सोमवार, 28 सितंबर 2015

सीना '56 इंच'

और आंखें समंदर 




सीन 1


भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फ़ेसबुक के संस्थापक मार्क ज़ुकरबर्ग के साथ बैठे हैं.

चैट कर रहे हैं.

सवालों की बौछार के बीच एक सवाल माता-पिता के बारे में आता है.

जवाब में मोदी कहते हैं

'हमारे पिताजी तो रहे नहीं अब'

'माताजी है. 90 साल से ज्यादा उमर है. आज भी अपने सारे काम खुद करती हैं'.

तालियां बजती हैं.

मोदी आगे कहते हैं

'पढ़ी लिखी नहीं हैं'.

'जब हम छोटे थे तो हमारा गुजारा करने के लिए वे अड़ोस पड़ोस के घरों में...'

इतना बोलकर मोदी ठहरते हैं. अगला शब्द मुंह से निकलता है तो गला रुंध चुका होता है

'बर्तन साफ करना ...'

मोदी फिर रुकते हैं. दोबारा बोलते हैं तो आवाज पूरी तरह भर्रा चुकी होती है.

'पानी भरना...'

इतना कहने के बाद लगता है कि मोदी को आगे बोलने के लिए खुद से लड़ना पड़ रहा है.

वो आंखों से छलक पड़ने को बेताब आंसुओं से जंग लड़ रहे हैं.

लगता है कि आंखों के आंसू गले में उतर आए हैं और उनकी दमदार आवाज उसमें डूब सी रही है. आवाज किसी तरह हाथ पैर मारते हुए बाहर आने की कोशिश में है.

वो लगभग टूटती कांपती सी आवाज में बात पूरी करने की कोशिश करते हैं

'म..मजदूरी करना'

मोदी रुकते हैं. इस बार जंग जीतने के लिए. डूबती आवाज संभल जाती है. मोदी बात पूरी करते हैं.

'आप कल्पना कर सकते हैं कि एक मां ने अपने बच्चों को बड़ा करने में कितना कष्ट उठाया'.

मोदी के इतना बोलते ही मुझे यश चोपड़ा की फिल्म 'दीवार' का एक 'अमर' सीन याद आ गया. क्यों? पता नहीं.

सीन-2 


विजय का किरदार निभा रहे अमिताभ बच्चन स्मग्लर डाबर का किरदार निभा रहे इफ्तेखार के दफ्तर में खड़े हैं

और ऊंची इमारत की आदमकद खिड़की से झांककर फुटपाथ को देख रहे हैं.

इफ्तेखार पूछते हैं

'क्या देख रहे हो?'

अमिताभ जवाब देते हैं

'देख रहा हूं सामने फुटपाथ पर एक मजबूर औरत दो मासूम बच्चे.'

'भूख से निढाल. बेसहारा.'

अमिताभ घूमते हैं और कहते हैं

'मुझे आपका सौदा मंजूर है डाबर साहब'

दूसरा सीन 1975 का और पहला 2015 का.

सिनेमा का वो दौर बदल चुका है. हिंदुस्तान बदल चुका है. दुनिया बदल चुकी है. तकनीक और तरक्की ने दुनिया को पास लाकर भी रिश्तों को बहुत दूर कर दिया है

लेकिन फिर भी मां की ताकत आज भी उतनी ही है. मां की मजबूरी की याद आज भी आंखों में आंसू ला देती है.

सत्तर के दशक की फिल्मों में फुटपाथ पर मां की मजबूरी के साए में पलना हीरो की खूबी उभारने के लिए जरुरी माना जाता था.

फिल्मी लेखकों ने तब ये नहीं सोचा होगा कि 21 वीं सदी के दूसरे दशक में असल ज़िंदगी में कोई ऐसा हीरो आएगा.

मोदी दुनिया को बता चुके हैं कि उनका सीना 56 इंच का है. यानी वो ऐसे वैसे नहीं बल्कि 'बाहुबली' हीरो हैं. एकदम दबंग.

लेकिन, उन्होंने कभी ये नहीं बताया कि उनकी आंखें समंदर हैं.

और समंदर के आगे छप्पन इंच कहां गुम हो जाते हैं, कोई अंदाजा भी नहीं लगा सकता.

मोदी की ये गहराई उनकी मां की वजह से सामने आई.

ये सीन हिट तो हो ही चुका है. इसे अमर होने से भी कोई नहीं रोक सकता.

हो सकता है, अब से चालीस साल बाद भी आपको कोई ये कहता सुनाई दे,

'मेरे पास मां है'.



शनिवार, 12 सितंबर 2015

विराट की 'औकात', अमिताभ का दांत

एक मजाक और एक 'शाप'


बात, बात-बात में शुरु होती है और कहां तक पहुंच जाती है. 

आज दो लोगों के बीच का मजाक उनकी मिल्कियत भर नहीं रह गया. 

जी हां, अगर ये मजाक सोशल मीडिया पर शुरू हुआ हो तो दसेक लोग मजा लेंगे. सैंकड़ों पैर फंसाएंगे. हज़ारों अपनी राय रखेंगे. लाखों 'हा-हा.. ही ही' करेंगे. या फिर करोड़ों अपनी काबिलियत झाड़ेंगे, इसका फ़ैसला इस बात से होगा कि मज़ाक जिन दो पात्रों के बीच हो रहा है, उनकी हैसियत क्या है. 

बैंक बैलेंस के लिहाज से नहीं फॉलोअर और फ्रेंड्स के लिहाज से. 

मैं जिस मजाक की बात कर रहा हूं, वो महज दो लाइन का है. 


इनमें से एक लाइन क्रिकेट के सबसे बड़े बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर ने ट्विटर पर पोस्ट की. 

दूसरी लाइन मौजूदा टेस्ट टीम के कप्तान विराट कोहली ने सचिन की बात के जवाब में पोस्ट की. 

किस्सा दो लोगों के बीच का था, लेकिन इस कहानी में सैंकड़ों लोग धंस गए. 

दरअसल, सचिन और विराट के बीच दो लाइन का जो मजाक हुआ, वो बहुतों के लिए चुटकी लेने, अपनी 'भक्ति' जाहिर करने और 'भड़ास' निकालने का जरिया बन गया. 

बात सचिन तेंदुलकर ने शुरु की. 


खबर गरम है कि विराट कोहली आईपीटीएल (इंटरनेशनल प्रीमियर टेनिस लीग)की यूएई रॉयल्स टीम के कोओनर बन गए हैं. इस टीम के मालिकों में टेनिस के सुपरस्टार रोजर फेडरर शामिल हैं. 

तो इसी खबर के बहाने सचिन ने ट्विटर पर चुटकी ली. 

सीधा सपाट ट्वीट किया, जिसका हिंदी में मतलब है, 'विराट कोहली, मैं खेलना चाहता हूं' 

इसका मतलब ये निकाला जा रहा है कि सचिन, विराट से कह रहे हैं, 'मैं तुम्हारी टीम से खेलना चाहता हूं'. 

घंटे भर बाद विराट कोहली का भी जवाब आ गया. 

उन्होंने अंग्रेजी में जो लिखा उसका मतलब कुछ यूं है, 'मुझे यकीन नहीं कि इसके लिए जो चाहिए वो आपमें है सचिन पा जी'. 

मतलब कि मुझे लगता नहीं कि मेरी टीम से टेनिस खेल पाओ, आप में वो बात है. 

फिर क्या था, सचिन भक्त शुरु हो गए. 

सचिन ने विराट कोहली को कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उनके चेले विराट को उनकी 'औकात' याद दिलाने लगे. 

एक ने कहा, 'विराट कोहली हमारे भगवान से ऐसा कहने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई'. साथ में पिस्तौल का सिंबल भी लगा दिया. मतलब गुस्सा इतना है कि मिल जाओ तो सीधे 'ठांय'. 

