 

गायों के लिए मेरा आदर कम नहीं. बचपन से गायों की पूजा ही सिखाई गई है. 

हो सकता है कि गाय को कसाई घर जाते देखकर मेरे खून में भी उबाल आ जाए. 

लेकिन, इतना नहीं कि मैं जज बनूं. खुद सजा मुकर्रर करूं और फिर जल्लाद बन जाऊं. और खुद ही सज़ा भी दे डालूं. कभी नहीं. 

इंसान और जानवरों के बीच का फर्क यही है. ताकत होने पर भी जो धर्म की राह पर टिका रहता है, वही इंसान है. 

गायों को बचाने के तरीके और भी हैं. 

फिर सवाल एक और है. वही, जो कभी राजेश खन्ना ने किया था. 

'यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो , जिसने पाप ना किया हो, जो पापी ना हो'. 

मैं शाकाहारी हूं तो क्या हुआ. चमड़े की बेल्ट लगाता हूं. चमड़े का जूता पहनता हूं. पॉकेट में चमड़े का पर्स रखता हूं. और ये चमड़ा कहां से आता है? 

अगर मैं धर्म के मुताबिक चलने वाला दंडाधिकारी बनना चाहूं तो मुझे सबसे पहले खुद को सज़ा देनी चाहिए. 

मैं चमड़े की जो चीजें इस्तेमाल करता हूं वो मुझे पता नहीं किस जानवर का चमड़ा है, लेकिन, क्या मैं दावे से कह सकता हूं कि ये 'इस' जानवर का चमड़ा नहीं? 

सवाल आस्था का है. तो क्या इंसानों में हमारी कोई आस्था नहीं?

है और रहेगी. 

दूसरे क्या करते हैं, मुझे इस सवाल से फर्क नहीं पड़ता. 

मेरे धर्म को भी नहीं पड़ता. 

हम सनातन हैं. अगर हमने दुनिया को राह दिखाई है तो फिर दूसरों की राह पर क्यों चलें?

हमें तो अपने रास्ते को ऐसे दिखाना चाहिए कि बाकी सभी हर रास्ते को छोड़कर कहें हां, हम भी इस रास्ते पर आना चाहते हैं. 

सनातन संस्कृति के आराध्य और मेरे ईश्वर श्रीकृष्ण ने इसी विश्वास के साथ कहा था, 

'सर्व धर्म परित्याज मामेकम शरणम ब्रज. अहम त्वा सर्व पापेभ्यो मोक्षयिष्मामि मा शुच'