एक भाई ने याद दिलाया, 'शाहिद अफरीदी ने वनडे में सैंतीस गेंद में सेंचुरी बनाई थी, तब वो जिस बल्ले से खेले उसे उन्होंने वकार यूनुस से उधार लिया था और वकार ने वो बल्ला सचिन से उधार लिया था'. 

मतलब ये समझाने की कोशिश की गई कि सचिन की बात छोड़ो, वो जिस बल्ले को छू भी देते हैं, वो वर्ल्ड रिकॉर्ड बना देता है. 

हालांकि कुछ एक विराट कोहली के समर्थन में भी आगे आए. उनमें से एक ने सचिन को धोनी के साथ खेलने की सलाह दी. 

महज दो लाइन से शुरु हुई इस कहानी को लेकर अब इतनी लाइनें लिखी जा चुकी हैं कि एक किताब छप सकती है. 

किसी का मजाक कईयों के लिए 'मसखरी' और कईयों के लिए 'दिल के दर्द' की वजह बन गया. जय हो सोशल मीडिया. 


बात दर्द की हो रही है तो बिग बी यानी अमिताभ बच्चन जी का हाल भी लेते चलें. 

सरकार ने हिंदी के उद्धार की फोटो पर नया फ्रेम लगाने की ठानी यानी बत्तीस साल बाद देश में 'विश्व हिंदी सम्मेलन' की मेजबानी का इरादा बनाया तो हिंदी सिनेमा के सबसे कामयाब, सबसे कमाऊ और सबसे लोकप्रिय कलाकार यानी अमिताभ बच्चन जी की याद आ गई. 

याद आ गई तो उन्हें बुला भी लिया. ग़लती ये हो गई कि ऐसे तमाम स्वनामधन्य महानुभावों को आयोजक भूल गए जो ज़िदगी भर अपने माथे पर हिंदी की बिंदी लगाए घूमते रहे हैं. 

उन्होंने हिंदी की आरती उतार कर इस भाषा का कितना भला किया है, या भाषा के विमर्श से खुद उनका भला हुआ है. या फिर साहित्य में योगदान की नज़र में वो 'बच्चन परिवार' से कितने आगे हैं, ये बहस का मुद्दा हो सकता है. 

लेकिन फिलहाल बड़े मुद्दे की बात ये है कि उनमें से बहुतों के पेट में दर्द हो गया. और ये दर्द इस कदर संक्रामक था कि मुंबई पहुंचते- पहुंचते ये अमिताभ बच्चन जी के दांत में उतर गया. 


मैंने एक फ्ल़ॉप फिल्म 'गंगा जमुना सरस्वती' में अमिताभ बच्चन को विलेन के दांत तोड़ते देखा है. वो भी गिन-गिनकर पूरे बत्तीस. 

बात अब समझ आई कि आप दूसरे के दांत भले ही तोड़ सकते हो लेकिन जब मामला अपने दांत का हो तो आप किनारे होकर चुपचाप बैठना ही पसंद करते हैं. 

तो अमिताभ के दांत का दर्द उन्हें हिंदी सम्मेलन में शिरकत नहीं करने देगा. चलिए, जिन भाईयों के पेट में दर्द हुआ था, वो शायद अब कुछ कम हो जाए. 

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

... वरना इस बार भी चमत्कार होता

केशव जरुर बुलाते 

श्रीकृष्ण जन्मस्थान, मथुरा स्थित भगवान श्रीकेशवदेव का दिव्य विग्रह


मैं तो न दिन देखता हूं न रात. 

न सुबह. न शाम. न घर, न बाहर. 

जब जरुरत होती है, उन्हें याद करता हूं. 

और यकीन मानिए, ये बात मैं 'अंधविश्वास' फैलाने के लिए नहीं कर रहा. वो सुनते हैं. 

वो कैसे करते हैं पता नहीं. लेकिन वो कुछ ऐसा कर देते हैं कि जो कुछ मैं चाह रहा होता हूं, वो हो जाता है. 

अब आप सोचेंगे कि मैं ऐसा क्या चाहता हूं? 

तो मैं ये भी बता देता हूं. 

मान लीजिए मुझे अपने किसी जरूरी काम से किसी खास शख्स को फोन करना हो. मैने कई बार नंबर मिलाया. कभी फोन नहीं मिला. कभी फोन मिला तो घंटी बजती रही. फोन उठा ही नहीं. 

मेरी बेचैनी जब तक नहीं बढ़ती, मुझे उनकी याद नहीं आती. 

और जब बेचैनी बढ़ती है. वो याद आ जाते हैं. 

मैं कहता हूं, 'हे केशव फोन मिलवा दीजिए'. 

अगले ही पल चमत्कार हो जाता है. 

फोन मिलता है. बात होती है. बात बन जाती है. 

मुझे ट्रेन पकड़नी है. मैं आखिरी लम्हे में निकला हूं. रास्ते में जबरदस्त ट्रैफिक है. लगता है कि ट्रेन छूट ही जाएगी. 

मैं उन्हें फिर याद करता हूं. फिर चमत्कार होता है. हर सिग्नल पर मुझे ग्रीन लाइट मिलती है. 

स्टेशन के बाहर मुझे तैयार कुली मिल जाता है. ट्रेन के खिसकने के पहले मैं अपनी बर्थ तक पहुंच जाता हूं. 

मेरी ख्वाहिशें ऐसी ही रही हैं और अब तक मेरी कोई 'विश' उन्होंने ठुकराई नहीं है. 

ये बात अलग है कि मैंने कभी करोड़पति बनने की तमन्ना नहीं की और उन्होंने मेरे लिए ऐसा कोई चमत्कार भी नहीं किया. 

चमत्कार वो तभी करते हैं जबकि मैं जान झोंकने को तैयार रहता हूं. 

बात इस पार या उस पार की होती है. 

जन्माष्टमी पर जगमगाता श्रीकृष्ण जन्मस्थान 
खुद को द्वापर के महापुरुषों से जोड़ना ठीक तो नहीं लेकिन उनके बारे में जो कहानियां सुनी हैं, ऐसे लम्हों में वो याद हो आती हैं. 

भला उन्होंने अर्जुन से क्यों कहा, 'मैं हथियार नहीं उठाऊंगा'. 

वो हथियार उठाते तो क्या महाभारत का महायुद्ध अट्ठारह दिन चलता? कोई अर्जुन को याद करता? 

हर पल उन्होंने अर्जुन की मदद की. लेकिन तभी जब वो परिश्रम और शौर्य दिखाने को तैयार हुआ. 

अपनी मुंहबोली बहन कृष्णा की मदद को भी वो तभी आए, जब वो समझ गई कि उसके बाहुबलि पांच पति और महावीर भीष्म उसे बचाने में नाकाम हैं. हर आस टूटी तो उसने केशव को याद किया. 

वो केशव का वस्त्रावतार था. कृष्ण सिर्फ कृष्णा को दिखे. उनके चमत्कार से दुशासन थका तो हारे हुए वीरों का शौर्य जाग गया. प्रतिशोध का संकल्प लेने की होड़ लग गई. 

कृष्ण भक्तों के संकल्प का मान रखते हैं. हमेशा. शर्त इतनी है कि वो संकल्प उन्हें ध्यान में रखकर लिए जाएं. 

जिसे भी जब भी बाहुबल का अभिमान हो जाता है, कृष्ण पीछे हट जाते हैं. 

मानो कह रहे हों, 'जाओ भैया कर लो'. 

और जब कन्हैया न हों तो भैया पर क्या होगा? अपनी लाठी पर क्या गोवर्धन टिकेगा? 

कई बार अपनी धुली भी है. वो बीच रस्ते छोड़कर भी गए हैं. 

मैं जब मथुरा में था. हर दिन उनसे मिलने जाता था. वक्त भी लगभग एक सा होता था. दोपहर बारह बजने के एक दो मिनट पहले. 

कुछ आदत सी बन गई थी. उनके दर्शन ठीक बारह बजे बंद होते थे. 

मेरे घर से मंदिर तक पहुंचने में बारह मिनट ही लगते थे. तेज़ रफ्तार से चलते हुए पहुंचने पर. 

मैं शायद ही कभी पौने बारह बजे के पहले निकलता था. 

तैयार होते- होते इतना वक्त हो ही जाता था. हर दिन दर्शन के बाद सोचता था कि कल से थोड़ा पहले निकलूंगा लेकिन ऐसा होता नहीं था. 

यकीन करना शायद मुश्किल हो सकता है, लेकिन, कई बार लगा कि वो भी मेरा इंतज़ार करते हैं. 

कुछ एक बार मैं बारह बजकर एक मिनट पर पहुंचा. घड़ी की सूईंयों के मुताबिक चलने वाले पुजारी उन दिनों जाने क्यों घड़ी देखना भूल जाते. 

मुझे दर्शन मिल जाते. 

इस बार जन्माष्टमी पर मैंने उन्हें टीवी पर देखा. दूर से. 

तमन्ना थी कि वहीं पास से उन्हें देखूं लेकिन शायद संकल्प में कोई खोट रह गया. 

हां, मैंने जानझोंक कर नहीं कहा, 'मुझे बुला लो केशव'. वरना इस बार भी चमत्कार होता. 

सोमवार, 24 अगस्त 2015

हां सलमान

हिंदुस्तान है कुर्बान 


किसी रात ऐसा हो सकता है. वो उठें और एक के बाद एक ट्वीट करने लगें.

सुबह हो तो वो आधा हिंदुस्तान जिसे आप जानते हैं और थोड़ी बहुत बातचीत करते हैं, आपको बताने लगे कि उन्होंने कितने मिनट के बीच कितने ट्वीट किए.

उनकी तमाम गर्लफ्रेंड्स के नाम हर वो शख्स जानता है, जिसे आप जानते हैं. 

उनकी लवस्टोरी कब शुरु हुई. कब तक चली. फिर 'उसे' कौन ले उड़ा? ये किस्सा कोई भी बता सकता है. 

आपका प्लम्बर. दूध वाला. अखबार वाला. माली. जिम इंस्ट्रक्टर. आपका बॉस भी. 

उनके हर केस की जानकारी होने के लिए आपका वकील होना जरुरी नहीं. 

और, उनकी फिल्मों के बिजनेस की जानकारी के लिए न फिल्म पंडित होने की जरुरत है और न ही फिल्मों दिलचस्पी रखने की. 


फिल्म में कहानी क्या थी?  गाने कैसे थे लोकेशन कैसी थी? किसे याद रहता है.

थियेटर से बाहर निकलने वाले कभी ये बताने में दिलचस्पी नहीं लेते कि फिल्म कैसी थी?

वो तो बस यही कहते हैं, 'सलमान रॉक्स' 

'सलमान वाज़ सुपरब' 

'ही इज़ रीयल रॉक स्टार' 

अब आपको पता है कि उनके पिता हिंदुस्तानी सिनेमा के मशहूर स्क्रिप्ट राइटर थे तो ये आपकी ग़लती है. 

और आपने ये ग़लती सवाल की शक्ल में आगे बढ़ा दी तो जवाब मिलेगा 

'यार कहानी देखने कौन जाता है. हम तो सलमान को देखने जाते हैं'. 

जी हां, सलमान खान हिंदी सिनेमा के वो सितारे हैं, जिसका अपना आसमान है

और, मसाला फिल्मों में अपने सपनों की दुनिया खोजने वाला हिंदुस्तान अब इसी आसमान के नीचे बसेरा करता है. 


ऐसी फैन फॉलोइंग तो एक्टिंग के शहंशाह दिलीप कुमार को भी नसीब नहीं हुई. 

एक मैगज़ीन ने खुलासा किया है कि अमिताभ बच्चन कमाई के मामले में अब भी सलमान खान को टक्कर देते हैं. 

स्टारडम के लिहाज से हिंदुस्तान ने अमिताभ बड़ा सितारा नहीं देखा. (असहमत हों तो माफ कीजिएगा मैं अमित जी का फैन हूं)

उनकी एक्टिंग का भी हर कोई लोहा मानता है 

लेकिन, आपको ऐसी कितनी फिल्में याद है, जिसमें अमिताभ बच्चन हों और जिसकी स्टोरी या डॉयलॉग दमदार न हो, वो बॉक्स ऑफिस पर झंडे लहरा गई हो. 

आमिर खान तो बिना उम्दा पटकथा के काम करने को ही तैयार नहीं होते. 

और शाहरुख खान, उनका स्टारडम तो हमेशा से बड़े बैनर के भरोसे ही टिका है. 


इन सबके बीच सलमान खान कहां हैं? 

ईद पर 'बजरंगी भाईजान' आई तो भाई लोगों ने कहा, 'बहुत दिनों के बाद सलमान की कोई फिल्म आई है जिसमें कोई कहानी है'. 

मतलब? बहुत दिनों से सलमान जिन फिल्मों में काम कर रहे थे, उनमें कोई कहानी ही  नहीं होती थी? 

ऐसा आंकलन मेरा नहीं. 

मै सलमान का उस अंदाज में मुरीद भी नहीं. 

ये बात अलग है कि उन्होंने जिस 'सौ करोड़' के क्लब की नींव डाली है, उसमें चंदा मैंने भी दिया है. यानी उनकी लगभग हर फिल्म देखी है. 

सलमान ने मेहनत से बॉ़डी बनाई है. पचास की उम्र में भी वो चॉकलेटी हैं. एक्शन भी हिला देने वाला करते हैं. 

लेकिन, उनके पास न तो अमिताभ बच्चन जैसी जादुई आवाज है. न दिलीप कुमार और आमिर खान जैसी एक्टिंग की काबीलियत. वो गोविंदा और हृतिक की तरह नाच भी नहीं सकते. सनी देओल की तरह चीख नहीं सकते और शाहरुख की तरह रो नहीं पाते. 

लेकिन, एक स्टार के तौर पर सलमान इन सभी से मीलों आगे जा चुके हैं. 

स्टार वही है, जिसकी चमक में दुनिया को कुछ और दिखाई नहीं दे. बाकी सबकुछ धुंधला हो जाए. 

साल 1989 के दिसंबर महीने में 'मैनें प्यार किया रिलीज' होने के बाद सलमान पर न जाने कितने और कैसे कैसे आरोप लगे. 

कितनी बार उनकी एक्टिंग का पोस्टमार्टम हुआ 

कितनी बार उनकी निजी ज़िंदगी की चीर फाड़ की गई.

कितनी बार उनके करियर के खत्म होने का एलान किया गया. 

जाने कितनी बार 

लेकिन हर बार सलमान नाम के सितारे की चमक कुछ और बढ़ गई. 

सलमान के स्टारडम का असल मतलब तो मुझे तब समझ आया, जब 'दबंग' रिलीज हुई. 

मेरे चार बरस के भांजे ने मेरी जेब के मुताबिक मेरे बेशकीमती धूप के चश्मे को उठाया. अपनी कॉलर में टांगा और खालिस सलमान स्टाइल में 'दबंग... दबंग.. दबंग' करने लगा. 

वो रीयल सलमान को नहीं जानता. उनकी ढेर सारी लव स्टोरीज़ से भी अनजान है. उसे उन पर चलते मुकद्मों की भी जानकारी नहीं. वो सलमान के ट्वीट भी नहीं पढ़ता. 

लेकिन सलमान की हर फिल्म देखने ज़िद करता है. सलमान जैसी बॉडी बनना चाहता है और आगे कभी सलमान जैसा ही स्टार बनना चाहता है. 

बच्चे की बात छोड़ए. अपने मोदी जी से पूछ लीजिए. सलमान के स्टारडम को बयान करने वाली कहानियां तो उनके पास भी हैं. 

रविवार, 23 अगस्त 2015

चाहें सोना मांगे प्याज़

कैसा चलन, कैसा मिजाज 

'मेरा राजा बेटा'. 

'मेरा सोना बेटा'.

वो कौन सी मां होगी, जिसने कभी न कभी अपने बेटे को राजा और सोना कह कर न बहलाया हो. 

हर मां के लिए उसका बेटा किसी राजा की तरह रौबीला होता है. सोने की तरह चमकदार और बेशकीमती होता है. 

क्या आपने किसी मां को कहते सुना है मेरा 'प्याज' सा बेटा 

चलिए सीन बदलते हैं, सवाल बदलते हैं 

हिंदुस्तान में सरकार जब किसी पर खुश होती है. मदद के तौर पर मेहरबानी करना चाहती है तो क्या देती है. 

सीधा सा जवाब है, पेट्रोल पंप 

सीमा पर शहीद होने वालों के परिवार को पेट्रोल पंप. पुलिस की वर्दी में शहीद होने वालों के घरवालों को पेट्रोल पंप. अपने चहेते कार्यकर्ताओं को पेट्रोल पंप. 

क्या आपने सुना है कि कभी सरकार ने किसी को प्याज की आढ़त दी हो? 

कहा हो, 'जा बेटा प्याज बेच खूब कमा'

आप ये तो नहीं सोच रहे कि मैं घूम फिरके प्याज पर क्यों आ रहा हूं? 

प्याज मैं मेरी खास दिलचस्पी नहीं. मैं तो जमाने के चलन को देखकर हैरान हूं. 

अनमोल सोने का मोल इस साल इतना टूटा कि भाई लोगों ने कह दिया कि सोना तो 20 हज़ार के नीचे चला जाएगा. यानी 10 ग्राम सोना सिर्फ बीस हज़ार में मिलने लगेगा. 

ठीक है कि सोना 25 हज़ार के आसपास ठहर गया लेकिन फिर भी ये किसने सोचा था कि 2015 में सोने दाम सिर्फ 25 हजार रुपये होंगे. 

और तेल. उसने तो सारे जमाने को हैरान कर दिया है. कच्चा तेल 40 डॉलर प्रति बैरल तक टूट गया है. करीब 7 सालों में कच्चा तेल इतना कमजोर नहीं हुआ. 



जमाना जिन चीजों को हासिल करने के लिए दीवाना हुआ फिरता है, वो दोनों बेशकीमत चीजें ऐतिहासिक तौर पर सस्ती हो गई हैं.

लेकिन, ज़रा लोगों का मिजाज तो देखिए वो प्याज की कीमतों को लेकर हाय-तौबा किए जा रहे हैं. 

कई बार सोचता हूं कि इस निठल्ले प्याज की किस्मत पर तो सोने को भी रश्क होता होगा. उन देशों को भी जो तेल बेच-बेचके धन्ना सेठ हो गए हैं. 

कभी ये प्याज महंगा होता है तो सरकार बदल देता है. कभी ये प्याज महंगा होता है तो मामला अदालत में पहुंच जाता है. 

जी हां, लखनऊ में लोग प्याज की कीमत को लेकर हाईकोर्ट पहुंच गए हैं. कोर्ट से गुहार लगाई है कि वो प्याज के दाम घटाने के आदेश जारी करे. सरकार को पार्टी बनाया गया है. 

अब बताइये ये कोई बात हुई. आप सोने को भूल गए. तेल को भूल गए और प्याज पर पिल गए. वो भी उस प्याज पर जो मंहगा होने पर रुलाता है और आसानी से मिल जाए तो भी आंख में आंसू ला देता है. 

चलते- चलते बात सरताज अज़ीज़ के नहले पे सुषमा स्वराज के दहले की. 

पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने कहा कि अगर वो बातचीत के लिए हिंदुस्तान गए तो तीन डॉजियर साथ ले जाएंगे, जिसमें सबूत हैं कि भारत की खुफिया एजेंसी रॉ पाकिस्तान में दखल देती है. 

थोड़ी देर बाद भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. सुषमा ने कहा, ' वो क्या कागज़ देंगे. जिंदा सबूत है हमारे पास. हम तो जिंदा आदमी खड़ा कर देंगे'. 

इशारा उस पाकिस्तान  के आतंकवादी की तरफ था जिसे हाल में जम्मू कश्मीर में जिंदा दबोचा गया है. 

प्रेस कॉन्फ्रेंस खत्म हुई तो एक अलग वजह से मैंने राहत महसूस की. 

मुझे डर था कि कोई अतिउत्साही रिपोर्ट ये न पूछ ले, सुषमा वो सब छोड़िए, ये बताइये कि आखिर आपने ललित मोदी की मदद क्यों की? क्या आप पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भी मानवीय आधार पर मदद करेंगी.?

थैंक्स पत्रकार दोस्तों... 

शनिवार, 22 अगस्त 2015

कभी हंस भी लिया करो

हाल-ए-दिल पे ही सही 


अचानक ख्याल आया. 

चचा गालिब ने यूं ही तो नहीं कह दिया होगा 

'पहले आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी, अब किसी बात पे नहीं आती'. 

कोई तो बात होगी. फिर खुद को टटोला. गिनती की और हैरान रह गया. 

उस 'नन्ही परी' को जब मुस्कुराते देखता हूं, बस तभी खिलखिलाने को दिल करता है. बाकी वक्त तो न हंसी अपने पास आती और न हम उस तक जाने की कोई कोशिश करते हैं. 

वैसे देखिए तो हंसी को किसी के बुलावे का इंतज़ार तो होता नहीं. खुशी जब कभी दिल के करीब दस्तक देती है, वो बिना बुलाए चली आती है. 

पूरी दुनिया उसकी कद्र भी जानती है. 

कहने को तो हर कोई कहता है, 'मुस्कुराते रहो. हंसते रहो'

लेकिन हंसी नसीब कितनों को होती है? 

ये हंसी इतनी दुर्लभ न होती तो बाज़ार में हंसने- हंसाने की दुकानें भी न सजतीं. 

व्हाट्सअप हो, टीवी हो या फिर कोई फिल्म. हर जगह, हर वक्त, हर कोई हंसाने की कोशिश में लगा दिखता है. 

हंसी आती भी है, मगर खोखली सी. खुशी की पालकी पे बैठ के नहीं आती. 

टीवी और फिल्मों  में तो हंसाने का अजब सा फंडा चल पड़ा है. 

या तो किसी की बेवकूफी पर हंसाने की कोशिश होती है या फिर किसी की बेइज्जती करके. 

ये बेइज्जती वाला फंडा शायद पाकिस्तानी नाटकों से आया है. 

मानो हंसाने वाले माने बैठे हों कि जब तक किसी के गाल पे 'झन्नाटे' वाला नहीं पड़ेगा, हमारी हंसी का गुब्बारा फूटेगा ही नहीं. या फिर जब तक हमारे सामने कोई निपट मूरख नहीं आएगा, हम हंसी की महफिल सजाएंगे ही नहीं. 

हंसी के वो हल्के फुल्के लम्हे तो गायब से ही हो गए हैं जो कई बार इत्तेफाक से आते थे और गुदगुदा के चले जाते थे. कई बार ठहर भी जाते थे और हंसते-हंसते ऐसा लगता था कि कहीं जान ही न निकल जाए. 

मसलन, आपने पेट दर्द का बहाना बनाके स्कूल की छुट्टी कर दी हो, छत पर पतंग उड़ाने चढ़ गए हों और तभी छोटा भाई आकर ख़बर दे. 

'भैया मैथ वाले सर आ रहे हैं तुझे देखने'. 

और आप पतंग, चरखी, चप्पल सब छोड़ के भागे हों, छत की सीढ़ियां फलांगते हुए अपने कमरे की तरफ. तभी सर घऱ की घंटी बजाते हैं और घर के सारे लोगों की हंसी छूट रही हो और आप समझ नहीं पा रहे हैं कि मुंह दबाएं कि पेट. 

लोगों को हंसाने के लिए अब लाफिंग क्लब चल रहे हैं. लेकिन मेरी दिलचस्पी उस खोखली हंसी में नहीं. मैं तो चाहता हूं कि आप हंसे तो ऐसे जैसे कुदरत के आशीर्वाद से फूल हंसते हैं. खुलकर. खिल- खिलाते हुए. 

मैं प्रयोग शुरु कर रहा हूं. आप भी आजमा सकते हैं. बेवकूफी पर ही हंसना है तो अपनी बेवकूफियां चुनें. बेइज्जती पर ही हंसना है तो तभी हंसे जब कोई आपको धो दे. 

चलते-चलते एक हंसगुल्ला, शायद आपको पसंद आए. मैं तो इसे पढ़ते ही हंस पड़ा था. 

रिजल्ट का दिन था. 

दो दोस्तों को साथ स्कूल जाना था. एक को लगा कि वो पास नहीं होगा तो बीमारी का बहाना कर घर पर ही रुक गया. 

स्कूल जा रहे अपने साथी से कहा, 'देख अगर मैं एक सब्जेक्ट में फेल हो जाऊं तो कहना जय श्रीकृष्ण' 

'दो में फेल हो जाऊं तो कहना जय श्रीराम' 

'तीन में फेल हो जाऊं तो कहना जय महादेव' 

दोस्त सिर हिलाकर चला गया. 

स्कूल से निकलने के बाद उसने फोन किया 

घर पर रुक गए दोस्त ने पूछा, 'रिजल्ट देखा, क्या हुआ' 

जवाब मिला, 'संसार के सभी देवी-देवताओं  की जय' 

दोस्तों, कभी हंस भी दिया करो. फेल होना तो नियति है. 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

कहां ले जाएगी ये उत्तेजना

ज़रा ठहरिए और सोचिए 


शिव तीसरा नेत्र खोलते हैं तो प्रलय आता है. 

शिव की दो आंखें दुनिया के कल्याण के लिए हैं. तीसरी विनाश के लिए. 

महादेव के तीसरी आंख खोलने की कथाएं कम ही हैं. 

तीसरी आंख प्रतीक ज्यादा है. कामदेव को भस्म करने के लिए खुलती है और फिर बंद हो जाती है. 

शिव के क्रोध का ज्वालामुखी युगों में एक बार फूटता है. वो भी दुनिया के कल्याण के लिए. 

लेकिन, शिव भक्तों का हाल देखिए. गुस्सा जाहिर करने के लिए तीसरी आंख की जरुरत ही नहीं. दोनों आंखों में ही अंगार लिए घूमते हैं. 

गुस्से का एक नमूना देखिए. 

उज्जैन के महाकाल मंदिर में एक डिप्टी कलेक्टर और एक कॉन्सटेबल के बीच महाभारत हो गया. 

बात छोटी सी थी. डिप्टी कलेक्टर वीवीआईपी ट्रीटमेंट चाहते थे. गेट पर खड़ा कॉन्सेटेबल उन्हें पहचान नहीं पाया. परिचय पूछ लिया. 

डिप्टी कलेक्टर साहब नाराज़ हो गए. आकार में अपने से डेढ़ गुने कॉन्सटेबल को थप्पड़ जड़ दिया. 

पद की गर्मी में शायद सोचा हो कॉन्सेटबल सह जाएगा.

लेकिन, आकलन गलत हो गया. कॉन्सटेबल के पास भी वर्दी की गर्मी थी. 

कुछ वर्दी का गुरुर और कुछ थप्पड़ खाने की खीज. सिपाही हत्थे से उखड़ गया. डिप्टी कलेक्टर साहब को मारने दौड़ा. 

खुलकर एलान किया, 'हल चलाकर खा लूंगा, मार नहीं खाऊंगा'. 

यानी नौकरी मेरे ठेंगे पे. 'थप्पड़ का बदला तो लेके रहूंगा डिप्टी कलक्टर' 

दस-दस लोगों ने पकड़ा तब सिपाही काबू हो सका. 

मंदिर में तमाशा खड़ा हो गया. डिप्टी कलेक्टर और सिपाही की तकरार का वीडियो नेशनल मीडिया में छा गया. 

प्रशासनिक खामियों के लिए लगातार सुर्खियां बटोर रहे मध्य प्रदेश के नाम पर एक और दाग लग गया. 

गुस्से का ऐसा गुबार सिर्फ उज्जैन में नहीं फूटा है. 

आप कहीं चले जाइये, आपको हर तरफ लोग गुस्से में तपते नज़र आएंगे. 

इस गुस्से की वजह से सड़क पर मारपीट के किस्से आम हो चले हैं. ऐसी लड़ाइयों में जान जाने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं. 

दिल्ली में सड़क पर मामूली टक्कर की दो अलग-अलग घटनाओं में एक बाइक सवार और एक बस ड्राइवर की मौत का मामला अभी ताज़ा है. 

एक ऐसा समाज जिसकी सहनशीलता, दूसरों की गलतियों को क्षमा करने की खूबी और किसी सूरत में किसी कमजोर पर हिंसा न करने की प्रतिज्ञा पूरी दुनिया में मशहूर थी, वो आज बात-बात में उबल और उफन रहा है. 

उसके लिए गुस्सा और अपना गुरुर इतना अहम है कि दूसरों के स्वाभिमान को तो छोड़िए जान की भी कोई कीमत नहीं रही. 

किसी वक्त सहनशीलता शक्ति का परिचायक मानी जाती थी. आज सहन न करने को ताकत बताने का जरिया मान लिया गया है. 

बीते चार साल से तो मैं देख रहा हूं कि एक समाज के तौर पर हम लगातार उत्तेजना के चरम पर बने हुए हैं. 

इसकी शुरुआत अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुई. 

अन्ना अनशन पर बैठे और भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरा देश उबल पड़ा. 

फिर दिल्ली की सड़क पर एक असहाय के साथ चलती बस में हैवानियत की घटना हुई.

इस बार भी दिल्ली समेत पूरा देश उबल पड़ा. 

इसके बाद तो उत्तेजना, गुस्सा और उन्माद समाज का स्थायी भाव सा हो गया. 

समाज की अगुवाई करने वालों ने बदलाव की दुहाई देते हुए इस भाव को बदलने नहीं दिया. लोकसभा चुनाव खत्म हुए तो लगा कि चलो, लावा बह गया अब मन का ज्वालामुखी शांत हो जाएगा. 

लेकिन, नहीं. उन्माद, उत्तेजना और गुस्से की भट्टी में ईधन डालने वाले अब भी थके नहीं है. 

मैं फिक्रमंद हूं. ये स्थिति एक समाज के तौर पर हमारी पहचान के उलट है. 

हमारी पहचान तो विरोधी को भी सम्मान देने की रही है. हम वो समाज हैं, जिसने कभी गुरुर के लिए गुस्सा नहीं किया. 

हम जिन सर्वशक्तिमान भगवान को पूजते हैं, उनकी छवि को याद करें तो उनका सुदर्शन नहीं, बांसुरी ही हमें याद आती है. 

किसी शिशुपाल की गलतियां सौ की गिनती पार कर जाती हैं तो चक्र हाथ में आता जरुर है, लेकिन स्थाई तौर पर नहीं रहता. 

हमारे गुरु जब ज्ञान देते हैं तो कहते हैं, 'जिसने आपको क्रोधित कर दिया, उसने आपको पराजित कर दिया'. 

तो फिर हम पराजय को स्थाई भाव में बदलने को बेताब क्यों हैं? 

हम इस गुस्से की आग में किसे जलाना चाहते हैं ? अपने विरोधी को . अपनी क्षमाशीलता को या फिर एक समाज के तौर पर अपनी पहचान को?

सजा देने वाले से बड़ा माफ करने वाला होता है. अगर आप वास्तविकता में शक्तिशाली हैं तो माफ करने से आपकी ताकत और रुतबे में इजाफा ही होता है.गुजारिश है, माफ करने की खूबी को भुलाइये मत. 

अगर आप ये कर सके तो जब कभी आपको क्रोध आएगा तो वो शिव का क्रोध होगा. प्रलयंकारी. 

रोज़ उबलेंगे तो आपका गुस्सा आपका ही दुश्मन हो जाएगा.   

गुरुवार, 20 अगस्त 2015

अगर करनी है चोरी

तो मत सुनना धार्मिक कथा 

चोरों को धार्मिक कथाएं नहीं सुननी चाहिए. 

बताते हैं कि किसी दौर में चोरों के गैंग में ये सबसे जरुरी नियम होता था. 

इसे लेकर एक कहावत भी बन गई 

'चोर सुने धरम के कथा'? 

यानी चोर कहीं धर्म की कथा सुनते हैं? 

कहावत कई बार सुनी थी. मतलब बहुत बाद में समझ आया. 

मतलब सीधा सा है. चोर अगर धर्म की कथा सुन लेगा तो फिर चोरी नहीं कर पाएगा. यानी अपने धंधे से ही मुंह मोड़ लेगा. 

भगवान वाल्मीकि के साथ ऐसा ही हुआ था. वो चोर नहीं डाकू थे. संतों से एक मुलाकात क्या हुई, ब्रह्म के समान हो गए. 

कोई अबोध पाप और पुण्य का अंतर नहीं जानता. वो जो सुनता है, उसी के आधार पर पाप और पुण्य की तस्वीर बनाता है. 


सुनकर कुछ कर गुजरने का जज्बा वीरगाथा काल की रचनाओं से भी जाहिर होता है. 

युद्ध में उतरने के पहले हर किसी को डर लगता है. लेकिन, अगर कानों में ऐसी कविता गूंजे जिसे सुनते ही खून खौल उठे, बाजू फड़कने लगे तो डर भला कहां ठहरेगा? 

ऐसी ही एक कविता का करिश्मा था कि शूरवीर महाराज पृथ्वीराज चौहान ने आंखें गंवाने के बाद भी चार बांस, चौबीस गज और आठ अंगुल की ऊंचाई पर रखे सिंहासन पर बैठे 'सुल्तान' को ऐसा सटीक तीर मारा कि उसकी आत्मा शरीर छोड़कर हमेशा के लिए चली गई. 

ऐसी कविताएं और कहानियां आज भी असर दिखाती हैं. 

वैद्यनाथ धाम जल चढ़ाने गए छोटे भाई निलेश ने ये तस्वीर भेजी है. कैप्शन लिखा है- आधुनिक श्रवण कुमार. 

सतयुग में श्रवण कुमार ने अपने अंधे मां-बाप को इसी तरह तीर्थ कराया था. 

इस नौजवान ने अगर श्रवण कुमार की कहानी नहीं सुनी होती तो शायद अपनी बूढ़ी मां को इस तरह से वैद्यनाथ धाम ले जाने का आइडिया भी नहीं आता.  

105 किलोमीटर पैदल चलना ही किसी तपस्या से कम नहीं. ऊपर से मां का वजन. 

मैंने किसी से ऐसा ही किस्सा सुना था. एक छोटी लड़की कंधे पर एक बच्चे को रखे तेज़ी से पहाड़ी चढ़े जा रही थी. पहाड़ी के ऊपर उसका घर था. उस पहाड़ी पर कई और लोग चढ़ाई कर रहे थे. उनमें से ज्यादातर खाली हाथ थे लेकिन फिर भी चढ़ते-चढ़ते हांफने लगे. 

वहीं उस छोटी लड़की के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी. किसी ने पूछा कि बेटी ये बोझ लेकर चढ़ती हो, थकती नहीं. बच्ची ने तपाक से जवाब दिया, 'थकूंगीं क्यों  ये बोझ नहीं मेरा भाई है'. 


इत्तेफाक की बात है. धर्म की राह दिखाने वाली एक कहानी का असर बड़े भाई कपिल शर्मा के किस्से में भी मिला. 

कपिल भाई भगवान दत्तात्रेय के भक्त हैं. 

भगवान दत्तात्रेय के भक्तों की एक परंपरा है. अगर कोई उनसे कुछ खाने या पीने के लिए मांगता है तो वो कभी मना नहीं करते. 

एक बार कपिल भाई वाराणसी गए. विश्व प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर थे. किसी ने खाने के लिए कुछ मांग लिया. अब श्मशान पर ये मांग कैसे पूरी होती. जैसे- तैसे उन्होंने व्यवस्था की. 

उसी वक्त संकल्प लिया और पास के सिंधिया घाट पर भंडारा शुरु हो गया. 

वाराणसी मोक्षदायिनी नगरी मानी जाती है. अनगिनत लोग आखिरी सांस लेने यहां पहुंचते हैं. इनमें से कुछ की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती. उनके संस्कार के बाद परिवार के सामने भोजन की समस्या रहती है. ये भंडारा ऐसे लोगों के लिए वरदान साबित हो रहा है. 

ये तमाम अच्छी बातें अच्छी कहानियों का नतीजा हैं. 

तभी तो बापू कहते थे, बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो 

(स्पष्टीकरण: ये पोस्ट उनके लिए नहीं, जो चोरी को संसार का सबसे उत्तम काम मानते हैं. )

बुधवार, 19 अगस्त 2015

सीख लो मंतर

जाने कब सांप पकड़ना पड़ जाए

अन्ना जी गांधीवादी हैं. उनसे इस बारे में सलाह लेना दुस्साहस होगा.

लेकिन, उन भाइयों को मैं आगाह जरुर करना चाहता हूं, जिनका दिमाग, आंखें और हाथ बिना कुछ लिए दिए नहीं चलते.

'भाई साहब, अगर आपको ये आदत हो गई है कि आप सामने रखी फाइल को तब तक आगे नहीं बढ़ाते जब तक कि टेबल के नीचे से गांधी जी छपे हुए कागज न मिलें तो खास मंत्र सीख लीजिए'.

'सांप पकड़ने का मंतर'.

वरना लगता है कि आने वाले दिन में आपका काम नहीं चलने वाला.

ख़बर बस्ती की है. ये जिला सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक भले ही 'ए' और 'बी' कैटेगरी में न आता हो, लेकिन जनाब आप तो जानते ही हैं कि हिंदुस्तान में सोशल मीडिया की क्रांति हो गई है.

शहरों और गांवों  में सड़कें हों न हों, बिजली आती हो न आती हो, स्कूल कायदे से चलते हों कि नहीं लेकिन वहां फेसबुक, व्हाट्सअप और ट्विटर धडल्ले से चलते हैं.

सोशल मीडिया के इन प्लेटफॉर्मों ने पूरी दुनिया को ऐसा तड़ित चालित तार बना दिया है जिसके एक सिरे से दूसरे सिरे तक करंट पहुंचने में कोई वक्त ही नहीं लगता.
मेरी मंशा में खोट न देखिए.

मैं किसी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से नहीं जुड़ा हूं.

ये बात अलग है कि अस्सी फीसदी हिंदुस्तानियों की तरह मेरी खुद की स्लेट क्लीन है. मैं 'खाता' नहीं और इसके लिए मुझे किसी ग्रंथ की शपथ लेने की जरुरत नहीं. 


मेरे में बारे में तमाम लोग ऐसी गवाही खुद ही दे देते हैं.

वजह ये है कि एक तो मैं ऐसी किसी स्थिति में नहीं हूं कि मुझे कोई कुछ खिलाए. दूसरे, बचपन से अम्मा, बाबा, मां और पापा ने मन में ऐसे संस्कार भर दिए हैं कि इस लोक से ज्यादा चिंता परलोक की होती है.

सीसीटीवी कैद कर रहा हो या नहीं लेकिन हमेशा ये लगता है कि वो ऊपर बैठा सब देख रहा है. हर नेकी और हर बदी का हिसाब रखता जा रहा है.

लेकिन, मैं यहां साफ करता चलूं कि न खाने का मतलब ये नहीं कि मैंने किसी को 'खिलाया' नहीं. 


ट्रेन से लेकर, अस्पताल से लेकर, कॉलेज से लेकर, सरकारी दफ्तर तक असुविधा से बचने के लिए चाहे अनचाहे 'सुविधा शुल्क' तो देना ही पड़ता है.

सरकारी महकमों से रिटायर होने वालों से पूछ लीजिए, बो बता देंगे, अपने ही डिपार्टमेंट से अपना ही फंड, ग्रेच्युटी और पेंशन पाने के लिए अगर 'सुविधा शुल्क' न दिया तो काम नहीं होता. 


खैर जो बात आप जानते हैं, उसे दोहराने से क्या फायदा.

फायदे की बात तो मैं उन भाइयों को बताना चाहता हूं जो बिना 'खाए' कुछ करने को तैयार नहीं होते कि भाई साहब बस्ती में हुआ यूं कि रिश्वत मांगे जाने से कुछ किसान इस कदर नाराज़ हो गए कि उन्होंने सांप पकड़े और रिश्वत के बदले उन साहब के कमरे में छोड़ दिए.

सांप भी एक दो नहीं पूरे चालीस.

तो आप समझ लीजिए, वो बस्ती आपकी 'बस्ती' से भले ही दूर हो लेकिन क्या आप फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सअप और इंटरनेट को रोक सकते हैं? 


नहीं न. तो फिर समझिए कि अगर आपने सांप पकड़ने का मंतर मारना नहीं सीखा तो आपकी भी खैर नहीं.

दिल समझाने को आप कह सकते हैं कि गांव के किसान तो सांप पकड़ सकते हैं लेकिन शहर के लोगों में न तो ये हिम्मत है और न हुनर.

तो भाई साहब ये जान लीजिए कि यहां भी सपेरे बहुत घूमते हैं. दो-दो रुपये में नाग देवता के दर्शन कराते हैं. उनकी हथेली पर अगर इकट्ठे दो सौ रुपये रख दिए जाएं तो सोचिए वो क्या कर सकते हैं.

फिर आप तो हैं ही. सांप को देखकर घिग्घी बंध जाए तो आपको भी अंटी ढीली करने में कितनी देर लगेगी?

तो भाई साहब बात बिगड़े उसके पहले सीख ही लीजिए, सांप को वश में करने का मंतर. क्योंकि 'खाना' तो आपसे छूटेगा नहीं.

ये मंतर नेता भी सीख लें तो अच्छा.

तमाम नेताओं को हमने कहते सुना है, ये सांपनाथ हैं वो नागनाथ. क्यों बहन जी? सही कहा न?

नेताओं की बात हो ही गई तो एक नज़र उस चर्चा पर भी जो हर किसी का ध्यान खींच रही है. जी हां, मैं बिहार की बात कर रहा हूं. राजनीति का असल दंगल तो बिहार की जमीन पर  हो रहा है.

लोकसभा चुनाव के मैदान में तो मुक़ाबला एक तरफा हो गया था. लेकिन यहां ज़ोर बराबरी का चल रहा है.

एक पहलवान एक दांव लगाता है और देखने वालों को लगता है कि कुश्ती हो गई उसके नाम. तभी दूसरा ऐसी काट मारता है कि लगता है कि विरोधी को चित ही कर देगा. 


दम साधकर देखिए. ये याद रह जाने वाला दंगल है.

राजनीति और नेताओं की बातों के बीच याद उस महान शख्स की भी जिसे पूरी दुनिया दिल से नेताजी कहती है.

महान स्वाधीनता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस. 


1945 में 18 अगस्त को जापान में हुई विमान दुर्घटना में नेताजी के मौत की ख़बर आई थी. सच क्या था, वो जाने कब देश के सामने आए?

जय हिंद का अमर नारा देने वाले नेताजी को शतशत नमन. जय हिंद

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

नंबर का खेल समझिए साहेब

दुनिया फंसेगी आंकड़ों का जाल तो बिछाइये 


आज बात एक सवाल से शुरु करते हैं. 

क्या आपको आंकड़ों से खेलना आता है ? अगर नहीं तो जल्दी सीख लीजिए. 

21 वीं सदी में कामयाबी के तिलिस्म का ताला आंकड़ों की चाबी से ही खुलता है. 

लेकिन, आपको ध्यान रखना होगा कि आपके पास सही चाबी है. 

नहीं तो ज़िंदगी ताले खोलने की कोशिश में ही गुजर जाएगी.  

जो आंकड़ों को महज भरम मानते हैं, उनसे मैं कहूंगा अपनी सोच को थोड़ा सा 'मॉडिफाई' कर लें. 

आंकड़े भरम नहीं इंद्रजाल सरीखे होते हैं, जो पूरे जमाने को भरमा देते हैं. या कहें कि दीवाना बना देते हैं. 

चलिए मैं एक और सवाल पूछता हूं. 

नितिन फायर प्रोटेक्शन इंडस्ट्रीज का नाम सुना था? मैंने कल तक नहीं सुना था. सुनने की वजह बना एक दिलचस्प आंकड़ा. 

कंपनी के शेयरों में अमिताभ बच्चन ने निवेश किया और उनमें दस फ़ीसदी का उछाल आ गया. 

अगर शेयर इतनी तेज़ी से छलांग न लगाते तो अमिताभ का निवेश भी ख़बर नहीं बनता. 

बात अमिताभ की निकली है तो बॉलीवुड का हाल भी देखते चलें. 

एक दौर वो था, जब किसी आने वाली फिल्म की कहानी, संगीत और दूसरे आर्टिस्टिक पहलू पर बात होती थी लेकिन अब सवाल सिर्फ एक होता है. क्या ये फिल्म 100 करोड़ के क्लब में शामिल होगी?

क्रिकेट तो खैर आंकड़ों की पिच पर ही खेला जाता है. 

ये आंकड़े ही खेल की दिलचस्पी बढ़ाते हैं और फैन्स को मैदान और टीवी के सामने तक खींच कर लाते हैं. 

अब मैच की कामयाबी टीआरपी यानी उस आंकड़े से तय होती है कि टीवी पर उसे कितने लोगों ने देखा. 

भारत और श्रीलंका की बोरिंग समझी जा रही टेस्ट सीरीज में भी आंकड़ों ने ही दिलचस्पी जगाई. 

सीरीज़ शुरु होने के पहले बताया गया कि भारत ने 22 साल से श्रीलंका में टेस्ट सीरीज़ नहीं जीती है और विराट कोहली की जोशीली युवा टीम ऐसा कर सकती है. 

ये बात अलग है कि गॉल में खेले गए पहले टेस्ट मैच में इस टीम ने कुल्हाड़ी पर पैर मार लिया. 

और तो और, आंकड़े न हों तो घोटालों की 'गरिमा' भी समझ में नहीं आती. 

मसलन दो हज़ार करोड़ का घोटाला. सुनते ही लगता है, हैरान होकर पूछें, 'भैये बताओ क्या लूट मचाई है'? किसी चौपाल पर कोई पूछ भी सकता है, 'बताओ तो जी, कित्ते ज़ीरो लगिंगे दो हज़ार करोड़ में?'

इन आंकड़ों के दम पर ही पूर्व सीएजी विनोद राय का नाम बच्चे-बच्चे को याद हो गया. अब उस कुर्सी पर शर्मा जी बैठे हैं, लेकिन किसे पता? 

आंकड़ों का ये खेल इमेज बिल्डिंग में खासा मददगार साबित हो सकता है. 

क्या आपको पता है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कितने घंटे सोते थे और कितने घंटे काम करते थे?

मुझे नहीं पता. लेकिन मोदी जी के बारे में पता है. वो बीस घंटे काम करते हैं और चार घंटे सोते हैं. 

मुझे ये भी पता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने 15 मिनट की भी छुट्टी नहीं ली. 

और, अब थोड़ी देर पहले ये भी पता चला है कि वो यूएई से एक भारी-भरकम आंकड़ा लेकर लौट रहे हैं 

मोदी जी लेकर क्या गए थे, पता नहीं लेकिन साढ़े चार लाख करोड़ के निवेश का भरोसा लेकर आ रहे हैं. 

ये आंकड़ा इतना बड़ा है कि अगर आप ज़ीरो लगाने या गिनने को कह दें तो मुझे चक्कर आ सकते हैं. 

और अब आज के लिए मेरा आखिर सवाल कि इस रकम का होगा क्या?  

क्या इससे आपकी ज़िंदगी में बदलाव आएगा? जरुर आ सकता है, बशर्ते आप आंकड़ों से खेलना सीख पाएं

और, चलते-चलते आंकड़ों से जुड़ा एक किस्सा. 

कुछ दिन पहले बिहार के एक सांसद से मुलाकात हुई. बड़े दिलचस्प और ईमानदार सांसद हैं. बातें भी ईमानदारी से करते हैं. बात रेलवे की हो रही थी. 

उन्होंने कहा, 'हम तो अपनी जानते हैं. पहले हमारे यहां के लिए मगध नंबर एक गाड़ी थी. वक्त पर चलती थी. फिर संपूर्ण क्रांति आई. मगध पिटने लगी. संपूर्ण क्रांति नंबर वन बन गई और वक्त पर पहुंचाने की गारंटी देने  लगी. फिर, राजधानी सातों दिन के लिए मिल गई. अब राजधानी नंबर वन हो गई'. 

मैंने पूछा, 'संपूर्ण क्रांति का क्या हुआ'? 

वो बोले, 'होना क्या था? पिटने लगी. हमारे यहां तो कोई एक ही नंबर वन रह सकता है'. 

ज़रा नंबर का खेल समझिए, साहब 

सोमवार, 17 अगस्त 2015

हवा बदल सकती है

लेकिन फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता 

बाल्की का वो एड अद्भुत था. 

काका की मौत के कुछ दिन पहले ही टीवी पर दिखना शुरु हुआ था.

दुनिया ये भूली नहीं थी कि काका यानी राजेश खन्ना हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे लेकिन उन दिनों वो किस हाल में थे, किसी को नहीं पता था. न फिक्र थी. 

अचानक वो विज्ञापन आया और छा गया. हरेक के दिलो दिमाग पे. 

वो फैन्स चौंक पड़े, जिन्होंने सत्तर के दशक में राजेश खन्ना के चमकते चेहरे, अदा के साथ गर्दन को झटका देते हुए आंख बंद करने के अंदाज पर निसार होकर उन्हें सुपरस्टार की पदवी दी थी. 

कांपती आवाज. झुकी हुई पीठ. सफेद दाढ़ी शायद पिचके हुए गालों को छुपाने के लिए रखी गई थी, लेकिन वो ऐसा करने में नाकाम थी. 

आंख पर चश्मे था. लेकिन देखने वाले ये परखने से नहीं चूके कि काका की आंखों में वही रूमानियत बाकी है. 

सुनहरे दिनों की याद दिलाने वाली कोई और बात बाकी थी तो वो था सुपरस्टार होने का गुरुर. 

पैंतीस सैकेंड के एड में जब राजेश खन्ना इठला के कहते हैं 

'हवा बदल सकती है लेकिन फैन्स हमेशा मेरे रहेंगे' 

'बाबू मोशाय, मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता' 

तो शायद ही किसी को लगा हो कि वो गलत दावा कर रहे हैं. 

आपको हैरत हो सकती है, भला आज में इस एड को क्यों याद कर रहा हूं. क्यों उसकी बात कर रहा हूं. बताता हूं, 
इसकी वजह हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. 

यूएई के दौर पर गए मोदी के लिए अबू धाबी में वही दीवानगी दिखी, जो राजेश खन्ना जैसे बॉलीवुड के गिने-चुन सुपरस्टार्स को नसीब होती है. राजनीति में तो उसकी कल्पना बेमानी है. 

उनका शेख जायद मस्जिद पहुंचना कई मामलों में अनूठी बात थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी पहली बार एक मस्जिद में दाखिल हुए. 

लेकिन, इससे भी बड़ा अजूबा था, वहां मौजूद लोगों का 'मोदी- मोदी, मोदी-मोदी' कहते हुए प्रधानमंत्री को चीयर करना. हमने ये भारत में देखा है. अमेरिका में देखा है. ऑस्ट्रेलिया में देखा है और अब यूएई में देख रहे हैं.

मोदी का यूएई दौरा तय होने के बाद ज्यादातर लोग जान गए हैं कि वहां करीब 26 लाख हिंदुस्तानी रहते हैं. 

विरोधी कह सकते हैं कि ये इवेंट मैनेजमेंट का कमाल है. 

लेकिन, अबू धाबी के चंद एक लोग, जिनसे मेरी बात हुई, वो ऐसा नहीं मानते. 

उन्हें मोदी के दौरे के इर्द-गिर्द एक अजब सा उत्साह दिख रहा है. 

अब बात हवा बदलने की भी कर लेते हैं. घर में अब मोदी के लिए वो माहौल नहीं दिखता, जिसके दम पर उन्होंने लोकसभा का चुनाव जीता था. 

उनकी सरकार कई सवालों के घेरे में है. मोदी से लोगों का मोह भले ही भंग न हुआ हो, लेकिन उनको लेकर दिखने वाली दीवानगी जरुर घटी है. 

संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के हंगामे में कार्यवाही न चल सकी तो तमाम लोगों ने मोदी की भूमिका पर भी सवाल उठाए. 

विपक्ष को तो खैर उनके हर कदम में खोट नज़र आता ही है. फिल्म हो या फिर राजनीति जब हवा बदलने लगती है तो पैरों के नीचे की जमीन संभालना मुश्किल होता है. फैन्स तो खैर सबसे पहले साथ छोड़ते हैं. 

और, जो बदलते हालात के बाद भी फैन्स को तिल भर भी नहीं हिलने दे. अपने तिलिस्म में बांधे रखे. वो सदाबहार सुपरस्टार होता है. काका की तरह. 

पहले लाल किले से बच्चों के बीच की तस्वीरें और अब यूएई का माहौल गवाही देता है कि मोदी ने भी स्टारडम का वो फॉर्मूला खोज लिया लगता है, जहां वो हर विरोधी से कह सकते हैं,  

'हवा बदल सकती है लेकिन फैन्स हमेशा मेरे रहेंगे' 

'मित्रों, मेरे फैन्स मुझसे कोई नहीं छीन सकता'